ग्राउंड रिपोर्ट: प्रतीक यादव की अंतिम विदाई... जब सिसकते परिवार की 'ढाल' बने बड़े भाई अखिलेश यादव

प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार में समाजवादी परिवार ने एकजुटता का परिचय दिया. अखिलेश यादव ने अपनी भतीजी का हाथ थामकर परिवार को सहारा दिया. राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर सभी नेता एक साथ नजर आए. वो लगाता प्रतीक यादव की छोटी बेटी को ढांढस बंधाते दिखे.

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अखिलेश यादव का प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार में भावुक रूप दिखा. (Photo- ITGD) अखिलेश यादव का प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार में भावुक रूप दिखा. (Photo- ITGD)

समर्थ श्रीवास्तव

  • लखनऊ,
  • 15 मई 2026,
  • अपडेटेड 9:58 AM IST

14 मई की सुबह आम दिनों जैसी नहीं थी. हवा में एक भारीपन था और आंखों में नमी. समाजवादी कुनबे के लिए ये एक ऐसा नुकसान है, जिसकी भरपाई शब्दों में मुमकिन नहीं. स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे प्रतीक यादव आज पंचतत्व में विलीन हो गए. एक रिपोर्टर के तौर पर मैंने वहां जो देखा, वो सिर्फ एक शव यात्रा नहीं थी, बल्कि एक टूटते हुए परिवार को संबल देने की कोशिश थी.

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शव यात्रा जैसे ही शुरू हुई, 'प्रतीक भैया अमर रहें' के नारों के बीच सिर्फ सिसकियों की आवाज सुनाई दे रही थीं. समर्थकों का हुजूम था, लेकिन हर चेहरा झुका हुआ था. मुखाग्नि के समय जब मंत्रोच्चारण शुरू हुआ, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं.

लेकिन इस पूरी भीड़ के बीच एक तस्वीर ऐसी थी, जिसने सबका ध्यान खींचा और राजनीति के सख्त चेहरों के पीछे छिपी मानवीय संवेदनाओं को उजागर कर दिया.

भतीजी का हाथ और अखिलेश का साथ

अंतिम संस्कार की रस्मों के बीच अखिलेश यादव का एक अलग ही रूप देखने को मिला. वो सिर्फ एक पूर्व मुख्यमंत्री या समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर वहां नहीं थे, बल्कि वो एक 'अभिभावक' की भूमिका में नजर आए. पूरी प्रक्रिया के दौरान अखिलेश अपनी भतीजी (प्रतीक की छोटी बेटी) के बगल में बैठे रहे. वो मासूम बच्ची, जो शायद इस पूरी त्रासदी की गहराई को समझने के लिए बहुत छोटी है, अपने आसपास के माहौल से सहमी हुई थी. अखिलेश ने न सिर्फ उसका हाथ थामे रखा, बल्कि उसे दुलारते हुए चॉकलेट भी खिलाई.

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भीड़ के शोर और श्मशान की तपिश के बीच, अखिलेश अपनी भतीजी के कान में कुछ फुसफुसाते और उसे ढांढस बंधाते दिखे. वो मंजर ये बताने के लिए काफी था कि नेता जी के जाने के बाद अब परिवार की हर छोटी-बड़ी जिम्मेदारी और बच्चों के सिर पर साया बनकर अखिलेश ही खड़े हैं.

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बड़ों का साया और एकजुटता का संदेश

इतना ही नहीं अखिलेश के बगल में शिवपाल यादव भी मौजूद रहे. जिनके बगल में प्रतीक की बड़ी बेटी बैठी नजर आई. सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में परिवार को लेकर चाहे जो भी बातें होती रही हों, लेकिन आज की तस्वीरों ने साफ कर दिया कि दुख की इस घड़ी में परिवार चट्टान की तरह एक साथ है. अखिलेश यादव का अपनी भतीजी के लिए वो सहज प्रेम ये दिखा रहा था कि रिश्तों की डोर राजनीति से कहीं ज्यादा मजबूत होती है.

जब प्रतीक का पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ, तब अखिलेश की नजरें अपनी भतीजी और परिवार के अन्य सदस्यों पर ही टिकी थीं. एक रिपोर्टर के तौर पर मैंने महसूस किया कि आज वहां कोई 'नेता' नहीं था, बस एक बड़ा भाई था जो अपने छोटे भाई की कमी को अपने प्यार और संरक्षण से भरने की कोशिश कर रहा था.

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सियासत थमी, संवेदनाएं जागीं

उत्तर प्रदेश की धरा, जो अपनी तीखी सियासी तपिश और वैचारिक जंग के लिए दुनिया भर में मशहूर है, आज एक अलग ही मंजर की गवाह बनी. आज वहां न कोई 'लाल टोपी' थी, न कोई 'केसरिया' खेमा. आज वहां न सत्ता का गुरूर था, न विपक्ष का आक्रामक तेवर. आज तो बस एक 'छत' थी, जिसके नीचे उत्तर प्रदेश की समूची सियासत सिमट आई थी.

मंजर ऐसा था मानो वक्त ने कुछ देर के लिए अपनी रफ्तार रोक ली हो. प्रतीक यादव की असामयिक विदाई ने उन फासलों को पाट दिया जिन्हें भरने में दशकों लग जाते हैं. एक रिपोर्टर के तौर पर मेरी नजरों के सामने वो मंजर था, जहां समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता, मंत्री और विधायक कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे.

शायद मृत्यु ही वो अंतिम सत्य है, जो इंसान को उसकी नश्वरता और आपसी रिश्तों की अहमियत समझा देती है. आज किसी की किसी से कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं थी, क्योंकि आज हार-जीत का नहीं, बल्कि एक अपूरणीय क्षति के शोक में डूबे परिवार को सहारा देने का दिन था. हवाओं में तैरती खामोशी और नम आंखें गवाह थीं कि राजनीति विचारधाराओं का संघर्ष तो हो सकती है, लेकिन वो मानवीय संवेदनाओं से ऊपर नहीं है.

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सदन में एक-दूसरे पर शब्दों के बाण चलाने वाले हाथ आज एक-दूसरे को सांत्वना देने के लिए आगे बढ़ रहे थे. ये सिर्फ एक श्रद्धांजलि सभा नहीं थी, बल्कि ये उस भारतीय लोकतांत्रिक संस्कृति की झलक थी, जहां निजी दुखों में 'पक्ष' और 'विपक्ष' की सरहदें धुंधली पड़ जाती हैं. यूपी की मिट्टी ने देखा कि जब गम का सैलाब आता है, तो राजनीति के बड़े-बड़े बुर्ज भी झुक जाते हैं और सिर्फ इंसानियत बाकी रह जाती है.

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