ब्रह्मोस, रेयर अर्थ मैटेरियल और समुद्री सीमा... PM मोदी का एक दौरा चीन के लिए कहां-कहां टेंशन है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की यात्रा से इंडो पैसिफिक और दक्षिण चीन सागर में सुरक्षा के समीकरण बदलने वाले हैं. भारत इन यात्राओं के जरिये इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है. लेकिन इसका असर चीन की कूटनीति पर देखने को मिल सकता है.

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PM मोदी 11 जुलाई तक विदेश यात्रा पर हैं. (Photo: ITG) PM मोदी 11 जुलाई तक विदेश यात्रा पर हैं. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 8:31 AM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड दौरा सिर्फ एक कूटनीतिक यात्रा नहीं है, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती रणनीतिक भूमिका का प्रदर्शन भी है. इस दौरे में जिन समझौतों और साझेदारियों पर चर्चा हो रही है, उनका असर सीधे तौर पर चीन की रणनीतिक क्षमता पर पड़ सकता है. प्रधानमंत्री मोदी की ये यात्राएं दक्षिण चीन सागर में शक्ति के संतुलन पर असल डालने वाली हैं. 

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भारत ने इंडोनेशिया को ब्रह्मोस और अस्त्र देकर इस पूरे रेंज में चीन की दादागिरी पर एक ब्रेक सा लगा दिया है. 

पिछले कुछ सालों में चीन ने इंडो पैसिफिक और दक्षिण चीन सागर के कई देशों पर धौंस जमाने की कोशिश की. एक ऐसी रणनीति पर काम किया, जिससे वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देशों पर सीधा दबाव बढ़ा. और तो और चीन ने दक्षिण चीन सागर के साथ भारत की घेराबंदी के लिए इंडिया के पड़ोसी देशों को साधने की कोशिश की. 

इंडोनेशिया की समुद्री सीमा के लिए ब्रह्मोस

अब भारत के सहयोग से इंडोनेशिया ने तय किया है कि वो अपनी सीमाओं की निगरानी और सुरक्षा मजबूत करेगा और इसीलिए उसने ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने का फैसला किया है. इससे अब इंडोनेशिया की समुद्री निगरानी क्षमता बढ़ेगी. समुद्री सीमा की निगहबानी मजबूत होगी. इसके अलावा किसी भी संभावित हमले के खिलाफ उसकी जवाबी क्षमता बढ़ जाएगी. 

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यानी भारत की ब्रह्मोस मिसाइल इंडोनेशिया पर चीन के दबाव को कम करेगी. 

ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से दुश्मन के जहाजों, समुद्री ठिकानों और जमीन पर मौजूद सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है.  इंडोनेशिया की बढ़ती ताकत को देख चीन का परेशान होना लाजिमी है. 

ब्रह्मोस डील के अलावा भारत भारत और इंडोनेशिया के बीच सबांग पोर्ट को लेकर बढ़ता सहयोग सबसे अधिक चर्चा में है. सबांग बंदरगाह मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित है, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों में से एक गुजरता है. चीन का लगभग 80 प्रतिशत ऊर्जा आयात इसी रास्ते से होकर आता है. ऐसे में भारत की बढ़ती मौजूदगी चीन का टेंशन और बढ़ा सकती है. 

इंडोनेशिया के बाद पीएम मोदी की यात्रा का अगला पड़ाव ऑस्ट्रेलिया है. मोदी 8 जुलाई को मेलबर्न पहुंचेंगे जहां उनका ऑस्ट्रेलिया दौरा 8–10 जुलाई तक चलेगा. 

ऑस्ट्रेलिया के साथ रेयर अर्थ मैटेरियल की डील

भारत और ऑस्ट्रेलिया पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक साझेदार के रूप में तेजी से करीब आए हैं. दोनों देश क्वाड समूह का हिस्सा हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त एवं खुले समुद्री मार्गों की वकालत करते हैं. पीएम मोदी की इस यात्रा में महत्वपूर्ण खनिजों, सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन और रक्षा सहयोग पर चर्चा केंद्र में है. 

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चीन लंबे समय से दुर्लभ खनिजों और इसके वैश्विक सप्लाई चेन पर अपनी पकड़ बनाए हुए है. चीन दुर्लभ खनिज यानी रेयर अर्थ मैटेरियल पर एकाधिकार के जरिये अपने कूटनीतिक और व्यापारिक हित साधता है. लेकिन भारत को ऑस्ट्रेलिया से उम्मीद नजर आती है. 

यह भी पढ़ें: मलक्का के मुहाने पर भारत की रणनीतिक एंट्री, सबांग पोर्ट बनेगा हिंद महासागर का नया 'होर्मुज'

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच इस बार रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स सहयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा का सबसे अहम एजेंडा माना जा रहा है. दोनों देश ऐसे समझौतों पर काम कर रहे हैं, जिनसे भारत की चीन पर निर्भरता कम हो और इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और रक्षा उद्योग के लिए जरूरी खनिजों की सुरक्षित सप्लाई सुनिश्चित हो सके. 

पीएम मोदी ने कहा है कि उनकी यह यात्रा भारत-ऑस्ट्रेलिया की 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी' को और मज़बूत करेगी. उन्होंने कहा है कि वे प्रधानमंत्री अल्बानीज के साथ बातचीत में रक्षा और सुरक्षा, व्यापार और निवेश के क्षेत्र में रिश्तों को आगे बढ़ाएंगे. 

ऑस्ट्रेलिया दुनिया के सबसे बड़े क्रिटिकल मिनरल्स उत्पादकों में है. भारत लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और रेयर अर्थ मैग्नेट की लंबे समय की जरूरतों की सप्लाई सुनिश्चित करना चाहता है. 

भारत और ऑस्ट्रेलिया यदि इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाते हैं तो चीन के आर्थिक प्रभाव को चुनौती मिल सकती है. इसके अलावा दोनों देशों के बीच समुद्री अभ्यास और रक्षा तकनीक सहयोग भी चीन के लिए एक रणनीतिक संदेश माना जा रहा है. 

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न्यूजीलैंड: व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता

ऑस्ट्रेलिया के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न्यूजीलैंड के दौरे पर होंगे. न्यूजीलैंड भले ही सैन्य दृष्टि से बड़ा खिलाड़ी न हो, लेकिन अपने लोकेशन की वजह से हिंद-प्रशांत की राजनीति में उसका महत्व बढ़ रहा है. भारत और न्यूजीलैंड के बीच व्यापार, कृषि, शिक्षा और डिजिटल सहयोग पर जोर दिया जा रहा है. दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर भी चर्चा तेज हुई है. लेकिन इसे अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है. चीन लंबे समय से न्यूजीलैंड का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है, लेकिन वेलिंगटन अब अपने आर्थिक विकल्पों को विविध बनाने की कोशिश कर रहा है. 

पीएम मोदी ने कहा है कि अपनी न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान वे आर्थिक, व्यापारिक और कमर्शियल संबंधों को और कैसे बेहतर बनाया जाए इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे. 

इस पूरे दौरे का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत हिंद-प्रशांत में एक सक्रिय शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को लगातार विस्तार दे रहा है. चाहे वह ब्रह्मोस जैसी रक्षा क्षमताओं का निर्यात हो, समुद्री मार्गों की सुरक्षा हो या फिर वैकल्पिक व्यापारिक और तकनीकी साझेदारियों का निर्माण, हर कदम चीन के प्रभाव क्षेत्र को संतुलित करने की दिशा में देखा जा रहा है.

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