तिलक सिंह परमार के पिताजी गांधीजी के समर्थक थे लेकिन लोकमान्य तिलक की पूजा करते थे. सो अपने इकलौते बेटे का नाम रख दिया तिलक, पूरा नाम हुआ तिलक सिंह परमार. जिस एटा जिले में लोग किसी का सर काटकर रिक्शे में रखकर थाने पहुंच जाते हैं, उसी जिले में इनका जन्म आठ सितंबर 1929 को ऋषि पंचमी के दिन हुआ था. हालांकि अब उनका नगर कासगंज जो पहले उत्तर प्रदेश के एटा जिले का हिस्सा था. अब कासगंज जनपद के नाम से जाना जाता है. पिता का नाम ठाकुर शालिग्राम सिंह परमार एवं माता का नाम गंगा देवी था.
असहयोग आंदोलन की अचानक वापसी से तमाम लोग गांधीजी से नाराज हो गए थे. उनमें से बहुतों ने बाद में संघ का भी दामन थाम लिया था. छात्र जीवन के दौरान ही तिलक सिंह के सम्पर्क संघ से हो गए थे. लेकिन उनके कांग्रेसी पिता को नहीं भाता था. कई बार गुस्सा भी हुए. इनकी आरंभिक शिक्षा कासगंज नगर में हुई थी. यहीं वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए, उनके अगाध ज्ञान एवं हिंदुत्व के प्रति निष्ठा की चर्चा संघ के स्थानीय पदधिकारियों में होने लगी थी. वहां से आगे की पढ़ाई के लिए आगरा आए और दर्शन से एमए करने लगे. गांधीजी की हत्या के चलते उनकी भी गिरफ्तारी हुई, उनको एटा जेल में रखा गया, 6 महीने बाद ही रिहा हो पाए थे.
तिलक की पांचजन्य यात्रा
धीरे धीरे उनकी चर्चा संघ के प्रचारकों से होती हुए प्रांतीय नेतृत्व तक पहुंचने लगी थी. उस वक्त वो ‘पांचजन्य’ का सम्पादक ढूंढ रहे थे, जो लखनऊ में रहकर कम साधनों में ही अखबार निकाल सके. उन्हें 1954 में उस पाक्षिक अखबार का सम्पादक बना दिया गया. जो वेतन मिलता था, उससे बमुश्किल रहना, खाना हो पाता था, लेकिन जिम्मेदारी इतनी होती थी कि कहीं से प्रकाशित होने को खबरें या अन्य लेख ना आएं तो उन्हें खुद लिखकर पेज भरने होते थे. ऐसे में वे कई अलग अलग छद्मनामों से पांचजन्य में लिखते थे. लेकिन ऐसा एक दिन भी नहीं गया कि अखबार प्रकाशन के लिए जाने में देरी हुई हो. हालांकि इससे एक लाभ तो हुआ था, हिंदुत्व से जुड़े अलग अलग विषयों पर उनकी पकड़ मजबूत होती जा रही थी.
1954 से 1958 तक 'पांचजन्य' का संपादन दायित्व संभालने के समय से ही उनके चिंतन की धारा अध्यात्म व विरक्ति के पथ पर अग्रसर होने लगी. चार साल उन्होंने पूरी ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाई, लेकिन उनको मन भटक रहा था. स्वामी विवेकानंद से वो बहुत ही ज्यादा प्रभावित थे. उनका मन मोह माया के फेर से बाहर आने लगा. फलतः संपादक पद से त्यागपत्र देकर वे संन्यास की ओर अग्रसर हुए और सत्य की खोज में भटकने लगे. लेकिन उससे पहले उन्होंने माता पिता के बारे में भी सोचा कि उनको कम से कम एक तय राशि तो हर महीने मिलती ही रहे.
