वो पांच चेहरे जो साल 2020 में लेकर आए सियासत में सनसनी

साल की शुरुआत में बीजेपी की कमान जेपी नड्डा को मिली, जिन्होंने बिहार चुनाव नतीजों से खुद को साबित किया. बिहार चुनाव ने ही तेजस्वी यादव को नई पहचान दी और उन्हें पिता के साये से निकालकर जुझारू युवा नेता के रूप में स्थापित कर दिया. हैदराबाद की सरहदों से निकलकर असदुद्दीन ओवैसी की भी देश के मुस्लिमों के बीच पहचान मजबूत हुई तो दिल्ली में सत्ता की हैट्रिक लगाकर आम आदमी पार्टी ने साबित कर दिया कि दिल्ली के किंग केजरीवाल ही हैं. 

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बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 21 दिसंबर 2020,
  • अपडेटेड 2:07 PM IST
  • जेपी नड्डा को जनवरी में बीजेपी की कमान मिली, बिहार किया फतह
  • तेजस्वी यादव ने युवा चेहरे के तौर पर बनाई जगह
  • अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता पर लगाई हैट्रिक

साल 2020 कोरोना संकट के बीच गुजरा है. कोरोना वायरस के चलते जिंदगी के तौर तरीके तो बदले, लेकिन जिंदगी रुकी नहीं. हालांकि अगर भारतीय राजनीति की बात करें तो इसके तौर-तरीकों में ज्यादा बदलाव देखने को नहीं मिला. ये बात अलग है कि इस साल ने भारतीय राजनीति के कई धुरंधरों को नए मुकाम पर पहुंचाया.

साल की शुरुआत में बीजेपी की कमान जेपी नड्डा को मिली, जिन्होंने बिहार चुनाव नतीजों से खुद को साबित किया. बिहार चुनाव ने ही तेजस्वी यादव को नई पहचान दी और उन्हें पिता के साये से निकालकर जुझारू युवा नेता के रूप में स्थापित कर दिया. हैदराबाद की सरहदों से निकलकर असदुद्दीन ओवैसी की भी देश के मुस्लिमों के बीच पहचान मजबूत हुई तो दिल्ली में सत्ता की हैट्रिक लगाकर आम आदमी पार्टी ने साबित कर दिया कि दिल्ली के किंग केजरीवाल ही हैं. 

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जेपी नड्डा 
बीजेपी में अमित शाह के ऐतिहासिक कार्यकाल के बाद वरिष्ठ नेता जगत प्रकाश नड्डा को जनवरी 2020 में पार्टी का अध्यक्ष चुना गया. 6 अप्रैल 2020 को बीजेपी के स्थापना दिवस पर नड्डा की अध्यक्ष के तौर पर ताजपोशी हुई. हालांकि, अमित शाह के एनडीए 2.0 सरकार में गृह मंत्रालय संभालने के बाद ही जुलाई 2019 में उन्हें बीजेपी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया था. नड्डा के नेतृत्व में बीजेपी ने भले ही दिल्ली चुनाव में हार का सामना किया हो, लेकिन बिहार और हैदराबाद के निकाय चुनाव के शानदार प्रदर्शन ने उनके सियासी कद को ऊंचाई दी है. 

बिहार में बीजेपी पहली बार जेडीयू से बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसके दम पर नीतीश कुमार सत्ता में वापसी कर सके हैं. बिहार की जीत इसीलिए भी काफी अहम है क्योंकि अमित शाह ने यहां एक भी रैली नहीं की और पीएम मोदी ने सिर्फ चार दौरे किए. ऐसे में जेपी नड्डा ने अकेले दम पर नीतीश कुमार के खिलाफ सत्ताविरोधी लहर को एनडीए की जीत में तब्दील किया. इसके अलावा गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सहित तमाम राज्यों में हुए उपचुनाव में बीजेपी को शानदार कामयाबी मिली. राजस्थान के निकाय, केरल और गोवा के पंचायत चुनाव में पार्टी की जीत और हैदराबाद नगर निगम चुनाव में बीजेपी के दूसरे नंबर की पार्टी बनने का श्रेय जेपी नड्डा को गया. बंगाल में 2021 का विधानसभा चुनाव नड्डा के लिए बड़ा इम्तेहान होगा, जहां पार्टी मुख्य मुकाबले में नजर आ रही है. 

