चुनाव नतीजों के 8 बड़े Takeaways, बीजेपी और विपक्ष के लिए क्या मैसेज है?

पश्चिम बंगाल, असम और केरल सहित पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आ गए हैं, जिसमें कई सियासी संदेश छिपे हैं. बंगाल से लेकर तमिलनाडु और केरल तक सिर्फ सत्ता परिवर्तन ही नहीं बल्कि भविष्य की सियासत को भी पलटकर रख दिया है. बीजेपी बंगाल में जीतकर अपना दबदबा बनाए रखा है तो क्षेत्रीय दलों की जमीन सिकुड़ने लगी है.

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पांच राज्यों के चुनाव नतीजे से क्या सियासी संदेश है (Photo-ITG) पांच राज्यों के चुनाव नतीजे से क्या सियासी संदेश है (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 05 मई 2026,
  • अपडेटेड 9:41 AM IST

पश्चिम बंगाल, केरल, असम सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने एक नई सियासी तस्वीर पेश की है.  पश्चिम बंगाल और केरल तक में ' सत्ता परिवर्तन' से लेकर तमिलनाडु में थलापति विजय के उदय ने देश के सियासी मानचित्र पर गहरी लकीरें खींची हैं. एमके स्टालिन से ममता बनर्जी तक सत्ता गंवाने से लेकर अपनी सीट तक पर हार का मूंह देखना पड़ा. 

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असम में बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने के साथ-साथ बंगाल में पहली बार कमल खिलाने में कामयाब रही है. इस तरह 75 साल बाद जनसंघ संस्थापक श्याम प्रसाद मुखर्जी का सपना साकार कर दिया है. पुडुचेरी के बहाने ही बीजेपी दक्षिण भारत में अपनी उपस्थिति बनाए हुए है. ऐसे में बीजेपी गठबंधन ने सत्ता में दोबारा से वापसी की है. 

वहीं, दक्षिण भारत के तमिलनाडु में द्रविड़ पॉलिटिक्स (डीएमके-AIADMK) से निकलकर अब थलापति विजय के हाथों में आ गई है. तमिल की सियासत में यह बदलाव करीब छह दशक के बाद हुआ है. केरल में पिनराइ विजयन ही हार ने लेफ्ट मुक्त भारत की इबारत लिख दी है. इस तरह कांग्रेस अपनी हार के सिलसिले को तोड़ने में कामयाब रही है. इस तरह पांच राज्यों के चुनावी नतीजों में 8 बड़े सियासी संदेश छिपे हुए हैं? 

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1. बंगाल में 'ममता' का अंत, 'मुखर्जी' के विजन की जीत
पश्चिम बंगाल के नतीजे सबसे चौंकाने वाले हैं. 15 साल के ममता बनर्जी के शासन को उखाड़कर बीजेपी ने 206 सीटों से साथ सत्ता में आई है. बंगाली अस्मिता बनाम 'बाहरी' का मुद्दा अब गौण हो चुका है. बंगाल ने विकास और 'डबल इंजन' के नारे पर मुहर लगाई है. यह बीजेपी की वैचारिक जीत है कि जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती पर पहली बार भगवा सरकार बनी है. 

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ममता बनर्जी की 15 साल के बाद सत्ता से बाहर हो गई हैं. टीएमसी ही नहीं बल्कि ममता बनर्जी खुद अपनी सीट से हार गई हैं, जिसका मतलब साफ है कि टीएमसी के खिलाफ जबरदस्त तरीके से सत्ता विरोधी लहर थी. बीजेपी ने भ्रष्टाचार, धार्मिक धुर्वीकरण, चुनावी हिंसा को ममता के खिलाफ निगेटिव माहौल बनाकर बंगाल की सियासी बाजी अपने नाम कर ली. इस तरह बीजेपी ने बंगाल में कमल खिलाने में कामयाब रही. 
 
2. 'किंगमेकर' नहीं, 'किंग' बनकर उभरे विजय (TVK)
तमिलनाडु में अभिनेता थलापति विजय की पार्टी TVK का 102 सीटें जीतना किसी चमत्कार से कम नहीं है. द्रविड़ राजनीति के दो ध्रुवों (DMK-AIADMK) के बीच अब एक नया और शक्तिशाली विकल्प पैदा हो गया है. तमिलनाडु का युवा मतदाता अब 'फिल्मी नायक' के बजाय एक 'राजनीतिक विकल्प' के रूप में नई लीडरशिप की तलाश में है. 

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विजय की पहला सियासी शो हिट रहा किंगमेकर नहीं बल्कि किंग बनकर उभरे हैं. विजय की  तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) सियासत में सभी को चौंका दिया है. तमिल की सियासत में विजय की आक्रामक राजनीति ने मतदाताओं को आकर्षित किया तो डीएमके को सनातन विरोधी बयान देना और केंद्र बनाम तमिल की राजनीति करना भी महंगा पड़ा. 

3. राहुल गांधी और 'कांग्रेस 2.0' का उदय
पांच राज्य के चुनाव में भले ही कांग्रेस अधिकांश राज्यों में सत्ता से दूर रही, लेकिन उसके वोट शेयर में भारी उछाल और केरल की सत्ता में यूडीएफ की शानदार वापसी ने उसे 'सबसे बड़ा गेनर' बनाया है. कांग्रेस बंगाल में खाता खोलने में कामयाब रही है. इस तरह से कांग्रेस क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू नहीं रही. बंगाल और तमिलनाडु में खाली हुई 'विपक्षी जमीन' पर कांग्रेस को दोबारा से  खड़े होने का मौका और अपने खिसके हुए जनाधार को वापस हासिल करने के लिए रास्ता बना दिया है. 2029 के लिए राहुल गांधी अब निर्विवाद विपक्षी चेहरा हैं.

