क्या वाकई परिसीमन से घट जाएगा साउथ का 'पॉलिटिकल प्रतिशत'? क्या हिंदी भाषी राज्यों को होगा फायदा

मोदी सरकार ने लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल और साथ में परिसीमन के लिए भी विधेयक पेश किया है. लोकसभा में अभी 543 सीटें है, लेकिन परिसीमन के बाद 850 सीटें हो जाएंगी. इस परिसीमन से साउथ का पॉलिटिक्ल प्रतिशत केंद्र की राजनीति में घट जाएगा और हिंदी भाषी राज्यों का प्रतिशत बढ़ जाएगा.

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परिसीमन पर दक्षिण के राज्यों में असंतोष क्यों? (फोटो डिजाइन-आजतक) परिसीमन पर दक्षिण के राज्यों में असंतोष क्यों? (फोटो डिजाइन-आजतक)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 16 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:58 PM IST

संसद का तीन दिन का विशेष सत्र गुरुवार से शुरू हो रहा है. महिला आरक्षण संशोधन बिल को मोदी सरकार इस विशेष सत्र में पारित कराने की तैयारी की है, लेकिन विपक्ष को परिसीमन वाली बात से ही आपत्ति है. इसी वजह से विपक्ष इसके खिलाफ है. परिसीमन से लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर अधिकतम 850 करने वाले विधेयक के प्रभावों को लेकर बहस छिड़ गई है. 

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देश में अभी लोकसभा की कुल 543 सीटें है, परिसीमने के बाद 50 फीसदी सीटें बढ़ जाएगी.  ऐसे में 543 सीटों से बढ़कर 850 लोकसभा सीट हो जाएगी, जिसमें राज्यों में 815 सीट और केंद्र शासित प्रदेशों में 35 सीटें होगी. इसमें से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी.

मसौदे में इन सीटों के राज्यवार सटीक आवंटन के बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा गया है. ऐसे में 50 फीसदी के लिहाज से सीटें बढ़ती हैं तो सभी राज्यों की सीटों में 50 फीसदी की बढ़ोत्तरी हो जाएगी, लेकिन 2011 की जनगणना के लिहाज से संसदीय सीट पुनर्गठन होता है तो उत्तर की सीटें बढ़ जाएंगी. ऐसे में उन राज्यों में चिंता पैदा हो गई है, जिनकी जनसंख्या पिछले दशकों में स्थिर रही है. ऐसे में साउथ के राज्यों की चिंता बढ़ गई है. 

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दक्षिण की तुलना में उत्तर राज्य कितने फीसदी का अंतर 
परिसीमन विधेयक, 2026 में परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान है. संशोधन विधेयक में कहा गया है कि आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह 'नवीनतम जनगणना आंकड़ों' के आधार पर सीटों के आवंटन को पुनः समायोजित करे. मौजूदा समय में 22,29,936 लोगों पर एक लोकसभा सीट तय की गई है, लेकिन अब 14,24,535 लोगों पर एक सीट बनाने की रणनीति है. 

परिसीमन के प्रस्ताव पर लेकर दक्षिण बनाम उत्तर भारत के राज्यों की सियासी बहस छिड़ गई है. ऐसे में दक्षिण भारत के राज्यों की चिंता है कि अगर जनसंख्या के आधार पर लोकसभा की सीटें का निर्धारण किया जाता है, तो उत्तर भारत की तुलना में उनके यहां सीटें कम हो जाएंगी. ऐसे में राष्ट्रीय राजनीति में उनकी अहमियत कम हो जाएगी.

 

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमानों से यह पता चलता है कि यदि परिसीमन का प्रस्ताव लागू होता हैं, तो हिंदी भाषाई राज्यों में लोकसभा सीटों का हिस्सा वर्तमान 38.1 फीसदी से बढ़कर 43.1 फीसदी हो जाएगा, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों में यह 24.3 फीसदी से घटकर 20.7 फीसदी हो जाएगी. 

पूर्वी राज्यों में अभी 14.4 फीसदी सीटें आती हैं, लेकिन परिसीमन के बाद 13.7 फीसदी होंगी. पूर्वोत्तर के राज्यों में 4.4 फीसदी अभी हैं, प्रस्ताव के बाद 4.5 फीसदी सीटें हो जाएंगी. पश्चिमी राज्यों में फिलहाल 14.3 फीसदी सीटें है, जो परिसीमन के बाद 14.4 फीसदी हो सकती हैं. इस तरह से गैर-हिंदू उत्तर भारत के राज्य में अभी 4.4 फीसदी सीटें हैं, जो बढ़कर 4.5 फीसदी हो जाएगी. 

