संघ के 100 साल: 'ये दरवाजे कब तक बंद रहेंगे...', देवरस ने एक सवाल से खड़ा कर दिया रामजन्मभूमि आंदोलन

प्रयागराज में एक मीटिंग हुई. इस मीटिंग में बालासाहब देवरस ने अयोध्या का जिक्र करते हुए कहा कि ये दरवाजे कब तक बंद रहेंगे. देवरस का ये बयान इस बात का संकेत था कि वे क्या चाहते हैं. यही वो सवाल था जिसने वीएचपी की ओर राम मंदिर आंदोलन की नींव रख दी. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.

Advertisement
मीनाक्षीपुरम में धर्म परिवर्तन की घटना ने बाला साहब को उद्वेलित किया था. (Photo: AI generated) मीनाक्षीपुरम में धर्म परिवर्तन की घटना ने बाला साहब को उद्वेलित किया था. (Photo: AI generated)

विष्णु शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 13 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:35 AM IST

संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस थे, उनके बारे में दो बातें बड़ी चर्चा में रही हैं. एक ये कि वे ईश्वर का अस्तित्व मानते थे, व्रत, पूजा, पाठ से उनका कोई विरोध नहीं था, किंतु स्वयं वह संध्या-वंदन, स्तोत्रों का पाठ नित्य नैमित्तिक कर्म आदि में उदासीन थे. एक बार उन्होंने ये तक कहा था, कि ‘मुझे संघ का कम्युनिस्ट कहते हैं’. दूसरी बात ये कि वे पत्र लिखने से दूर भागते थे, उनके अपने हाथ से पत्र लिखने का अभ्यास न रहने के संदर्भ में तत्कालीन कार्यालय प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर ने एक किस्सा बताया था, “बालासाहब सरकार्यवाह थे, अखिल भारतीय बैठक के पत्र पांडुरंग पंत तैयार करते थे और सरकार्यवाह हस्ताक्षर करते थे. ऐसे ही एक पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए बालासाहब को एक अच्छा सा फाउंटेन पेन दिया गया था. हस्ताक्षर करने के लिए बालासाहब ने पेन खोला तो उसकी स्याही सूख चुकी थी. इसलिए उन्होंने पांडुरंग पंत से पेन मांगा. पंत ने हंसते-हंसते कहा, प्रतिदिन कुछ लिखने पर स्याही सूखेगी नहीं और ऐसा प्रसंग नहीं आएगा. इस पर बालासाहब ने पूछा, हर रोज क्या लिखूं? पंत ने कहा, ‘राम नाम लिखा करिए’, बालासाहब कहने लगे, बाबू ने मुझे संध्या - वंदन करने को कहा, अब तुम राम नाम लिखने को कह रहे हो, वहां बैठे हुए हम सभी लोग ठहाका मारकर हंस पड़े. ऐसे में किसी को क्या पता था कि एक दिन यही बालासाहब देवरस राम मंदिर आंदोलन की नींव भी रखेंगे. वैसे बचपन में शाखा में वो श्रीराम के बेटे कुश के नाम पर बनी इकाई ‘कुश पथक’ का नेतृत्व करते थे.
 
1964 में गुरु गोलवलकर दे गए थे राम जन्मभूमि मुक्ति का साधन

Advertisement

हालांकि गुरु गोलवलकर ने 1964 में विश्व हिंदू परिषद की स्थापना करके इस दिशा में एक बड़ा कदम उठा दिया था. उस दौर में ही उन्हें महसूस हो गया था कि अब एक ऐसा संगठन चाहिए जो दुनियां भर के सनातन समाज की आवाज बन सके, उनके मुद्दे उठा सके, ऐसे में भारत के सनातनियों के भी कुछ मुद्दे थे, अनसुलझे मुद्दे, जो किसी तारणहार की बाट जोह रहे थे. आमतौर पर खुद आंदोलन से दूर रहकर उत्प्रेरक की भूमिका निभाने वाले संघ ने इमरजेंसी के दौरान खुद सक्रिय भूमिका निभाकर एक नई राह स्वयंसेवकों को दिखा दी थी कि सनातन में आपदधर्म भी कुछ कहता है, संघ के कई अधिकारियों ने अलग-अलग समय पर माना कि संघ ने आपातकाल के उस आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी. सो इस तरह से संघ को उस आंदोलन का अनुभव भी हो चुका था.

