संघ के 100 साल: मीनाक्षीपुरम कांड... जिसको लेकर RSS और इंदिरा गांधी एक साथ आ गए थे

तमिलनाडु के मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण की जांच के लिए न्यायमूर्ति वेणुगोपाल जांच आयोग का गठन किया गया. 1986 में आयोग ने जबरन धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक कानून की सिफारिश की. तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.जी. रामचंद्रन ने इस पर उस वक्त तो सहमति जताई, लेकिन उन्होंने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया.

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तमिलनाडु में दलितों के धर्मांतरण पर हंगामा मचा था. (Photo: AI generated) तमिलनाडु में दलितों के धर्मांतरण पर हंगामा मचा था. (Photo: AI generated)

विष्णु शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 12 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:01 PM IST

1923 का कांग्रेस अधिवेशन काकीनाडा में चल रहा था. अध्यक्ष थे मोहम्मद अली जौहर, वही जिनके नाम पर रामपुर में बनवाई गई यूनीवर्सिटी में गोलमाल के आरोपों के चलते आजम खान जेल के अंदर हैं.  मौहम्मद अली जौहर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में तब तक के सारे कांग्रेस सिद्धातों के खिलाफ जमकर बोला, पृथक निर्वाचक मंडल की तो तारीफ की ही, बंगाल के फिर से एकीकरण को गलत बताया, कहा कि बंगाल के विभाजन से मुस्लिमों को लाभ था. ये तक कहा कि, “या तो अछूत वर्ग को हिंदू समाज तुरंत अपने में मिला लें वरना मुस्लिमों को अनुमति दें कि वो उन्हें इस्लाम धर्म में कलमा पढ़ाकर शामिल कर लें.” ये भी सलाह दी कि उन्हें “हिंदू और मुस्लिमों में आधा आधा बांट देना चाहिए”.
 
ये घटना आजादी से 24 साल पहले की है. लेकिन आजादी के बाद लगा था कि अब तो पाकिस्तान अलग दे दिया, अब ऐसा करने या कहने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता. लेकिन ये हुआ, इंदिरा गांधी की केन्द्र में सरकार होते हुए तमिलनाडु में दलितों का लगभग पूरा गांव, करीब 400 परिवारों का धर्मान्तरण कर दिया गया. उन सबको हिंदू से मुसलमान बना दिया और फिर आक्रोश की ऐसी लहर पूरे देश में उठी थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इंदिरा गांधी दोनों एक ही सुर में बोलते दिख रहे थे. राजनीति के पंडित ये मानते आए हैं कि ये मीनाक्षीपुरम की घटना थी, जिसने हिंदूवादी ताकतों को आक्रामक तेवर दे दिए और एक दिन उसी की चिंगारी से राम मंदिर आंदोलन उठ खड़ा हुआ और बाबरी मस्जिद ढांचा विध्वंस उसी चिंगारी की परिणति था.
 
मीनाक्षीपुरम बन गया रहमत नगर

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ये घटना 1981 की है, तमिलनाडु के तिरुनेवेलि जिले का एक गांव है मीनाक्षीपुरम. गांव में ज्यादातर लोग या तो दलित थे या फिर पिछड़ी थेवर जाति के लोग. थेवर जाति के लोग दबंग ज्यादा थे, पैसे वाले थे और तमिलनाडु प्रशासन उनके खिलाफ आने वाली शिकायतों को दबा देता था. इससे दलित लोग बेसहारा जैसे हो गए थे. उनको समझ नहीं आ रहा था कि शिकायत किससे करें, जब सरकार ही जुल्म करने वालों के साथ हो. ऐसी स्थिति का फायदा मुल्ला मौलवियों ने उठाया और उन्हें समझाया कि इस्लाम में शामिल हो जाओ, तब तुम्हें कोई हाथ नहीं लगा पाएगा. तुम्हारे लिए लड़ने के लिए देश के कौने कौने से मुसलमान भाई आ जाएंगे. दलित समुदाय के लोग दो जातियों से थे मारावर औऱ पल्लार, ज्यादातर लोग मजदूरी करके पेट पालते थे. बहुत ही कम लोग उनमें पढ़े लिखे थे.
 
