जानें- MP में किसानों का मुद्दा पाकर भी क्यों बैकफुट पर है कांग्रेस?

मध्य प्रदेश वह राज्य है, जहां कांग्रेस सन 2003 से ही सत्ता से बाहर है. 1993 से 2003 तक दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में सत्ता में रही कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो आज तक नहीं लौटी.

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राहुल के मैदान में उतरने के बाद बढ़ी सक्रियता राहुल के मैदान में उतरने के बाद बढ़ी सक्रियता

कुमार विक्रांत

  • नई दिल्ली,
  • 12 जून 2017,
  • अपडेटेड 12:29 AM IST

मध्य प्रदेश वह राज्य है, जहां कांग्रेस सन 2003 से ही सत्ता से बाहर है. 1993 से 2003 तक दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में सत्ता में रही कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई तो आज तक नहीं लौटी. उमा भारती के नेतृत्व में बीजेपी ने सरकार बना ली, तिरंगा यात्रा के विवाद के बाद उमा हटीं, तो शिवराज आये जो आज तक जमे हैं.

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दिग्विजय सिंह चुनाव हारने के बाद से दिल्ली की राजनीति में रम गए, 2003 में वो ऐलान कर चुके थे कि, हारे तो 10 साल चुनाव नहीं लड़ेंगे. तमाम बड़े दिग्गजों से भरे प्रदेश में इस बीच कोई तीसरी सियासी ताक़त भी नहीं उभरी और आमने सामने की लड़ाई कांग्रेस जीत न सकी. दरअसल, शिवराज को बीजेपी ने मध्य प्रदेश में सर्वेसर्वा बना दिया, तो वहीं कांग्रेस सिर्फ आपसी सिर फुटौवल से ही जूझती रही. आज भी हाल वही है कि, इतना बड़ा किसानों का मुद्दा मिलने के बावजूद पार्टी एकजुट और आक्रामक होकर किसानों की हमदर्द दिखने की बजाय बैकफुट पर है, उल्टे उसके कुछ लोकल नेताओं के सामने आए वीडियो क्लिप उस पर साज़िशकर्ता होने का आरोप मढ़ रहे हैं.

अगर सिलसिलेवार तरीके से देखें तो जब मंदसौर में किसानों पर गोली चल गई, किसानों की मौत हो गई, तब जाकर प्रदेश के बड़े नेता जागे. उससे पहले स्थानीय विधायक और नेता ही अपने स्तर से लगे थे, किसानों का इतना बड़ा आंदोलन हो रहा था, लेकिन कांग्रेस नदारद दिखी.

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किसान त्रस्त, नेता मस्त
किसानों की हत्या से पहले तक दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया, विधायक दल के नेता अजय सिंह, अध्यक्ष अरुण यादव, सत्यव्रत चतुर्वेदी और मंदसौर से राहुल की करीबी पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन सरीखे नेता अपनी-अपनी सियासत में व्यस्त थे. ऊपर से इन बड़े नेताओं की तुलना में प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश का क़द ऐसा नहीं कि, वो सबको एकजुट कर सकें. कहा जाता है कि, दिग्विजय, सिंधिया और कमलनाथ सरीखे नेता मोहन प्रकाश की बजाय सीधे आलाकमान से बात करना पसंद करते हैं.

दरअसल, विधानसभा चुनाव में पार्टी का सीएम का चेहरा कौन होगा, इसी उहापोह में सारे नेता व्यस्त थे और आज भी हैं. कमलनाथ और सिंधिया में किसी एक के बनने की खबर आने से सियासी खेल चरम पर था और आज भी है, लेकिन आधिकारिक घोषणा अटकी होने के चलते मंदसौर की घटना पर किसी का खास ध्यान नहीं था.

किसानों की हत्या की खबर आने के बाद राहुल गांधी सक्रिय हुए, उनकी तरफ से प्रदेश नेताओं को सक्रिय होने की ताकीद की गई. तब मीनाक्षी नटराजन, भूरिया, अजय सिंह और अरुण यादव को मंदसौर जाने को कहा गया. उस वक़्त दिग्विजय सिंह दिल्ली में थे, उन्होंने बयान देकर अपना काम किया और कहा कि, संगठन कहेगा तो वो मंदसौर जाएंगे. तो हाल ही में विदेश से लौटे कमलनाथ बद्रीनाथ और केदारनाथ की यात्रा पर जा रहे थे. वहीं, बेटे के इलाज के लिए सिंधिया विदेश रवाना हो चुके थे. आनन-फानन में प्रशासन की अनुमति के बगैर राहुल का मंदसौर जाने का कार्यक्रम बना. उधर, खराब मौसम के चलते कमलनाथ पहाड़ों में नहीं जा सके और दिल्ली वापस आ गए. ऐसे में राहुल जहाज से कमलनाथ, दिग्विजय और मोहन प्रकाश के साथ उदयपुर गए और फिर पूरे दिन राहुल का घटनाक्रम मीडिया की सुर्खियां बना रहा.

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पर राहुल लौटे तो फिर वही हाल. दिग्विजय दिल्ली में जम गए, तो कमलनाथ दिल्ली आकर के लिए निकल गए और सिंधिया तो खैर देश में थे ही नहीं. इस बीच लोकल नेताओं के वीडियो क्लिपिंग सामने आए, जिसने बीजेपी को कांग्रेस पर साज़िश के तहत आरोप लगाने का मौका दे दिया और पार्टी बैकफुट पर आती दिखी. इस बीच बेटे का इलाज बीच में छोड़कर सिंधिया सोमवार 10 दिन पहले ही वापस लौट आाए. अगले पांच दिन वे मध्य प्रदेश में रहेंगे, 14 जून से 3 दिन का भोपाल में सत्याग्रह भी करेंगे, फिर 18 को दिल्ली वापस आ जाएंगे. कुल मिलाकर उनकी भी कवायद संगठन की सियासी लड़ाई में बने रहने की है, क्योंकि वो इस पूरे वाक़ये में देश में थे नहीं.

कौन हो सीएम चेहरा
आखिर जिस मुद्दे के ज़रिए पार्टी बीजेपी की एमपी सरकार को बैकफुट पर ला सकती थी, उसी मसले पर उसका बैकफुट पर दिखना उसके लिए बड़ा झटका है, जिसके पीछे की वजह ये है कि, सीएम का चेहरा कौन हो इस सवाल पर सब ठंडे पड़े हैं. किसी को कमान मिल जाये तब वो अपनी ताकत से साथ सक्रिय होना चाहता है. उसके पहले भला वो दूसरे के लिए क्यों ज़मीन तैयार करे. इसी आपसी झगड़े से पार्टी उबर नहीं पा रही.

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सिंधिया को चेहरा बनाने से कमलनाथ, दिग्विजय, पचौरी सरीखों से भितरघात का डर है, तो कमलनाथ के बनने पर सत्यव्रत और सिंधिया की खामोशी पार्टी के लिए चिंता का सबब बन सकती है. इसी माथापच्ची में आलाकमान उलझा है और आपसी फूट, फैसले में देरी के चलते राज्य में पार्टी अबूझ पहेली बनकर रह गयी है. आखिर यही वजह हैं कि, तीसरी ताक़त की गैरमौजूदगी, ठीक-ठाक संगठन और बड़े नेताओं की फौज के बावजूद वो 14 साल से सत्ता से बाहर है और इतना बड़ा किसानों की हत्या का मुद्दा हाथ आने पर भी हाथ निशान वाली पार्टी हाथ मलती ही दिख रही है.

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