Advertisement

1981 में हुए मीनाक्षीपुरम कांड ने बालासाहब देवरस को ये सोचने पर मजबूर कर दिया था कि हिंदू समाज को अब एकजुट करने का समय आ गया है और ये कई स्तर पर होना है. गांव स्तर पर इकाइयां खड़ी करनी होंगी, हर जाति के हिंदू में ये भाव जगाना होगा कि वो किसी दूसरे के साथ जातिगद भेदभाव का व्यवहार ना करे और ऐसे में राम जन्मभूमि का आंदोलन एक ऐसा मुद्दा हो सकता है, जो पूरे हिंदू समाज को एक कर सकता है. क्योंकि राम सबके पूज्य थे. ऐसे में उन्हें लगा कि मार्गदर्शक जैसी भूमिका में चली आ रही विश्व हिंदू परिषद को अब केन्द्रीय भूमिका में आना ही पड़ेगा.
 
अशोक सिंहल अपने उस भाषण से बालासाहब की नजरों में आ गए

बालासाहब ने बंगलौर में देश भर के प्रचारकों का 5 दिन का एक सम्मेलन बुलाया. उस सम्मेलन में अशोक सिंहल ने इतना ओजस्वी भाषण दिया कि बालासाहब को लगा कि उनको आंदोलन का चेहरा मिल गया है. उन्होंने तभी से सोच लिया था कि अशोक सिंहल विश्व हिंदू परिषद की कमान संभालेंगे, बाद में वरिष्ठ प्रचारक मोरोपंत पिंगले को जिम्मेदारी दी गई कि वो विश्व हिंदू परिषद के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में होंगे और रज्ज् भैया को बाद में इस आंदोलन के लिए सभी संगठनों से तालमेल कर आंदोलन में लगातार ऊर्जा भरने की जिम्मेदारी दी गई थी. अशोक सिंहल के 90वें जन्मदिन पर हुए उत्सव में वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने बंगलौर (अब बेंगलुरु) सम्मेलन का उल्लेख करते हुए कहा था कि, “वहां जिस तरह हिंदुत्व की भावी दिशा पर अशोक सिंहल बोले थे, उससे हमने ये अनुमान लगा लिया था उन्हें विश्व हिंदू परिषद में भेजा जाएगा और यही हुआ भी. बालासाहब ने विश्व हिंदू परिषद को ही उन परिस्थितियों में जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त समझा. उनका आकलन बिलकुल सही था. उन्होंने संघ की शक्ति का सहारा विश्व हिंदू परिषद को दिया”. अशोक सिंहल उन दिनों दिल्ली प्रांत के प्रांत प्रचारक थे.
 
कांग्रेस नेता ने उठाया था श्रीराम जन्मभूमि का मुद्दा

Advertisement

राम जन्मभूमि आंदोलन को लेकर विश्व हिंदू परिषद के चर्चित चेहरे चम्पत राय ने ऑर्गनाइजर में एक लेख लिखा था, जिसके अनुसार, “आरएसएस स्वयंसेवकों द्वारा 23 मार्च, 1983 को मुजफ्फरनगर में एक हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया था. मंच पर माननीय रज्जू भैया, कुछ संत और, जहां तक मुझे याद है, स्वर्गीय जगदीश मुनि भी उपस्थित थे. मुजफ्फरनगर के हिंदू भी बड़ी संख्या में वहां जमा हुए थे. गुलजारी लाल नंदा और दाऊदयाल खन्ना भी मंच पर मौजूद थे, लेकिन विश्व हिंदू परिषद का कोई भी कार्यकर्ता वहां नहीं था, यहां तक ​​कि अशोक सिंहल भी नहीं. वहां दाऊदयाल जी ने अयोध्या, मथुरा और काशी के मंदिरों को पुनः प्राप्त करने का विचार रखा था. वहां एकत्रित हुए लोग स्वयंसेवक और हिंदू समाज के सदस्य थे जिन्हें संघ ने संगठित किया गया था. इस विचार ने उत्साह की लहर पैदा कर दी, अशोक जी दाउदयाल जी से मिलने गए और उनसे इस विषय पर उनके विचार जाने. स्वयंसेवकों का इस अभियान को आगे बढ़ाने में यह पहला योगदान था.”