ऐसे में मौलवियों ने कुछ लोगों को लालच देकर अपनी तरफ किया और बाकियों से ढेर सारे वायदे भी किए कि मुसलमान बनने पर आपको क्या क्या मिलेगा, इसमें पैसे से लेकर काम तक कई तरह के वायदे थे. फिर आई 19 फरवरी 1981 की तारीख, अलग अलग रिपोर्ट्स अलग अलग आंकड़ें बताती हैं, लेकिन सबसे कम जो संख्या है वो 180 परिवारों की है, ये कितनी भी कम सही, लेकिन आजाद भारत में एक साथ इतने बड़े सामूहिक धर्मांतरण की घटना शायद ही हुई हो. हैरानी इस बात की भी थी कि प्रशासन को कानोंकान इसकी खबर नहीं लगी. ये भी कहा जाता है कि 40 परिवारों ने ऐन मौके पर धर्मांतरण करने से साफ मना कर दिया था. भारत सरकार के आधिकारिक एससी-एसटी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 1100 दलितों को धर्मांतरित किया गया था. इस मौके पर मुस्लिम सांसद और विधायक भी मौजूद थे.
 
अगले दिन जैसे ही ये खबर अखबारों में छपी, पूरे देश में तहलका मच गया. मीडिया ने अपनी खोजी रिपोर्टिंग में बताया कि इस धर्मांतरण के लिए पैसा विदेशों से आया है, कुछ लोगों को तो जबरन धमकी देकर धर्मांतरित करवाया गया है. धर्मांतरित होने से इनकार करने वाले गांव के कुछ दलितों ने मीडिया को बताया कि उनको पांच-पांच सौ की रिश्वत ऑफर की गई थी, तो एक अखबार ने तो खाड़ी देशों की मुद्रा लिए एक व्यक्ति का फोटो भी छाप दिया कि कि ये भी बांटी गई है.
 
अटलजी ने की घर वापसी की अपील

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हिंदू संगठनों में तो बवाल ही मच गया, कुल एक साल ही हुई थी तब भारतीय जनता पार्टी. अटल बिहारी बाजपेयी ने फौरन बाकी नेताओं के साथ मीनाक्षीपुरम का दौरा किया. दलितों से घरवापसी की अपील भी की, लेकिन जिस तरह वहां हिंदू संगठनों के मार्च को धर्म बदल चुके दलितों के इलाकों में जाने से रोका गया, और हिंदुओं ने कलेक्टर के खिलाफ आरोप लगाए, उससे ये तय हो गया कि प्रशासन की मिलीभगत से ही धर्मांतरण का कोई भव्य कार्यक्रम हो सकता है. एक जमाने में प्रयाग का नाम इलाहाबाद, मथुरा का नाम इस्लामाबाद, अयोध्या का नाम फैजाबाद कर दिया गया था. उसी तरह कोई बादशाहत ना होते हुए भी मीनाक्षीपुरम का नाम रहमत नगर कर दिया गया. अगले दिन ही गांव में मस्जिद खड़ी कर दी गई, जबकि पहले वहां कोई मस्जिद नहीं थी. हिंदूवादी संगठनों को ही नहीं, इंदिरा गांधी और कांग्रेस को भी हैरानी थी कि इतने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की हिम्मत कैसे इन लोगों के अंदर आई. क्या फिर से जिन्नावादी ताकतें इस देश में अपना सर उठाने लगी हैं? क्या फिर से देश एक और विभाजन की तरफ अग्रसर होने जा रहा है?
 
इंदिरा गांधी भी इतनी बड़ी घटना से नाराज थीं, उन्होंने तत्कालीन गृहमंत्री ज्ञानी जेल सिंह को तलब कर उनसे पूरी रिपोर्ट मांगी. उनकी नाराजगी की एक बड़ी वजह ये भी कि इमरजेंसी और संजय गांधी दोनों के प्रकोप से वो हाल ही में उबरी थीं, अब सरकार अपने तरीके से चलाना चाहती थीं, दूसरी तरफ देसी विदेशी मीडिया इस कांड को लेकर उनके भी पीछे पड़ गई थी. इंदिरा गांधी को इमरजेंसी के दौरान संघ की ताकत का भी भरपूर अनुमान लग चुका था. वो जानती थीं कि संघ ने इस मुद्दे को जेपी आंदोलन की तरह ही उठाया तो उनकी सरकार के लिए फिर से दिक्कत हो सकती है.
 