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नार्थ के राज्य का केंद्र में कितनी फीसदी बढ़ेगा पावर
2011 की जनगणना की संख्या के मुताबिक परिसीमन के बाद राज्यों में 815 सीटें हो सकती है. उत्तर प्रदेश में अभी 80 लोकसभ सीटें है, जो बाद में बढ़कर 140 हो सकती हैं. इस तरह 60 सीटों का इजाफा होगा. लोकसभा में मौजूदा शेयर देखें तो यूपी का 14.73 फीसदी है, जो परिसीमन से बढ़कर 16.26 फीसदी हो जाएगा. 

बिहार में फिलहाल 40 लोकसभा सीटें है, जो बढ़कर 73 हो जाएंगी. इस तरह 33 सीटों का इजाफा होगा. लोकसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व 7.3 फीसदी है, जो परिसीमन के बाद 8.6 फीसदी हो जाएगा. राजस्थान में 25 सीटें है, जो बढ़कर 48 हो जाएंगी. इस तरह राजस्थान का 4.6 फीसदी से प्रतिनिधित्व बढ़कर 5.6 फीसदी हो जाएगा. 

मध्य प्रदेश में 29 लोकसभा सीटें है, जो बढ़कर 51 सीटें हो जाएंगी. इस तरह 5.3 फीसदी से बढ़कर 6 फीसदी हो जाएगा. महाराष्ट्र में 48 संसदीय सीटें है, जो बढ़कर 79 सीट हो जाएगी. इस तरह संसद में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व 8.8 फीसदी है, जो बढ़कर 9.3 फीसदी हो जाएगा. इस तरह से दूसरे हिंदी और उत्तर भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व संसद में बढ़ जाएगा. 

साउथ के राज्यों का केंद्र की राजनीति में घटेगा पावर
दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व अभी 24.3 फीसदी है, लेकिन जनसंख्या के लिहाज से सीटों का परिसीमन होता है तो घटकर 20.7 फीसदी रह जाएगा. इस तरह से 4 फीसदी प्रतिनिधित्व दक्षिण राज्यों का कम हो सकता है. इसीलिए दक्षिण भारत के राज्य परिसीमन का विरोध कर रहे हैं. 
 
केरल में अभी कुल 20 लोकसभा सीटों हैं, लेकिन परिसीमन के बाद बढ़कर 23 सीटें हो जाएंगी. लोकसभा मे केरल का प्रतिनिधित्व शेयर 3.68 फीसदी है, जो घटकर 2.7 फीसदी हो जाएगी. तमिलनाडु में 39 लोकसभा सीटें हैं, जो बढ़कर 51 हो जाएंगी. केंद्र में तमिल का प्रतिनिधित्व 7.2 फीसदी है, जो परिसीमने के बाद घटकर 6 फीसदी रह जाएगा. 

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आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 42 लोकसभा सीटें है, जो बढ़कर 59 सीटें हो जाएंगी. संसद में अभी दोनों राज्यों का प्रतिनिधित्व 7.7 फीसदी है, जो घटकर 6.9 फीसदी रह जाएगा. कर्नाटक में 28 लोकसभा सीटें है, जो बढ़कर 43 सीटें हो जाएंगी. संसद में अभी प्रतिनिधित्व 5.16 फीसदी है, जो घटकर 5 फीसदी ही रह जाएगा.  

ओडिश में अभी 21 लोकसभा सीटें है, जो परिसीमन के बाद बढ़कर 29 हो जाएगा. संसद में अभी 3.9 फीसदी प्रतिनिधित्व है, जो बाद में घटकर 3.4 फीसदी रह जाएगा. पश्चिम बंगाल में अभी 42 लोकसभा सीटें है, जो परिसीमन के बाद 64 सीटें हो जाएंगी. संसद में अभी 7.7 फीसदी हिस्सा है, लेकिन यह घटकर 7.5 फीसदी रह जाएगा. 

योगेंद्र यादव ने जारी किया सीटों का मैट्रिक 
चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने इस धारणा के आधार पर एक अलग मैट्रिक्स जारी किया कि सीटों का आवंटन 2011 की जनगणना में जनसंख्या के हिस्से के अनुसार किया गया है. उन्होंने कहा कि हारने वालों और जीतने वालों का राजनीतिक पैटर्न भाजपा की कमजोरियों और ताकत के क्षेत्रों से लगभग पूरी तरह मेल खाता है.

उन्होंने कहा कि  850 सीटों वाली विधानसभा में प्रत्येक राज्य को अधिक सीटें मिलती हैं, इसलिए प्रतिनिधित्व का सही माप अनुमानित आवंटन की तुलना उस संख्या से करके निकाला जाता है जो किसी राज्य को उसके वर्तमान आनुपातिक हिस्से का सम्मान करते हुए मिलनी चाहिए.
 

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