आपको ये भी समझना होगा कि इस बैठक में रज्जू भैया की मौजूदगी बताती है कि आधिकारिक जिम्मेदारी मिलने से पहले ही वे सक्रिय हो चुके थे. वहीं गुलजारी लाल नंदा और दाऊदयाल खन्ना कांग्रेस से जुड़े थे. दाऊदयाल खन्ना को आमतौर पर राम जन्मभूमि मुद्दा उठाने का श्रेय दिया भी जाता रहा है.
 
“ये दरवाजे कब तक बंद रहेंगे”

Advertisement

उसी साल यानी 1983 में बालासाहब देवरस भी शायद मन बना चुके थे. इलाहाबाद में एक शीतकालीन शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस भी उपस्थित थे. शिविर के समापन के बाद, कुछ प्रचारक आपस में बैठकर बातचीत कर रहे थे. बालासाहब जी ने पूछा, “मुझे पता चला है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि पर ताले लगा दिए गए हैं?” उस क्षेत्र के प्रचारक खड़े हुए और पुष्टि करते हुए बोले, “जी हां, आप जो कह रहे हैं वह सच है”. बालासाहब ने आगे पूछा, “ये दरवाजे कब तक बंद रहेंगे?” ये वो सवाल था जिसने विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) द्वारा श्री राम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए शुरू किए गए आंदोलन की नींव रखी. बालासाहब का ये सवाल किसी सम्मेलन की मंच से नहीं हुआ था, किसी भी पूर्व निर्धारित बैठक में हुआ था. बावजूद इसके उनका पूछना ही काफी था ये बताने के लिए कि वे क्या चाहते हैं. उसके बाद ही यह निर्णय लिया गया कि ‘श्री राम की जन्मभूमि को ताला लगा दिया गया है’ का संदेश पूरे देश के हर गांव सहित हर जगह फैलाया जाए. लोगों को सूचित किया जाना चाहिए.

लोगों को जागरूक करना ज़रूरी था, इसीलिए रथ यात्रा की योजना बनाई गई. लेकिन रथ कौन चलाएगा? इसका इंतज़ाम कौन करेगा और इसके लिए लोगों को कौन जुटाएगा? ये सभी कार्य स्वयंसेवकों द्वारा संपन्न किए गए. पहले एक रथ चलना शुरू हुआ और फिर रथों की संख्या बढ़कर छह हो गई. उत्तर प्रदेश में जन जागरूकता अभियान चलाया गया, जिसके परिणामस्वरूप बाद में ताले खोले गए.

Advertisement

RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

बीच में बालासाहब ने राजस्थान में 100 प्रचारकों की एक बैठक बुलाई, उस बैठक की जानकारी गिनती के ही लोगों की थी, यहां तक कि चम्पत राय भी बैठक के शहर की जानकारी नहीं देते, केवल इतना बताते हैं कि अशोक सिंहल भी उन 100 में से 1 थे, उनके जैसे ही. लेकिन बालासाहब ने सबको कहा कि, “अच्छी तरह सोचो. एक बार यह मिशन शुरू हो गया तो इससे पीछे हटना संभव नहीं होगा. हमें हिंदू समाज के गौरव को बढ़ाने की दिशा में अवश्य सफल होना है”. कई और श्रोतों से जानकारी मिलती है कि बालासाहब ने कम से कम 30 साल के लिए इस आंदोलन में जुटने को कहा था और उसकी वजह जब तक जन जन इस मुद्दे को अपना नहीं मानेगा, तब तक आंदोलन सफल नहीं होगा.
 