हालांकि मीडिया की रिपोर्ट्स शुरू से ही अलग अलग तथ्य इस गांव और घटना के बारे में बताती रहीं. कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि मुसलमान बनने वालों में से कई लोग तो अगले पांच महीने के अंदर ही वापस आ गए थे, 1991 तक यानी 10 साल के अंदर 1100 में से 900 लोग वापस से हिंदू बन चुके थे. जबकि 200 कभी वापस नहीं आए. लेकिन ऐसे भी रिपोर्टर हैं, जो हर पांच-सात साल बाद दिल्ली या चेन्नई से वहां जाते हैं और छापते हैं कि ज्यादातर अभी भी मुसलमान हैं और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया है क्योंकि उनके घर से कोई ना कोई खाड़ी देशों में काम करता है. ऐसी रिपोर्ट भी छपी हैं, जिनमें कहा गया था कि जो भी वापस आए उन्होंने मीडिया को बयान दिए कि उनको झूठे वायदे कर मुसलमान बनाया गया था, उनके साथ किए गए वायदे कभी पूरे नहीं किए गए, ना पैसे दिए गए ना ही सबको नौकरी, कुछ ही लोगों को खाड़ी देशों में नौकरियों के लिए भेजा गया.
 
भाजपा और हिंदू संगठनों द्वारा मीडिया और संसद में हंगामे के बाद, मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण की जांच के लिए न्यायमूर्ति वेणुगोपाल जांच आयोग का गठन किया गया. 1986 में, आयोग ने जबरन धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक कानून की सिफारिश की. तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.जी. रामचंद्रन ने इस पर उस वक्त तो सहमति जताई, लेकिन उन्होंने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया. सोलह साल बाद, 2002 में जयललिता की सरकार ने तमिलनाडु जबरन धर्मांतरण निषेध अधिनियम पारित किया. हालांकि इस पूरी घटना के लिए एआईडीएमके व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन को दोषी ठहराया जाता रहा है. उसकी वजह उनकी पार्टी के मुस्लिम नेताओं पर इसमें शामिल होने के आरोप लगे थे. बाद में जब धर्मांतरित होने वाले लगभग सारे दलित एआईडीएमके के समर्थक बन गए तो शक यकीन में बदलता चला गया.
 
1981 में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण का अभियान दक्षिण भारत की इशादुल इस्लाम सभा द्वारा चलाया गया था. इस संगठन ने बाद में रामनाथपुरम और मदुरै जिलों में और अधिक दलित हिंदुओं को धर्मांतरित करने का प्रयास किया, लेकिन विश्व हिंदू परिषद, हिंदू मुन्नानी, आरएसएस, आर्य समाज, हिंदू समुदाय वलार्ची मनरम और हिंदू ओट्ट्रुमै मैयम (हिंदू एकता केंद्र) जैसे हिंदू संगठनों के बीच देशव्यापी आक्रोश ने मुस्लिम संगठन को अपना अभियान धीमा करने के लिए मजबूर कर दिया.
 
थिरुवादुथुराई अधीनम नामक एक हिंदू संगठन के पास गांव में 1,300 एकड़ जमीन थी. अधीनम गांव वालों को यह जमीन 1,300 रुपये प्रति एकड़ प्रति वर्ष के हिसाब से सस्ते में किराए पर देने लगा. अधीनम ने यहां एक स्कूल खोलने की भी योजना बनाई थी,लेकिन पास के गांव वालों ने इसे रोक दिया. धर्मांतरित मुसलमान आरोप लगाते हैं कि उसने अधीनम से कहा कि हम वे लोग हैं जिन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम धर्म अपना लिया है और उन्हें यहां स्कूल बनाने के लिए हिंदू धन खर्च नहीं करना चाहिए. तब स्कूल पास के गांव में बनाया गया.
इस गाँव में एक और बदलाव यह है कि हिंदू इसे इसके मूल नाम मीनाक्षीपुरम से पुकारते हैं, जबकि मुसलमानों ने इसका नाम बदलकर रहमत नगर रख दिया है. दोनों नामों में कोई स्पष्ट विभाजन नहीं है, ये एक ही क्षेत्र को बताते हैं.
 
