शाह की ताजपोशी, इस्लामिक क्रांति और यूएस दूतावास पर कब्जा... अमेरिका-ईरान के 7 हॉट मोमेंट

1979 की ईरानी क्रांति से पहले तक अमेरिका और ईरान अच्छे सहयोगी थे. जब शाह परिवार ईरान की सत्ता से बेदखल हुए और इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना हुई, तब से दोनों देशों के रिश्ते खराब होने शुरू हो गए. ऐसे में जानते हैं अमेरिका-ईरान की दुश्मनी कितनी पुरानी है कैसे दोनों देश एक दूसरे के कट्टर विरोधी बन गए.

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सात दशक से भी ज्यादा पुरानी है ईरान और अमेरिका की दुश्मनी सात दशक से भी ज्यादा पुरानी है ईरान और अमेरिका की दुश्मनी

सिद्धार्थ भदौरिया

  • नई दिल्ली,
  • 01 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 4:08 PM IST

ईरान में अमेरिका के समर्थन से सत्ता में आए शाह को जब 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से शासन से बेदखल किया गया. उसके बाद से कभी एक दूसरे के सहयोगी रहे इन दोनों देशों के बीच रिश्ता तनावपूर्ण हो गया. 2026 से पहले अमेरिका और ईरान के बीच आधिकारिक तौर पर कभी युद्ध नहीं हुए, लेकिन दशकों से दोनों देशों के बीच कई बार गंभीर टकराव की स्थिति बनी. 

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ऐसे जानते हैं उन सात घटनाओं की कहानी, जिसकी वजह से दोनों देश एक दूसरे के कट्टर दुश्मन बनते चले गए. यहां हम अमेरिका-ईरान संबंधों के इतिहास के सात ऐसे महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में बताने जा रहे हैं जब दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम पर था.

1. 1953 में जब अमेरिका की मदद से ईरान में शाह की ताजपोशी हुई  
ईरान हमेशा से तेल-समृद्ध राष्ट्र रहा है और उस पर यूके का एकाधिकार था. 1951 में मोहम्मद मोसादेघ ईरान के प्रधानमंत्री बने और ईरानी तेल का राष्ट्रीयकरण कर दिया. हिस्ट्री डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के मिडल ईस्ट स्टडी की स्कॉलर केली शैनन के अनुसार ब्रिटिश मोसादेघ के फैसले से नाखुश थे और उन्हें सत्ता से हटाना चाहते थे, लेकिन उनके पास ऐसा करने की क्षमता मनहीं थी. इसलिए उन्होंने अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसी सीआईए से तख्तापलट करवाने में मदद मांगी. 

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ईरान में पहला तख्तापलट का प्रयास विफल रहा और भारी विरोध प्रदर्शनों के चलते शाह ईरान से भाग गए. हालांकि, दूसरी बार 1953 में तख्तापलट सफल रहा और शाह पहलवी को लोकतांत्रिक रूप से चुने गए मोसादेघ की जगह सत्ता में बैठाया गया. 1954 में शाह एक आकर्षक समझौते पर सहमत हुए जिसके तहत अमेरिकी, ब्रिटिश और फ्रांसीसी तेल कंपनियों को 25 वर्षों के लिए ईरानी तेल उद्योग में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी मिल गई. तब अमेरिका के लिए, ईरान के शाह शीत युद्ध के दौरान एक महत्वपूर्ण सहयोगी बन गए थे. शुरुआत में शाह ईरानियों के बीच लोकप्रिय थे, लेकिन अगले दो दशकों में वे तेजी से निरंकुश होते चले गए. 