इतने दिनो में उन्होंने बच्चो के लिए कई किताबें लिख डालीं, उनके कॉपीराइट एक प्रकाशक को दिए और तय हुआ कि समय पर एक तय राशि उनके माता पिता को मिलती रहेगी. ऐसे में माता पिता ने उनको संन्यास की अनुमति दे दी लेकिन एक शर्त पिता ने ये ऱखी कि अक्सर साधु संन्यासी बनने के बाद लोग अपना नाम बदल लेते हैं, लेकिन वायदा करो कि तुम नहीं बदलोगे. उन्हें तिलक नाम से प्यार था और उसका सम्मान भी. हालांकि उनके पिता को ये नहीं पता था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक हेडगेवार भी लोकमान्य तिलक का इतना ही सम्मान करते थे. जो भी हो स्व की खोज के लिए पिता की शर्त को तिलक सिंह ने मान लिया और कभी अपना नाम नहीं बदला.
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इस खोज को विराम मिला नर्मदा तट स्थित चिचोरखेड़ा जो जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हैं. यहां उनके गुरु बने सिद्धगुरू बजरंग दास. उनको गुरु क्यों बनाया होगा, आप इस एक घटना से बखूबी समझ सकते हैं. एक बार तिलक सिंह परमार ने बाबा बजरंग दास से कहा कि मुझे आपकी जीवनी लिखनी है, आप अतीत की वो घटनाएं बताएं, जो आप के लिए इतनी जरूरी थीं कि उन्हें आप भूल ही नहीं सकते. बाबा मुस्कराए और बोले, “ना अतीत का कुछ याद, नाम भविष्य के बारे में कोई चिंता, ये सब होता तो संन्यासी होता. जो तुमने देखा है, जो तुम जानते हो वो लिखो.” ये उत्तर किसी भी गंभीर व्यक्ति के लिए बहुत बड़ा संदेश था कि संन्यासी को व्यक्तिगत लाभ-हानि, यश-अपयश इन सबसे ऊपर उठ जाना चाहिए.
उन्हें तब खुद पर गर्व महसूस हो रहा था कि उन्होंने जिसे गुरु मानकर दीक्षा ली है, इतने साल जिनकी सेवा की है, वो इतने परम ज्ञानी हैं. तिलक सिंह परमार अब तिलक स्वामी या तिलक परमहंस बनकर आध्यात्म की दुनियां में ही रमने लगे. बचपन में उन्होंने पिता की बीमारी के चलते काफी दुखभरे दिन भी देखे थे, यहां तक अपनी पढ़ाई भी पूरी ट्यूशन करके की थी. एक बार तो बचपन में उनकी मां ने जब खाने को घर में कुछ नहीं तो जंगली घास ही उबालकर दे दी थी, जिसे तिलक ने उठाकर फेंक दिया था और गुस्से में कहा था, जिस भगवान की तुम इतनी पूजा करती हो, उसके पास हमारे लिए बस ये है? तब उनकी मां ने समझाया था कि, “तुम क्या जानते हो भगवान के बारे में? वो हमारे कमों के लिए जिम्मेदार नहीं, और ये हमारे कर्मों का फल है. पिछले जीवन में किए कर्मों का फल”. उनके पिता बचपन से ही उन्हें योगियों की कहानियां सुनाया करते थे कि कैसे वो लोग बिना कुछ पहने, बिना कुछ खाए जीवन बिताते थे. शायद वहीं से उनका मन बदलने लगा था.
जब घर से निकले थे तिलक सिंह तो उनके सैंडल्स टूट गए थे, उसी दिन से उन्होंने चप्पल, जूतों को तिलांजलि ही दे दी. फिर नंगे पैर ही वो पूरे भारती की यात्रा करते रहे थे, तब जाकर बाबा बजरंग दास की कुटिया में बैठे थे. बाबा बजरंग दास के आश्रम में कुछ महीने रहने के बाद स्वामी तिलक ने दक्षिण का रुख किया और 8 साल तक एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहे, दुनियां समझते रहे. वहां रहते हुए ही उनको अंग्रेजी बोलने में महारत हासिल हो गई थी. बाद में स्पेनिश भी उनके लिए हिंदी जैसी हो गई थी. अब उन्हें विदेशों से न्यौते मिलने लगे थे. ऐसे में उन्होंने बाइबिल भी पढ़ी ताकि दूसरे धर्म के लोगों को भी तलनात्मक और समान अर्थ वाली बातें बताई जा सकें.