मीनाक्षीपुरम की घटना और RSS

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उस वक्त बालासाहब देवरस संघ प्रमुख थे और जनता पार्टी की सरकार के गिरने के बाद संघ की आगे की दशा और दिशा तय करने के लिए विचारमग्न थे, जनसंघ की जगह भारतीय जनता पार्टी का गठन 10 महीने पहले ही हो चुका था. 1981 की शुरूआत में ही जब इस घटना की जानकारी मिली बालासाहब देवरस को भी अचरज हुआ कि ये कोई आम मामला नहीं है. विभाजनकारी ताकतें केवल जनसंख्या वृद्धि करके नहीं बल्कि धर्मांतरित करके भी अपनी ताकत बढ़ाना चाहती हैं, यही पैटर्न जारी रहा तो बहुत जल्द देश एक और विभाजन के मुहाने पर पहुंच सकता है. बालासाहब ने पूरे देश भर के जिला प्रचारकों का एक सम्मेलन बुलाया. बेंगलूरू के पास 5 दिन तक वह सम्मेलन चला. रामबहादुर राय ने अपने एक लेख में लिखा है कि, “उसी सम्मेलन में संघ की दलित नीति निर्धारित हुई”. उसका एक ही परिणाम था कि ‘विराट हिंदू समाज’ नाम का संगठन खड़ा किया गया. इसका सम्मेलन दिल्ली में हुआ और इतना विराट था कि 5 से 6 लाख लोग दिल्ली में इकट्ठा हुए थे, जिसका संचालन तत्कालीन प्रांत प्रचारक अशोक सिंघल ने किया और डॉ कर्ण सिंह को उसका अध्यक्ष चुना गया था.
 
इस सम्मेलन के जरिए पहली बार विश्व हिंदू परिषद को पूरी तरह सक्रिय किया गया. अब तक विश्व हिंदू परिषद वानप्रस्थी प्रचारकों का संन्यास आश्रम जैसा था. लेकिन पहली बार उसके लिए एक विशाल अभियान के लिए तैयार किया जा रहा था. बालासाहब देवरस ने तय किया कि विश्व हिंदू परिषद को प्रभावी नेतृत्व भी इस नए अभियान के लिए मिलना चाहिए तो उन्होंने तब के दिल्ली प्रांत के संघ प्रचारक अशोक सिंघल को इसके लिए चुना. यहीं से अशोक सिंघल का आगे का जीवन एकदम बदल गया जो राम मंदिर आंदोलन के दौरान पूरी दुनियां ने देखा भी.
 
इंदिरा गांधी ने तब RSS की ही भाषा बोली थी

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डॉ कर्ण सिंह को विराट हिंदू समाज का अगर अध्यक्ष चुना गया होगा तो जानकार मानते हैं कि इसके लिए उन्होंने इंदिरा गांधी से अनुमति जरूर ली होगी. लेकिन उन दिनों इंदिरा गांधी उदार हिंदुत्व के चोले में थीं, उन्होंने खुलकर जिस तरह से इस सामूहिक धर्मांतरण के मीनाक्षीपुरम कांड की निंदा की थी, संसद में पहली बार उन्होंने धर्मांतरण की बहस करवाई और एक सुर में जिस तरह संसद में धर्मांतरण की निंदा हुई, वो बिना इंदिरा गांधी की मर्जी के हो ही नहीं सकता था. कुछ लोगों ने य़े भी लिखा कि इंदिरा गांधी संजय गांधी की मौत के बाद थोड़ी आध्यात्मिकता की तरफ मुड़ गई थीं, तो कुछ लोग लिख रहे थे कि उनको संघ की ताकत और हिंदुत्व के असर का अनुमान हो गया था.
 
संघ के अंदर भी बाहर भी ये चर्चा अक्सर चलती है कि क्या मीनाक्षीपुरम की घटना ने ही अयोध्या आंदोलन की नींव रखी. हालांकि उस दिशा में प्रयास तो लम्बे समय से चल रहे थे, 1964 में विश्व हिंदू परिषद शुरू होने के साथ ही उस तरफ सोचा जाना शुरू हो गया था. लेकिन मीनाक्षीपुरम की घटना ने उस दिशा में सोचने की गति काफी तेज कर दी क्योंकि इस घटना के बाद हिंदू जनजागरण का जो क्रम शुरू हुआ, वह पूरे देश में उत्साहवर्धक था जिससे ऊर्जा लेकर विश्व हिंदू परिषद ने 1983 में एकात्मता यात्रा शुरू की, ये 85000 किलोमीटर की यात्रा थी. उसे व्यापक जनसमर्थन मिला था. अगले साल ही 1984 में विश्व हिंदू परिषद ने ऐलान कर दिया कि वो राम जन्मभूमि को मुक्त करवाने के लिए व्यापक आंदोलन शुरू करेगी. ये पहला कदम माना जाता है.
 