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तेजस्वी का उदय
साल 2020 में तेजस्वी यादव का सियासी दम बिहार ने ही नहीं बल्कि देश भर ने देखा. लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर सवालिया निशान थे. अक्तूबर 2020 के पहले तक बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की एकतरफा जीत के कयास लग रहे थे, लेकिन आरजेडी प्रमुख लालू यादव की अनुपस्थिति में तेजस्वी यादव ने धुआंधार चुनाव प्रचार किया और चुनाव का एजेंडा ऐसा सेट किया कि पूरा माहौल बदल गया. 

तेजस्वी अकेले महागठबंधन की ओर से चुनाव की कमान संभाले रहे. उन्होंने एक-एक दिन में 15 से 16 रैलियों को संबोधित किया, जिसका नतीजा रहा कि आरजेडी 75 सीटों के साथ बिहार में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. करीब दस सीटें आरजेडी मामूली वोटों से हार गई. बिहार विधानसभा चुनाव की 243 सीटों में NDA को बहुमत से सिर्फ दो ज्यादा 125 सीटें मिलीं. राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन को 110 सीटें मिलीं.

सचिन पायलट
इस साल राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ सचिन पायलट ने बगावत का झंडा उठाकर कांग्रेस में सनसनी मचा दी. पायलट करीब 20 विधायकों के साथ एक महीने गुरुग्राम में डेरा जमाए रहे, जिसके चलते गहलोत सरकार पर सियासी संकट छाया रहा. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी अपने समर्थक विधायकों को एक महीने तक होटल में रखना पड़ा. कांग्रेस सरकार को कोर्ट से भी राहत नहीं मिल रही थी और न ही पायलट समर्थक विधायक राज्य लौटने को तैयार थे. कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पायलट के समर्थन में खुलकर खड़े थे. 

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हालांकि, कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के हस्तक्षेप के बाद कहीं जाकर सचिन पायलट माने. वे अपनी शर्तों के साथ कांग्रेस में वापस लौटे, हालांकि इस बगावत में पायलट को मंत्री पद से लेकर प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी गंवानी पड़ी. 

केजरीवाल की हैट्रिक 
साल 2020 में अपनी सियासी छाप छोड़ने वाले नेताओं में अरविंद केजरीवाल भी शामिल हैं. नागरिकता कानून के विरोध में दिल्ली समेत देश भर में जनवरी में 2020 में प्रदर्शन चल रहे थे. शाहीनबाग आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा. इसी मुद्दे पर सियासी उफान के बीच दिल्ली में फरवरी 2020 में विधानसभा चुनाव हुए, बीजेपी ने दिल्ली को फतह करने के लिए अपने नेताओं की पूरी फौज उतार दी थी. 
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं ने केजरीवाल को घेरने के लिए शाहीनबाग को मुद्दा बनाया, तमाम आरोप लगाए, लेकिन दिल्ली की सियासी रणभूमि में ध्रुवीकरण नहीं हो सका. अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीतकर तीन चौथाई बहुमत हासिल किया. बीजेपी को महज आठ सीटों से संतोष करना पड़ा जबकि कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल सकी. यह चुनाव केजरीवाल की सियासत के लिए काफी अहम माना जा रहा था, जिसे जीतने में वे कामयाब रहे. इस जीत के साथ केजरीवाल के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे अब यूपी, गुजरात में भी ताल ठोंकने को तैयार हैं.

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असदुद्दीन ओवैसी
ऑल इंडिया मजलिस-ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के राजनीतिक सफर में सबसे कामयाब सालों में 2020 रहा. बिहार चुनाव में ओवैसी की AIMIM ने मुस्लिम बहुल सीमांचल की पांच विधानसभा सीटें जीतकर हैरान कर दिया. इसके चलते AIMIM मुसलमानों की अखिल भारतीय स्तर की पार्टी बन कर उभर रही है और इसके अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी समुदाय के सबसे बड़े नेता के रूप में सामने आए हैं. हैदराबाद के निकाय चुनाव में बीजेपी की जबरदस्त घेराबंदी के बाद भी ओवैसी अपनी सीटें बचाने में कामयाब रहे. 

बिहार की जीत से ओवैसी के हौसले इतने बुलंद हैं कि वो अपनी पार्टी का प्रसार अब नेशनल पॉलिटिक्स की दिशा में बढ़ाने का काम कर रहे हैं. उनकी नजर पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और राजस्थान सहित तमाम राज्यों पर है. बिहार की तर्ज पर यूपी में भी ओवैसी गठबंधन कर मुस्लिमों के बीच अपनी जगह बनाना चाहते हैं. मुस्लिम समाज में भी ओवैसी की राजनीति को पंसद किया जा रहा है, जिसके चलते वो तथाकथित सेकुलर पार्टियों के लिए एक चुनौती बन गए हैं.

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