2. 1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति
ईरान में शाह के आधुनिकीकरण कार्यक्रम का विरोध करने वाले या आर्थिक असमानता की आलोचना करने वालों को शाह सरकार की कुख्यात गुप्त पुलिस, सावक द्वारा गिरफ्तार कर, तरह-तरह से टॉर्चर किया जाने लगा. वहीं शाह के राजनीतिक विरोधी उन्हें तानाशाह बताने लगे. ऐसे समय में अयातुल्ला खुमैनी जैसे कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा के लोग ईरान की जनता के बीच आए और शाह शासन को अमेरिका का कठपुतली बताने लगे. तब 1979 में ईरान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा.  कैंसर के इलाज के लिए उन्होंने अमेरिका में शरण ली. फिर अयातुल्ला खुमैनी निर्वासन से लौटे और ईरान के इस्लामी गणराज्य की स्थापना में मदद की. तब अयातुल्ला और उनके समर्थकों के लिए अमेरिका "महान शैतान" बन गया था.

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3. 1979-81 मे ईरानी बंधक संकट
4 नवंबर, 1979 को ईरान के कॉलेज के कुछ छात्रों के एक समूह ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया और 52 अमेरिकियों को बंधक बना लिया. छात्रों ने शाह के प्रत्यर्पण की मांग की, ताकि उन पर ईरान में मुकदमा चलाया जा सके, लेकिन यूएस प्रेसिडेंट जिमी कार्टर प्रशासन ने ईरान के साथ राजनयिक संबंध तोड़कर और ईरानी तेल निर्यात पर कठोर प्रतिबंध लगा दिया. बंधक संकट 444 दिनों तक चला. अयातुल्ला खुमैनी अमेरिकी दूतावास को 'जासूसों का अड्डा' कहते थे. उस समय अयातुल्ला खुमैनी की अमेरिका-विरोधी और पश्चिमी-विरोधी भावना पूरी दुनिया के सामने खुलकर आ गई.

4. 1988 में जब अमेरिका ने ईरानी यात्री विमान को मार गिराया
1980 के दशक में अमेरिका-ईरान संबंध बेहद बिगड़ गए थे. 1983 में, लेबनान के बेरूत में एक सैन्य अड्डे पर विस्फोटकों से भरे दो ट्रकों के विस्फोट में 241 अमेरिकी सैनिक मारे गए. अमेरिका ने इसके लिए ईरान समर्थित लेबनानी आतंकवादी संगठन हिज़्बुल्लाह को दोषी ठहराया. राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने ईरान को 'आतंकवाद को समर्थन देने वाला देश' घोषित कर दिया. 

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1988 में तनाव बढ़ने लगा था, जब फारस की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना का एक पोत में ईरानी माइंस से टकराने के बाद विस्फोट हो गया. इसमें 10 अमेरिकी सेलर घायल हो गए थे. यह घटना ईरान-इराक युद्ध के दौरान हुई , जब दोनों देश एक-दूसरे के तेल टैंकरों को निशाना बना रहे थे.जवाबी कार्रवाई में, अमेरिका ने ऑपरेशन प्रेइंग मैंटिस शुरू किया, जिसके तहत फारस की खाड़ी में ईरान की अधिकांश सैन्य टुकड़ियाँ डूब गईं या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं.दुर्भाग्यवश, जुलाई 1988 में, अमेरिकी सेना ने गलती से ईरान एयर फ्लाइट 655 पर एक निर्देशित मिसाइल दाग दी, जो तेहरान से दुबई जा रहा एक यात्री विमान था. विमान में सवार सभी 290 लोग मारे गए.

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उस वक्त ईरानी शासन और उसके समर्थकों के लिए, फ्लाइट 655 का गिरना बड़ी बात थी. इसके लिए वो अमेरिका को वैश्विक स्तर पर घेर सकते थे कि अमेरिका कितना बुरा है, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. क्योंकि, ईरान मिडल ईस्ट में अपने प्रॉक्सी ग्रुप्स को भरपूर समर्थन देकर अमेरिकी और उसके सहयोगियों को परेशान कर रहा था. 

 5. 2002 में बुश ने ईरान को 'बुराई की धुरी' में शामिल किया
1990 के दशक के दौरान, अमेरिका ने ईरान के शासन को कमजोर करने और उसके हथियार और परमाणु तकनीक को धीमा करने की उम्मीद में ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों को और कड़ा कर दिया. 1995 में, क्लिंटन प्रशासन ने ईरान पर तेल और व्यापार का पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया.