मीनाक्षीपुरम घटना को लेकर संघ की सर्वोच्च समिति ने पारित किया ये प्रस्ताव

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अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (A.B.K.M.)  संघ के निर्णय लेने के लिए सर्वोच्च समिति मानी जाती है. उसकी बैठकों में देश या समाज के सामने आए सबसे गंभीर मुद्दों को लेकर ही प्रस्ताव पारित किए जाते हैं. A.B.K.M ने कहा, "ए.बी.के.एम. मीनाक्षीपुरम और तमिलनाडु के कुछ दूसरे गांवों में हिंदुओं के इस्लाम में हाल ही में हुए बड़े पैमाने पर धर्मांतरण को लेकर बहुत चिंतित है. रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि वहां और देश के दूसरे हिस्सों के कई गांवों में भी इस तरह के और बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की योजना बनाई जा रही है.

सभी निष्पक्ष एजेंसियों - प्रेस, सामाजिक संस्थाओं, धार्मिक और राजनीतिक समूहों - जिन्होंने मौके पर जाकर स्टडी की है, उन्होंने धर्मांतरण में भारी मात्रा में पैसे, दबाव और ऐसे दूसरे गैर-कानूनी और धर्म-विरोधी तरीकों के असर की पुष्टि की है.विदेशी पैसे के फ्लो का भी पूरा शक है."

 बालासाहब देवरस ने सामाजिक समरसता पर जोर दिया

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ‘हमारे बालासाहब देवरस’ में लिखते हैं कि, “विराट् हिंदू समाज' के सम्मेलन से जो सिलसिला प्रारंभ हुआ, वह समयानुसार परिवर्तित होता गया। समय-समय पर उसका रूप अलग-अलग था, लेकिन उसमें एक निरंतरता और एकरूपता भी थी. हिंदू समाज को संगठित और लक्ष्यबद्ध करने के लिए सामाजिक कुरीतियों को दूर करने पर अधिक बल था. जैसे ऊँच-नीच का भेदभाव - और छुआछूत को दूर करने का संकल्प उसके सम्मेलनों में लिया जाता था और उसे अपनाने के कार्यक्रम बनते थे. बालासाहब देवरस ने देश के हर हिस्से में संघ को ऐसे आयोजनों के लिए निर्देश भिजवाए.”
 
वो आगे लिखते हैं कि, “सन् 1981 में कर्नाटक में 'हिंदू समाजोत्सव' का आयोजन उसी निर्देश के बाद हुआ, जिसमें जाति, मजहब, राजनीति और दूसरे तरह के भेदभाव मिट गए. उसी तरह तमिलनाडु में 'हिंदू मुन्नानी संगठन' खड़ा हुआ. अगले साल बेंगलुरु में 'हिंद समागम' हुआ और उसी साल केरल में 'विराट् सम्मेलन' हुआ, जिसे बालासाहब देवरस ने संबोधित किया. महाराष्ट्र ने डॉ. भीमराव आंबेडकर के जन्मदिन पर वर्ष 1983 में 'सामाजिक समरसता मंच' प्रारंभ किया. उस मंच ने महात्मा फूले और भीमराव आंबेडकर यात्रा प्रारंभ की, जो डेढ़ महीने से ज्यादा चली. 7,000 किलोमीटर की उस यात्रा ने महाराष्ट्र में सामाजिक समरसता का संदेश तो दिया ही, बहुत समय से बैठाई हुई भ्रामक धारणा को भी मिटाया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सरसंघचालक का मूल दायित्व मार्गदर्शन का है”.

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पिछली कहानी: 12वीं पास छात्र ने दिल्ली में रखी RSS की नींव, असम में भी खोली पहली शाखा 

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