लालकृष्ण आडवाणी ने अपने संस्मरण में लिखा है कि, “सन् 1984 में सितंबर-अक्तूबर के मध्य राम मंदिर के ताले को खोलने की मांग करते हुए बिहार में सीतामढ़ी से शुरू करके अयोध्या तक एक जन-जागरण यात्रा निकाली गई. जहां-जहां से होकर वह यात्रा गुजरी, वहां लोगों ने उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दिखाई. इस अभियान की कालावधि पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह उस समय की बात है, जब इंदिरा गांधी स्वयं देश की प्रधानमंत्री थीं.” आडवाणी आगे लिखते हैं कि, "सन् 1985 में रामजन्मभूमि आंदोलन में काफी तेजी आ गई थी, हालांकि उस समय भी यह आंदोलन धार्मिक नेताओं और उनके समर्थकों तक ही सीमित रहा था. वह समय राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल का प्रथम वर्ष था. उत्तर प्रदेश में वीर बहादुर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की ही सरकार थी. वर्ष 1984 के आम चुनावों में लगे करारे झटके से भाजपा अब तक नहीं उबर पाई थी. उल्लेखनीय है कि अयोध्या के विवादास्पद मामले पर महत्त्वपूर्ण निर्णय लेनेवाली सरकारें कांग्रेस की ही थीं, उत्तर प्रदेश में भी और केंद्र में भी. 19 जनवरी, 1986 को लखनऊ में हिंदू धार्मिक नेताओं का एक सम्मेलन हुआ, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि यदि महाशिवरात्रि के दिन (यानी 8 मार्च तक) सरकार स्वयं कुछ नहीं करती तो मंदिर में लगा ताला तोड़ दिया जाएगा. इस सम्मेलन के बाद कांग्रेस की सरकारों और न्यायपालिका ने जिस विद्युतीय गति से कार्य किया, वह सभी को चौंकाने वाली है."

Advertisement

राज्य सरकार द्वारा दो दिनों के भीतर ताला खोलने के लिए फैजाबाद जिला न्यायालय में एक प्रार्थना-पत्र दायर किया गया. 28 जनवरी को उसे खारिज कर दिया गया. उसके बाद इस संदर्भ में एक अपील दायर की गई और 1 फरवरी को विवादित ढाँचे में लगा ताला खोलने का आदेश जारी हुआ. न्यायालय ने राज्य की कांग्रेस सरकार से यह पुष्टि कर लेने के बाद ही यह आदेश जारी किया था कि मंदिर के द्वार खुलने से कानून-व्यवस्था में किसी तरह की समस्या नहीं आएगी. कुछ ही घंटों के भीतर इस आदेश को प्रभावी कर दिया गया. और भी देखिए, दूरदर्शन, जो उस समय पूरी तरह से कांग्रेस सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में था, ने मंदिर का ताला खोले जाने का खूब जोर-शोर से प्रसारण किया और साथ ही वहाँ रामलला की पूजा करने के लिए जुटी श्रद्धालुओं की अपार भीड़ को भी भरपूर दिखाया.
 
कोचीन में मिले थे अटल-आडवाणी से बालासाहब

उस समय भारतीय जनता पार्टी भारी असमंजस में थी. लालकृष्ण आडवाणी ने भी अपने संस्मरण में स्वीकार किया है कि "मई 1986 में मेरे पार्टी का अध्यक्ष बनने से पहले पार्टी में विभिन्न मूलभूत वैचारिक तथा संगठनात्मक मुद्दों पर जबदस्त बहस छिड़ चुकी थी." उस बहस को दिशा किसने दी ? इसका जवाब उनके संस्मरण में नहीं है. कई स्वतंत्र लेखकों की पुस्तकों में ये लिखा गया है कि सन् 1987 में किसी समय अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी ने एक साथ बालासाहब देवरस से भेंट की. वह भेंट कोचीन में हुई. उन्होंने भाजपा नेताओं को सलाह दी कि कांग्रेस इस समय हिंदुत्व के आधार को अपनाने की कोशिश कर रही है. वह राजीव गांधी के नेतृत्व में ऐसा कर नहीं पाएगी. भाजपा इस दिशा में बढ़ती है तो वह उसके लिए बहुत स्वाभाविक होगा. उसे हिंदू समाज का समर्थन भी मिलेगा. इस सलाह के बाद भाजपा की दुविधा कम हुई, उसे रोशनी दिखी, विचार-मंथन का क्रम चला. उसके बाद का इतिहास तो भूतो ना भविष्यति है.
 