4. हिमंता बिस्वा सरमा भाजपा के नए 'महाबली'
असम में लगातार तीसरी बार बीजेपी की जीत ने हिमंता बिस्वा सरमा को राष्ट्रीय राजनीति के कद वाला नेता बना दिया है.उत्तर-पूर्व में बीजेपी अब केवल 'सत्तारूढ़' नहीं, बल्कि 'अभेद्य' हो गई है. हिमंता का 'लाभार्थी' और 'सांस्कृतिक गौरव' का मॉडल अब अन्य राज्यों के लिए ब्लूप्रिंट बनेगा. इस तरह से बीजेपी ने असम में घुसपैठ और विकास के मुद्दे पर सियासी बिसात बिछाई थी.

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 कांग्रेस का बिखरा हुआ संगठन बीजेपी के लिए सियासी तौर पर मुफीद बना और आखिरी वक्त में कांग्रेस नेताओं को बीजेपी में एंट्री कराकर राजनीतिक गेम ही बदल दिया. पांच राज्यों के चुनाव में सत्ताधारी दल केरल और बंगाल में हार गए, लेकिन असम में हिमंत बिस्वा सरमा ने सत्ता में वापसी ही नहीं किया बल्कि कांग्रेस का सफाया भी कर दिया है. 

5. क्षेत्रीय क्षत्रपों की सियासत का क्या पतन है? 
देश के पांच राज्यों के चुनाव में क्षेत्रीय दलों के राजनीति को गहरा झटका लगा है, उनके सियासी प्रभाव थम गए . बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन की हार से साफ हो गया है कि क्षेत्रीय पार्टियों की सियासत धलान पर है. असम में बदरुद्दीन अजमल और बंगाल में हुमायूं कबीर जैसे नेताओं की करारी हार एक बड़े बदलाव का संकेत है. इसके अलावा मतदाता अब 'पहचान की राजनीति' और छोटे दलों के बजाय बड़े विकल्पों (बीजेपी और कांग्रेस) की ओर देख रहे हैं.

6. मुस्लिम सियासत का खत्म होता वजूद
पश्चिम बंगाल से लेकर केरल और तमिलनाडु तक मुस्लिम मतदाता बीजेपी के खिलाफ एकजुट नजर आए. बंगाल में बीजेपी ने हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही तो मुस्लिम मतदाता एकजुट हो गए और उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी, अब्बास पीरजादा सहित कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के बजाय ममता के पक्ष में वोटिंग करना बेहतर समझा. 

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केरल में मुस्लिम मतदाताओं ने एलडीएफ और यूडीएफ को वोट किया. वहीं, असम में मुस्लिम मतदाता कांग्रेस-गठबंधन के साथ एकजुट रहा. बंगाल में मुस्लिमों की रणनीति कामयाब रही, लेकिन असम में सफल नहीं हो सकी. इस तरह से मुस्लिम वोटिंग पैटर्न बता रहा है कि मुस्लिम मतदाता मुस्लिम आधार वाले दलों के बजाय बीजेपी से मुकाबला करने वाले दलों के साथ जाना पसंद कर रहे हैं. ऐसे में ओवैसी और अजमल की पॉलिटिक्स को लिए बड़ा खतरा है. 

7.SIR का असर चुनाव पर कैसे पड़ा इम्पैक्ट
वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण और 9 मिलियन से अधिक नामों के हटने (बंगाल) ने चुनावी गणित बदल दिया. चुनाव आयोग की सक्रियता और पारदर्शी वोटर लिस्ट ने अवैध घुसपैठ और फर्जी वोटिंग जैसे मुद्दों को राजनीतिक नुकसान में बदल दिया, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला. ममता बनर्जी जिस भवानीपुर सीट से चुनाव हारी है, उस पर करीब 47 हजार वोट काटे गए हैं. एसआईआर के बाद बीजेपी बिहार के बाद बंगाल में एकतरफा जीतने में कामयाब रही और विपक्ष का सफाया हो गया. 

8. दक्षिण में अभी भी बीजेपी का असर नहीं 

दक्षिण भारत के तीन राज्यों में केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव हुए हैं. केरल में बीजेपी को सिर्फ एक सीट पर ही जीत मिली है तो  तमिलनाडु में AIADMK के साथ मिलकर भी कोई बड़ा सियासी करिश्मा दिखाने में सफल नहीं हुई. बीजेपी ने तमिलनाडु में 28 सीटों पर चुनावी मैदान में उतरी थी, जिनमें से वह 3 सीट जीतने में ही कामयाब रही है. इस तरह पिछले चुनाव की तुलना में एक सीट कम जीती है.

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हालांकि, पुडुचेरी में जरूर बीजेपी सफल रही है, लेकिन बाकी दक्षिण के राज्यों में जिस तरह से पार्टी का खाता नहीं खुला है. इससे साफ जाहिर होता है कि दक्षिण में बीजेपी के लिए अभी भी सियासी जमीन बनाना आसान नहीं है, लेकिन तमिलनाडु में डीएमके और AIADMK की हार तो केरल में वामपंथ की हार ने जरूर उम्मीद की किरण जगाई है. 

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