स्कूलों में फ्री सैनिटरी पैड और अलग टॉयलेट हों, लड़कियों की पढ़ाई न रुके: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को स्कूलों में फ्री सैनिटरी नैपकिन और अलग टॉयलेट सुनिश्चित करने को कहा है, जिससे लड़कियों की पढ़ाई प्रभावित न हो.

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स्कूलों में लड़कियों के लिए जरूरी सुविधाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त (File photo: ITG) स्कूलों में लड़कियों के लिए जरूरी सुविधाओं पर सुप्रीम कोर्ट सख्त (File photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 मई 2026,
  • अपडेटेड 9:28 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि लड़कियों को सिर्फ इसलिए पढ़ाई नहीं छोड़नी चाहिए कि स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन और ठीक से काम करने वाले, अलग-अलग जेंडर के लिए बने टॉयलेट उपलब्ध नहीं हैं. कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह सुनिश्चित करने को कहा कि इस संबंध में उसके निर्देशों का पूरी तरह से और सही भावना के साथ पालन किया जाए.

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सुप्रीम कोर्ट का बयान तब आया, जब केंद्र सरकार ने बताया कि 30 जनवरी के उसके फैसले के बाद सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस दिशा में प्रयासों में तेजी आई है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अधिकारियों को छात्राओं को फ्री सैनिटरी नैपकिन देने और स्कूलों में ठीक से काम करने वाले, अलग-अलग जेंडर के लिए बने टॉयलेट उपलब्ध कराए जाएं.

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा, "इसका सही इस्तेमाल करें. यह इस देश की महिलाओं और लड़कियों की भलाई के लिए है. लड़कियों को सिर्फ इस वजह से पढ़ाई छोड़कर घर पर नहीं बैठना चाहिए और न ही सिर्फ घरेलू काम करने चाहिए."

राज्यों और UTs को सख्त निर्देश!

बेंच ने केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे से कहा, "अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाएं और यह देखें कि जहां तक हो सके, हमारे फैसले के मुताबिक इसके फायदे लोगों तक पहुंचें."

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30 जनवरी को दिए गए एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को फ्री ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन दें और सभी छात्रों के लिए अलग-अलग (लड़के-लड़कियों के लिए अलग) और इस्तेमाल करने लायक शौचालय उपलब्ध कराएं. इस फैसले के दौरान लैंगिक न्याय और शिक्षा में समानता सुनिश्चित करने की बात कही गई थी.

कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कई निर्देश जारी किए थे, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि ये सुविधाएं स्कूलों में जरूर मिलें, चाहे वे सरकारी हों, सरकारी मदद से चलने वाले हों या प्राइवेट हों. सोमवार को सरकारी वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दिए गए निर्देशों के पालन की रिपोर्ट का जिक्र किया.

बेंच ने पूछा, "क्या आप सभी राज्यों से डेटा इकट्ठा कर रहे हैं?" दवे ने कहा कि केंद्र सरकार ने राज्यों से करीब ढाई महीने का डेटा इकट्ठा किया है. बेंच ने कहा कि केंद्र सरकार को आगे बढ़कर यह देखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह से और सही भावना के साथ पालन हो रहा है या नहीं.

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सुप्रीम कोर्ट रखेगा नजर...

बेंच ने कहा, "केंद्र सरकार को इस मामले में सभी राज्यों को लगातार मार्गदर्शन देते रहना चाहिए. केंद्र सरकार को हमारे निर्देशों के सही पालन के संबंध में सभी राज्यों से समय-समय पर जरूरी डेटा और जानकारी इकट्ठा करते रहना चाहिए."

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह हर तीन महीने में जांच करेगा कि निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं. अदालत ने कहा कि केंद्र हर तीन महीने में मामले में आगे की प्रोग्रेस की एक नई रिपोर्ट देगा.

एक वकील ने मामले में दायर एक अंतरिम याचिका का जिक्र करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में 'ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल' ​​सैनिटरी नैपकिन शब्द का इस्तेमाल किया है, जिसके बारे में उनका दावा है कि यह पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है.

बेंच ने वकील से कहा कि वह इसे लॉ ऑफिसर के ध्यान में लाएं. बेंच ने दवे से कहा, "अंतरिम एप्लीकेशन पर गौर करें और जरूरी कदम उठाएं." इसके साथ ही, सभी राज्यों को निर्देश दिया गया कि वे 15 अगस्त तक केंद्र को अपनी स्टेटस रिपोर्ट सौंपें.

सुप्रीम कोर्ट बेंच ने कहा, "केंद्र को स्टेटस रिपोर्ट सौंपने में किसी भी राज्य की तरफ से कोई चूक नहीं होनी चाहिए. इस मामले में आगे की सभी कंप्लायंस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए शिक्षा मंत्रालय नोडल मंत्रालय होगा."

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अपने 30 जनवरी के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, "संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार भी शामिल है. सुरक्षित, प्रभावी और किफायती मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन उपायों तक पहुंच एक लड़की को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के उच्चतम स्तर को प्राप्त करने में मदद करती है. स्वस्थ प्रजनन जीवन के अधिकार में यौन स्वास्थ्य के बारे में शिक्षा और जानकारी तक पहुंच का अधिकार भी शामिल है."

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन उपायों की अनुपलब्धता स्कूल में समान शर्तों पर भाग लेने के अधिकार को छीन लेती है, और शिक्षा की कमी का डोमिनो प्रभाव यह होता है कि बाद में जीवन के सभी क्षेत्रों में भाग लेने में असमर्थता आ जाती है।

कोर्ट ने निर्देश दिया था कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह तय करेंगे कि शहरी और ग्रामीण इलाकों में हर स्कूल ASTM D-6954 स्टैंडर्ड के हिसाब से बने ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी नैपकिन फ्री में दें. इसमें यह भी कहा गया था कि ऐसे सैनिटरी नैपकिन लड़कियों को आसानी से मिल सकें. टॉयलेट और कपड़े धोने की सुविधाओं के बारे में कोर्ट ने कहा था कि हर स्कूल में काम करने वाले, जेंडर के हिसाब से अलग-अलग टॉयलेट हों, जिनमें इस्तेमाल करने लायक पानी की कनेक्टिविटी हो.

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