'हमें पता है यह मसालेदार खबर बनेगी, लेकिन...', पति-पत्नी के लिए एक समान कानून की मांग पर SC ने कहा- बहस संसद में हो

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए. जहां पति या उसके परिवार को पीड़ित किया गया है, वहां कानून को उसी के अनुसार काम करना चाहिए. यदि किसी महिला को परेशान किया गया है, तो कानून को उसके बचाव में भी आना चाहिए. तो इस प्रावधान में क्या गलत है?

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'जेंडर न्यूट्रल' कानून की मांग पर SC की टिप्पणी अहम है. 'जेंडर न्यूट्रल' कानून की मांग पर SC की टिप्पणी अहम है.

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 16 अप्रैल 2025,
  • अपडेटेड 11:24 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न और भरण पोषण से जुड़े कानूनों को जेंडर न्यूट्रल बनाने और उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए दायर जनहित याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें कानून नहीं बना सकतीं और इस पर विचार करना सांसदों का काम है.

 जेंडर न्यूट्रल बनाने का अर्थ है कि कानून में जैसी सुरक्षा और संवेदनशीलता महिलाओं को दी गई है वैसी सुरक्षा और संवेदनशीलता पुरुषों को लेकर दिखाई जाए.

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एक गैर सरकारी संगठन द्वारा दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान उसके वकील ने दलील दी कि पतियों और उनके परिवार के सदस्यों को परेशान करने के लिए कानूनी प्रावधानों का दुरुपयोग किए जाने के कुछ उदाहरण हैं.

इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिंग एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने हालांकि कहा, "हम समझते हैं कि यह एक मसालेदार खबर बनेगी, लेकिन हमें बताएं कि कानून के किन प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं हो रहा है?"

पीठ ने कहा कि एनजीओ के बजाय पीड़ित व्यक्तियों को अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए था.

जनहित याचिका में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (दहेज उत्पीड़न) और भरण-पोषण के भुगतान के लिए सीआरपीसी की धारा 125 को "जेंडर न्यूट्रल" बनाने की मांग की गई थी.

याचिका को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि ऐसा कोई व्यापक बयान नहीं दिया जा सकता कि महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण के लिए बनाए गए प्रावधानों का "दुरुपयोग" किया गया.

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जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, "जहां पति या उसके परिवार को पीड़ित किया गया है, वहां कानून को उसी के अनुसार काम करना चाहिए. यदि किसी महिला को परेशान किया गया है, तो कानून को उसके बचाव में भी आना चाहिए. तो इस प्रावधान में क्या गलत है?"

पीठ ने कहा, "हमें आईपीसी की धारा 498ए, जिसे अब बीएनएस की धारा 84 के रूप में जाना जाता है, के पीछे विधायिका के नीतिगत फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता."

यह दलील कि ऐसे प्रावधान अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करते हैं, पूरी तरह से गलत और भ्रामक है. संविधान का अनुच्छेद 15 स्पष्ट रूप से संसद को महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार देता है.

कोर्ट ने कहा, "यह आरोप कि प्रावधान का दुरुपयोग किया जा रहा है, अस्पष्ट और भ्रामक है, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए इस संबंध में कोई राय नहीं बनाई जा सकती. यह कहना पर्याप्त है कि इस तरह के आरोपों की मामले-दर-मामले के आधार पर जांच की जा सकती है."

एनजीओ की ओर से पेश होते हुए वकील ने कहा कि भारत में घरेलू हिंसा के मामले केवल महिलाएं ही दर्ज करा सकती हैं, जबकि विदेशों में पति भी ऐसे मामले दर्ज करा सकते हैं और भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं.

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इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि, "तो आप चाहते हैं कि हम कानून बनाएं. कानून बनाना न्यायालय का काम नहीं है. इस उद्देश्य पर विचार करने के लिए सांसद मौजूद हैं. हम किसी प्रावधान को सिर्फ इसलिए रद्द नहीं कर सकते क्योंकि उसके दुरुपयोग के उदाहरण हैं."

याचिका में की गई प्रार्थनाओं पर सवाल उठाते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने कहा,"हमें दूसरे देशों का अनुसरण क्यों करना चाहिए? हम अपनी संप्रभुता बनाए रखते हैं."

एनजीओ के वकील ने कहा कि अदालत कुछ दिशा निर्देश जारी कर सकती है और मामलों की जल्द सुनवाई का निर्देश दे सकती है.

इस पर पीठ ने जवाब दिया, "ऐसे मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए हमें और अधिक बुनियादी ढांचे की जरूरत है. हमें और अधिक मजिस्ट्रेट और अदालतों की जरूरत है. इस तरह से निर्देश पारित नहीं किए जा सकते. इसमें कई कारक शामिल हैं. हमें और अधिक धन कौन मुहैया कराएगा? राज्यों के पास पर्याप्त धन नहीं है. ये पूरी तरह से प्रशासनिक मुद्दे हैं."

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि मीडिया में कुछ लेख लिखे गए हैं और एक धारणा बनाई जा रही है, अदालतें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं.

पीठ ने वकील से पूछा,"क्या आप यह बयान दे सकते हैं कि किसी भी नवविवाहित महिला को दहेज के लिए परेशान नहीं किया जा रहा है?" उन्होंने कहा कि अदालत महज एक बयान पर किसी प्रावधान को रद्द नहीं कर सकती कि किसी कानून का "दुरुपयोग" किया जा रहा है.

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कोर्ट ने कहा कि "हम इस बात से इनकार नहीं कर रहे हैं कि प्रावधानों का दुरुपयोग नहीं किया जा रहा है, लेकिन अदालत को केस टू केस के आधार पर इस पर गौर करना होगा. एक दिन आपको ऐसा मामला मिलेगा जहां एक महिला का उसके पति ने सिर कलम कर दिया. क्या आप चाहते हैं कि हम इस 'दुरुपयोग'के कॉन्सेप्ट को वहां लागू करें?"

बता दें कि एनजीओ 'जनश्रुति' (पीपुल्स वॉयस) द्वारा दायर जनहित याचिका में भरण-पोषण के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने और धारा 125-128 सीआरपीसी, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में संबंधित प्रावधानों को "जेंडर न्यूट्रल" घोषित करने की मांग की गई.

अन्य राहतों के अलावा, इसने वैवाहिक विवादों में शामिल सभी व्यक्तियों के लिए संतुलित सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए धारा 498ए आईपीसी में संशोधन की भी मांग की है. 
 

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