'सतलुज फिल्म हटाने में BJP या केंद्र का कोई हाथ नहीं', बोले रवनीत सिंह बिट्टू

रवनीत सिंह बिट्टू ने ओटीटी से फिल्म 'सतलुज' को हटाए जाने के पीछे बीजेपी या केंद्र सरकार का हाथ होने से साफ इनकार किया है. उन्होंने कहा कि विरोधियों द्वारा लगाए जा रहे आरोप पूरी तरह राजनीति से प्रेरित और बेबुनियाद हैं.

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फिल्म 'सतलुज' विवाद पर बोले रवनीत सिंह बिट्टू. (File Photo) फिल्म 'सतलुज' विवाद पर बोले रवनीत सिंह बिट्टू. (File Photo)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:26 PM IST

ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 (ZEE5) से फिल्म 'सतलुज' हटाए जाने पर मचे बवाल के बीच केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने बड़ा बयान दिया है. उन्होंने साफ किया कि इस फिल्म को हटाने में बीजेपी या केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है. उनके मुताबिक, यह फैसला पूरी तरह ओटीटी प्लेटफॉर्म का अपना होता है, सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है.

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न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा कि कुछ राजनीतिक दल बिना किसी वजह के इस मामले में बीजेपी का नाम घसीट रहे हैं. उन्होंने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि फिल्म को हटाने का फैसला जी5 ने अपनी आंतरिक नीतियों के तहत लिया होगा. इस पूरे मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधना सिर्फ राजनीति से प्रेरित है.

ओटीटी प्लेटफॉर्म खुद लेते हैं फैसला

उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म के नियमों को समझाते हुए कहा कि सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली फिल्मों का सिस्टम अलग होता है, लेकिन ओटीटी के नियम बिल्कुल जुदा हैं. किसी भी फिल्म को दिखाना, हटाना या जारी रखना पूरी तरह कंपनी का अपना अधिकार है. यह फैसला वे अपने संपादकीय, कानूनी और कमर्शियल नियमों के आधार पर खुद लेती हैं.

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'सतलुज' फिल्म पहले 'पंजाब 95' नाम से बनाई गई थी. यह मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है, जिसमें पंजाब के आतंकवाद के दौर को दिखाया गया है. यह फिल्म 3 जुलाई को जी5 पर नए नाम 'सतलुज' के साथ रिलीज हुई थी, लेकिन ठीक दो दिन बाद 5 जुलाई को इसे प्लेटफॉर्म से अचानक हटा दिया गया.

इतिहास को एकतरफा नहीं देखना चाहिए

रवनीत सिंह बिट्टू के मुताबिक, पंजाब के इतिहास को सिर्फ एक पक्ष से देखना गलत होगा क्योंकि उस दौर में आतंकवाद की वजह से हजारों आम नागरिकों, पुलिसकर्मियों, सरकारी कर्मचारियों और साधारण परिवारों ने बहुत भारी दर्द झेला है, इसलिए ऐसे संवेदनशील समय पर बातचीत करते समय सभी पहलुओं को ईमानदारी से सामने रखना जरूरी है. इसी सिलसिले में उन्होंने अपील की कि इतिहास पर बहस जरूर हो, लेकिन वह अफवाहों के बजाय पक्के तथ्यों के आधार पर की जानी चाहिए, ताकि किसी भी मुद्दे को राजनीतिक विवाद बनाकर लोगों को गुमराह न किया जा सके.

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