संन्यासी से ‘नव्य विवेकानंद’ तक का सफर
संन्यासी तिलक 18 वर्षों तक हिमालय से कन्याकुमारी तक की अनवरत तीन बार पैदल परिक्रमा करने वाले परिव्राजक थे। इसी के साथ वे स्वामी विवेकानंद की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए स्थापित 'विवेकानंद शिला स्मारक' के निर्माण हेतु भेजी गई प्रथम नौका के जलावतरण के मुख्य संत थे. उन्हीं के करकमलों से इस नौका का जलावतरण संपन्न हुआ. इसके अलावा 1961 में महाराष्ट्र के नांदेड़ तीर्थ में अनवरत कई मास प्रतिदिन व्याख्यान देने वाले स्वामी तिलक 1962 से 1968 तक आंध्र प्रदेश, केरल एवं तमिलनाडु में हिंदू धर्म को अपने व्याख्यानों से नई दिशा देते रहे.
1968 में स्वामी विवेकानंद की भांति हिंदू धर्म की अलख जगाने के लिए स्वामी तिलक विदेश चले गए. वे श्रीलंका, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी, टोंगा, समाओआ, उत्तरी अमेरिका, मेक्सिको, दक्षिण अमेरिका, यूरोप- इंग्लैंड, ग्रीस, पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया, स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्पेन, इटली, रूस, मिस्र, सूडान, केन्या, ब्राजील, होंडुरास, ग्वाटेमाला, अर्जेंटीना, त्रिनिदाद, गुयाना, जमैका, इंडोनेशिया, सुमात्रा, मलेशिया एवं क्यूबा आदि लगभग 60 देशों में तीन हजार दिनों की यात्राओं और 2500 व्याख्यानों के सर्जक बने. इसी दौरान हिंदू धर्म पर स्वामी जी की 12 पुस्तकें हिंदी और छह पुस्तकें अंग्रेजी में प्रकाशित हुईं. जबकि तिलक सिंह परमार, 'तिलक', 'धर्म मार्तण्ड', सब्यसाची, पुरातन, चिरंतन, यात्री आदि नामों से लेख तो उन्होंने इतने लिखे कि गिनना मुश्किल है. हिंदी की मानक भाषा के अतिरिक्त स्वामी जी ब्रज भाषा व अवधी, संस्कृत, मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ एवं मलयालम आदि भारतीय तथा अंग्रेजी, स्पेनिश, पोर्चुगीज एवं जापानी आदि विदेशी भाषाओं पर पूर्ण अधिकार रखते थे.
स्वामी तिलक का 11 मई 1984 को स्पेन के बार्सिलोना तथा बैलन्सिया नगर के मध्य स्वयं कार चलाते हुए एक दुर्घटना में निधन हुआ. स्वामी जी के निधन के बाद अमेरिकी समाचारपत्रों ने उन्हें 'शंकराचार्य की प्रतिभा, बुद्ध की करुणा, आचार्य रामानुज का समर्पण, विवेकानंद का शौर्य तथा दयानंद की इच्छा शक्ति का एकीकृत स्वरूप' बताया, तो कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें 'नव्य विवेकानंद' की सर्वथा सार्थक उपाधि से विभूषित किया. अब स्वामी जी तो नहीं हैं, किंतु अमेरिका में उनकी प्रेरणा से स्थापित हिंदू यूनिवर्सिटी तथा स्वामी तिलक फाउंडेशन आज भी स्वामी तिलक की वैचारिकी के वाहक हैं.
अपने पीछे वार्सिलोना के ग्रानाडा में शिष्य के तौर पर अपना उत्तराधिकारी भी छोड़ गए हैं. इन अंग्रेज संन्यासी का नाम भी तिलक के ही नाम पर है, स्वामी शंकरातिलकानंदा. वो एक लेख में लिखते हैं कि मेरी उनसे पहली मुलाकात मेंरे ही शहर में 1976 में हुई थी, लेकिन उन्होंने मुझे शिष्य तब बनाया जब मैं 1978 में भारत गया, उनसे मिला. हालांकि उनके लेख पढ़ते वक्त वो मासूम भी लगते हैं, लिखते हैं कि हमारे गुरूजी अपनी युवावस्था में स्वामी दयानंद सरस्वती के सहयोगी थे. जबकि गुरु तिलक का जन्म स्वामीजी की मौत के 46 साल बाद हुआ था.
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विष्णु शर्मा