कैसे सुलझेंगे कश्मीर से जुड़े आर्टिकल 35A के ये कानूनी पेंच...

जम्मू कश्मीर से जुड़े अनुच्छेद 35-ए का क्या है पूरा मामला, कैसे सुलझेगा कानूनी पेंच और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई... पढ़ें पूरी खबर...

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सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट

संजय शर्मा

  • श्रीनगर ,
  • 30 अक्टूबर 2017,
  • अपडेटेड 11:34 AM IST

संविधान का अनुच्छेद 35-ए जम्मू कश्मीर विधानसभा को लेकर प्रावधान करता है कि वह राज्य में स्थायी निवासियों को पारभाषित कर सके. देश आजाद होने के बाद साल 1954 में 14 मई को राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा एक आदेश पारित करके संविधान में एक नया अनुच्छेद 35 A जोड़ा गया था. 

राज्य विधायिका को यह अधिकार देता है कि वह कोई भी कानून बना सकती है और उन कानूनों को अन्य राज्यों के निवासियों के साथ समानता का अधिकार और संविधान द्वारा प्राप्त किसी भी अन्य अधिकार के उल्लंघन के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती है. यानी इससे अन्य राज्यों के लोगों को कश्मीर में जमीन खरीदने, सरकारी नौकरी करने या विधानसभा चुनाव में वोट करने पर रोक है.

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इस कानून के खिलाफ दिल्ली स्थित एनजीओ 'वी द सिटीजन' ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर इसे खत्म करने की अपील की थी. इस याचिका में कहा गया कि के कारण संविधान प्रदत्त नागरिकों के मूल अधिकार जम्मू-कश्मीर में छीन लिए गए हैं, लिहाजा राष्ट्रपति के आदेश से लागू इस धारा को केंद्र सरकार फौरन रद्द करे.

सुप्रीम कोर्ट में इस बाबत दाखिल याचिका में देश में संविधान प्रदत्त बुनियादी हक समानता के अधिकार और खासकर लैंगिक समानता के अधिकार के हनन की बात कही गई है. इस याचिका में दी गई दलील की तफसील कुछ इस तरह है :

- याचिककर्ता ने इसे संविधान के का हनन बताया है. ऐसा इसलिए क्योंकि 35A के तहत गैर कश्मीरी से शादी करने वाले कश्मीरी पुरुष के बच्चों को स्थायी नागरिक का दर्जा और तमाम अधिकार मिलते हैं. लेकिन राज्य के बाहर रहने वाले यानी गैर कश्मीरी पुरुष शादी करने वाली महिलाओं पर सम्पत्ति में हिस्सा न देने की पाबंदी लगाई गई है.

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- याचिककर्ता का ये भी कहना है कि इस प्रवधान का प्रस्ताव संसद में चर्चा और बहुमत से पास करवाए बिना संविधान में नया अनुच्छेद कैसे जोड़ दिया गया? यानी संवैधानिक आधार पर भी इसे निरस्त किया जाय.

- इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की थी. लेकिन मामला संविधान के खास हिस्से से ताल्लुक रखने की वजह से अगस्त में इसे लार्जर यानी बड़ी बेंच के पास सुनवाई के लिए भेजा था.

लार्जर बेंच ने पिछली सुनवाई के दौरान भारत सरकार को नोटिस जारी किया था. कोर्ट के नोटिस के बाद इस पर पहली सुनवाई हो रही है.

 

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