विश्व हिंदू परिषद के 25 साल और बड़े निर्णय

Advertisement

उस साल विश्व हिंदू परिषद् अपने जीवन के पच्चीसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा था. 24 मार्च, 1989 को अहमदाबाद में संघ और उसके संगठनों की बैठक हुई, जिसमें बालासाहब देवरस के अलावा एच.वी. शेषाद्रि, रज्जू भैया, यादवराव जोशी, भाउराव देवरस, अशोक सिंहल, लालकृष्ण आडवाणी, सुंदर सिंह भंडारी, दत्तोपंत ठेंगड़ी आदि थे, उस बैठक का विवरण ज्यादा उपलब्ध नहीं है, लेकिन रामबहादुर राय लिखते हैं कि,  “इसी बैठक में बालासाहब देवरस ने एकसूत्रबद्धता का जो विचार दिया, संघ और उसके संगठनों को एक योजना में पिरोया था, वह सार्थक दिशा में बढ़ने लगा. उसके लिए सतत कार्यक्रम बने और चले. उस पर ही विमर्श के लिए संघ, भाजपा, विश्व हिंदू परिषद् और भारतीय मजदूर संघ के प्रतिनिधि उस बैठक में उपस्थित हुए. उसी बैठक के विमर्श से मोरोपंत पिंगले पर विशेष जिम्मेदारी आई. वे विश्व हिंदू परिषद् का उसी तरह मार्गदर्शन करते थे, जैसे भाजपा का भाउराव देवरस कर रहे थे. लेकिन उस बैठक में उन्हें बालासाहब देवरस ने अयोध्या आंदोलन का अनाम सूत्रधार बनाया. सरकार, मीडिया और अन्य एजेंसियों की नजर में आए बगैर मोरोपंत पिंगले ने पूरे अयोध्या आंदोलन को एक दिशा और लक्ष्य के अनुरूप चलाया.” श्री रामजानकी रथ यात्रा, श्रीराम शिला पूजन, शिलान्यास, श्रीराम ज्योति, पादुका पूजन आदि कार्यक्रमों ने देश में धूम जागरण का कार्य किया. इन सबके पीछे मोरोपंत पिंगले थे.

अयोध्या आंदोलन ने पूरे हिंदू समाज को इतिहास-बोध के स्पंदन से भर दिया. समाज में ऐसी भावना एक ऐतिहासिक घटना होती है, जब एक लक्ष्य से पूरा समाज प्रेरित हो जाता है, हर तरह के भेद मिट जाते हैं. बालासाहब देवरस की बहुआयामी समरनीति का वह परिणाम .था, वे जानते थे कि मंजिल अभी दूर है. एक छोटी सी लड़ाई ही जीती जा सकी है. सिर्फ इतना ही हासिल हुआ है कि हिंदुत्व का विचार मुख्यधारा में आ गया है और यही बड़ी उपलब्धि थी.

रामबहादुर राय के अनुसार बाबरी विध्वंस के बाद सबसे अलग बयान उन्हीं का था. उन्होंने कहा, “अच्छी बात नहीं हुई. लेकिन इससे मुसलमानों को भी अनुभव होगा कि आस्था और विश्वास के एक स्थल को तोड़े जाने से कैसी पीड़ा होती है।' राय लिखते हैं, “बालासाहब देवरस ने यह बात बहुत सहज ढंग से कही. किसी को चोट पहुंचाने का भाव नहीं था, एक तथ्य का उद्घाटन था, परस्परता की आवश्यकता का प्रतिपादन था”.