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फिर 11 सितंबर, 2001 के आतंकवादी हमले हुए , जिसमें अल-कायदा के आतंकवादियों ने लगभग 3,000 अमेरिकियों को मार डाला. इसके बाद एक चौंकाने वाले कदम में, ईरानी शासन - जो स्वयं अल-कायदा और तालिबान का कट्टर दुश्मन है, उसने अमेरिका को 9/11 के अपराधियों को जड़ से खत्म करने में मदद करने की पेशकश की. इसके विपरीत, अमेरिका ने ईरान को आतंकवाद के अन्य समर्थक देशों के सूची में शामिल कर लिया. 2002 में  राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ईरान, इराक और उत्तर कोरिया को 'बुराई की धुरी' बताया और ईरानी शासन पर बड़े पैमाने पर विनाशकारी हथियारों का आक्रामक रूप से निर्माण करने और अपनी जनता को प्रताड़ित  करने का आरोप लगाया. इसके बाद से अमेरिका ईरान पर ऐसे आरोप लगाता रहा.  

6. 2020 में अमेरिका ने जनरल सोलेमानी को मार गिराया.
बुश के "बुराई की धुरी" वाले भाषण के महीनों बाद, यह खुलासा हुआ कि ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और व्यापार प्रतिबंधों के बावजूद सक्रिय रूप से एक परमाणु कार्यक्रम चला रहा था, जिसके बारे में पश्चिमी सरकारों का कहना था कि इसमें हथियार बनाने की महत्वाकांक्षाएं शामिल हैं. 2015 में अमेरिका ने यूरोपीय संघ, चीन और रूस के साथ जॉइंट कम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओ) पर हस्ताक्षर किए. यह समझौता ईरान को परमाणु कार्यक्रम रोकने पर उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को कम करने के लिए किया गया था.

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2018 में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका को जेसीपीओए से बाहर निकाल लिया और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए. इसके जवाब में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र और समझौते की शर्तों की अवहेलना करते हुए अपने यूरेनियम संवर्धन प्रोग्राम को फिर से शुरू कर दिया. 

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2019 में फारस की खाड़ी में टैंकरों पर कई हमले हुए, जिनका आरोप अमेरिका ने ईरान पर लगाया. जब ट्रंप प्रशासन ने इस क्षेत्र में अतिरिक्त अमेरिकी सैनिकों की तैनाती की, तो विरोध प्रदर्शन भड़क उठे. ईरान समर्थित मिलिशिया ने बगदाद में अमेरिकी दूतावास परिसर में घुसने की कोशिश की.

3 जनवरी 2020 को, ट्रंप ने ड्रोन हमले का आदेश दिया जिसमें ईरान के सबसे शक्तिशाली सैन्य कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी मारे गए. यह पहली बार था जब अमेरिका ने किसी ईरानी नेता की हत्या की थी, जिससे दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव में भारी वृद्धि का संकेत मिला.सुलेमानी की हत्या के तुरंत बाद, ईरान ने गलती से तेहरान से कीव जा रहे एक यूक्रेनी यात्री विमान को मार गिराया. इराक में अमेरिकी सेना पर ईरान के मिसाइल हमलों के बाद बढ़े सैन्य तनाव के बीच, 8 जनवरी, 2020 को उड़ान भरने के बाद इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) द्वारा दागी गई दो सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों से विमान को निशाना बनाया गया. विमान में सवार सभी 176 लोग मारे गए.

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7. 2025 में जब अमेरिका ने ईरान के परमाणु स्थलों पर बमबारी की
जून 2025 में ट्रम्प प्रशासन ने ईरान की परमाणु सुविधाओं पर हवाई हमले का आदेश दिया, जो दशकों में पहली बार था जब अमेरिकी सेना ने सीधे तौर पर ईरानी क्षेत्र में हमला किया था. बी-2 बमवर्षकों और बंकर-भेदी बमों का इस्तेमाल करते हुए, अमेरिका ने 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' नामक अभियान में प्रमुख परमाणु स्थलों को निशाना बनाया , जिसका उद्देश्य ईरान के परमाणु संवर्धन अवसंरचना को नष्ट करना था.

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