सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता को मजबूत करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक बड़ा फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) अधिकारी स्थायी कमीशन की हकदार हैं.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने माना कि सिस्टम में महिलाओं को असमानता का सामना करना पड़ा है. अदालत ने ये भी पाया कि महिलाओं की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) को बहुत ही आम तरीके से आंका गया.
अदालत ने कहा, 'पुरुष SSCO ये उम्मीद नहीं कर सकते कि स्थायी आयोग में सिर्फ पुरुष ही होंगे. महिला SSCO को स्थायी आयोग से वंचित करना मूल्यांकन के सिस्टम में मौजूद भेदभाव का नतीजा था.'
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के मुताबिक, महिलाओं के लिए ACR इस सोच के साथ किए गए थे कि वो कभी भी परमानेंट कमीशन के लिए एलिजिबल नहीं होंगी. उनके ACR ने उनके मूल्यांकन पर असर डाला. मानदंडों ने उन्हें उनके पुरुष साथियों के मुकाबले में नुकसान में डाल दिया. ACR कभी भी ओवरऑल कंपैरिटिव मेरिट को ध्यान में रखकर नहीं किए गए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए निर्देश दिया कि 2019, 2020 और 2021 के सिलेक्शन बोर्ड में सोचे गए अधिकारियों को 20 साल की सेवा पूरी करने वाला माना जाएगा. वो पेंशन के हकदार होंगे, लेकिन उन्हें वेतन का बकाया नहीं मिलेगा. पेंशन की नई गणना 1 नवंबर, 2025 से लागू की जाएगी.
नौसेना के लिए कोर्ट ने कहा कि एकमुश्त उपाय के तहत एलिजिबल फीमेल ऑफिसर्स को मेडिकल फिटनेस के आधार पर स्थायी कमीशन मिलेगा. 2009 के बाद शामिल हुई महिलाएं भी इसकी हकदार होंगी.
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वायु सेना को लेकर कोर्ट ने बताया कि जिन अधिकारियों को करियर में सही मौका नहीं मिला, उनके खिलाफ सेवा की अवधि का इस्तेमाल स्थायी कमीशन रोकने के लिए नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने सशस्त्र बलों को अपने इवैलुएशन सिस्टम और ACR सिस्टम का रिव्यू करने का भी निर्देश दिया है ताकि भविष्य में महिलाओं के साथ ऐसा भेदभाव न हो.
अनीषा माथुर