इधर चम्पत राय लिखते हैं कि बालासाहब के तय कर लेने के बाद धीरे-धीरे आंदोलन गति पकड़ने लगां वहां एक मंदिर बनाने का निर्णय लिया गया और मंदिर के वास्तुकारों से भी परामर्श किया गया, मंदिर के कई स्वरूप तैयार किए गए. लेकिन इससे पहले सभी हिंदुओं को यह सूचित करना आवश्यक था कि यह मंदिर करोड़ों हिंदुओं के सहयोग से निर्मित किया जाएगा। 'शिला पूजन' 1989 में शुरू हुआ और 2,75,000 गांवों में संपन्न हुआ. इस शिला पूजन के जरिए 6 करोड़ लोगों से करीब 8 करोड़ रुपए की सहयोग राशि भी इकट्ठा हुई, हर एक से सवा रुपए. मंदिर की नींव 9 नवंबर, 1989 को रखी गई थी। आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए, 24 जून, 1990 को हरिद्वार में एक हिंदू सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में 40,000 से अधिक लोग शामिल हुए और 50000 भोजन पैकेट हरिद्वार के घरों से इकट्ठा किए गए. इससे ना केवल व्यवस्था आसान होती बल्कि परिवार भी खुद को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं.

यह तय किया गया कि 30 अक्टूबर, 1990 को हिंदू समाज अयोध्या जाएगा और अपने हाथों से निर्माण कार्य (कार सेवा) शुरू करेगा. यूपी के पुलिस अधिकारी दिल्ली गए और अशोक सिंहल से बात की, “आपने कैसी घोषणा कर दी है? आपको पता है जब पुलिस फायरिंग शुरू करेगी, तब कोई भी व्यक्ति वहां नहीं रुकेगा. अशोक सिंहल का जवाब था, “आप संघ के स्वयंसेवकों के बारे में कुछ नहीं जानते, एक की मृत्यु हो तो दूसरा उसका अनुसरण करेगा, दूसरे की मृत्यु हो तो तीसरा ध्वज लेकर आगे बढ़ेगा”.
 
मुस्लिमों के अयोध्या मार्च को लेकर बालासाहब की प्रतिक्रिया

श्रीराम जन्मभूमि का ताला खुलने के पश्चात् कुछ मुसलिम संगठनों ने पैदल अयोध्या मार्च की योजना बनाई थी. बालासाहब को यह बात पता चल गई. लखीमपुर संघ शिक्षा वर्ग में चम्पतराय, ओंकार भावे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तत्कालीन प्रांत प्रचारक ओमप्रकाशजी को बालासाहब से मिलने के लिए बुलाया गया. उस बैठक में बालासाहब ने ओंकार भावे से कहा कि 'बिना किसी से चर्चा करे अकेले कोई भी निर्णय मत किया कीजिए.' बालासाहब की बात सुनकर सभी चुप हो गए. कुछ समय तक सन्नाटा पसरा रहा। बालासाहब ने स्वयं ही उस सन्नाटे को तोड़ते हुए श्री ओमप्रकाशजी से कहा कि 'देश में ऐसा वातावरण बना दीजिए कि कोई भी अयोध्या की तरफ न बढ़ पाए.' चम्पतराय ने इस प्रकरण को लेकर लिखा है कि, “बालासाहब ने उस बैठक में डाँट भी लगाई और उचित मार्गदर्शन भी दिया. बालासाहब ने जो हिम्मत हम सबको उस बैठक में दी, उसी का परिणाम यह हुआ कि अयोध्या की तरफ मार्च करने की कोई हिम्मत ही नहीं कर सका. श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन बालासाहबजी के अंतःकरण की देन है.”
 
संकेतों में ही अशोक सिंहल को दे दिया सख्त संदेश

उसके बाद श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन विषय पर अशोक सिंहल बालासाहब से समय-समय पर चर्चा करते रहते थे, विहिप की 4 अप्रैल, 1991 की दिल्ली के वोट क्लब की ऐतिहासिक रैली बालासाहब के कारण ही सफल हो पाई थी, चम्पतराय ने लिखा है कि वोट क्लब की उस रैली को लेकर किसी ने बालासाहब से अशोक सिंहल की शिकायत कर दी तो बालासाहब ने अशोक सिंहलजी से बात कर पूछा कि वोट क्लब का कार्यक्रम अशोक सिंघलजी कर रहे हैं अथवा संत समाज कर रहा है? बालासाहब के संकेत को अशोक सिंघल समझ गए और उन्हें उत्तर दिया कि श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पर वोट क्लब का कार्यक्रम संत समाज कर रहा है. अशोक सिंघल तो मात्र संत समाज का सहयोगी है. चम्पत राय के अनुसार, “यदि मुझे ठीक से याद है तो बालासाहबजी से बातचीत करने के उपरांत अशोक सिंघल और लालकृष्ण आडवाणीजी वापस आ गए और यह घोषणा हो गई कि 4 अप्रैल, 1991 को दिल्ली के वोट क्लब पर सम्मेलन होगा. 4 अप्रैल, 1991 को वोट क्लब का भव्य सम्मेलन इतिहास का स्वर्णिम काल है. उस सम्मेलन में देश भर से 25 लाख से अधिक लोग पहुँचे थे। उस दिन के बाद ही वोट क्लब पर सम्मेलन करने की स्वीकृति पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उसी दिन शाम को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.”
 
अयोध्या आंदोलन का एक चरण पूरा हुआ। लेकिन बालासाहब देवरस को अपने जीवनकाल में ही संघ पर तीसरे प्रतिबंध का सामना करना पड़ा. अगर सामान्य स्थिति रहती तो वे वर्ष 1992 में सरसंघचालक पद छोड़ देते, नई परंपरा बनाते; लेकिन संघ पर प्रतिबंध ने उनमें नई प्राण-शक्ति का संचार कर दिया. वे अपनी शारीरिक अवस्था को भुला बैठे. चुनौती जो सामने आई, उससे दो-दो हाथ करने के लिए उद्यत हो गए. प्रो. देवेंद्र स्वरूप ने लिखा है, “प्रतिबंध की चुनौती के सामने सरसंघचालक पद से हटना उन्हें पलायनवाद लगा, अपनी जर्जर काया को वज्र बनाकर उन्होंने उस अन्यायपूर्ण प्रतिबंध से लड़ने का संकल्प सँजोया. वे अपनी सेना के सामने हौदे पर डटे रहे. प्रतिबंध हटा और वर्ष 1993 की दीपावली तक उन्होंने सरसंघचालक पद के दायित्व से स्वयं को मुक्त करने का निश्चय कर लिया. इस निश्चय की घोषणा करने का मन बनाकर वे दिसंबर 1993 में दिल्ली आए. उनके वरिष्ठ सहयोगियों को जब उनके निश्चय की भनक मिली तो उन्होंने ही प्रार्थना की कि इतनी जल्दी क्या है ? दो- तीन महीने बाद ही संघ की बैठक नागपुर में होने जा रही है, इसलिए यदि बालासाहब देवरस ने अपना निर्णय घोषित करने का निश्चय कर ही लिया है तो क्यों न वे समूचे संघ परिवार की उपस्थिति में नागपुर की पवित्र धरती पर ही अपने दिव्य संकल्प को उद्घोषित करें! बालासाहब देवरस ने अपने सहयोगियों के अनुरोध को शिरोधार्य किया और 11 मार्च, 1994 तक संन्यस्त भाव से सरसंघचालक पद के मुकुट को अपने सिर पर ढोना स्वीकार किया”. उसके बाद ये जिम्मेदारी रज्जू भैया को दे दी.

लेकिन संघ के स्वयंसेवको ने बाबरी ढांचा ध्वस्तीकरण के बाद भी अपना मिशन पूरा नहीं समझा, वो फिर जुटे खाली हुई जमीन यानी श्रीराम जन्मभूमि पर भगवान राम का भव्य मंदिर बनाने के लिए समर्थन जुटाने में और देश भर के ज्यादा से ज्यादा घरों तक पहुंचने का ध्येय हाथ में लिया और करीब 11 करोड़ हस्ताक्षर मंदिर बनाने के समर्थन में जुटाए. इन हस्ताक्षरों को बाद में राष्ट्रपति को सौंप दिया गया.

पिछली कहानी: मीनाक्षीपुरम कांड... जिसको लेकर RSS और इंदिरा गांधी एक साथ आ गए थे 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement