जमानत याचिकाओं में जजों को कॉमन सेंस का प्रयोग करना चाहिए- CJI डीवाई चंद्रचूड़

भारत के चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, "जिन लोगों को निचली अदालतों से जमानत मिलनी चाहिए, उन्हें वहां नहीं मिल रही है, इसकी वजह से उन्हें हमेशा उच्च न्यायालयों का रुख करना पड़ता है."

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CJI डीवाई चंद्रचूड़ (फाइल फोटो) CJI डीवाई चंद्रचूड़ (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • बेंगलुरु,
  • 29 जुलाई 2024,
  • अपडेटेड 9:37 AM IST

भारत के चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ (DY Chandrachud) ने रविवार को कहा कि जब अपराध के अहम मुद्दों को संदेह के नजरिए से देखा जाता है, तो ट्रायल जज जमानत न देकर सेफ खेलना पसंद करते हैं. चीफ जस्टिस ने हर मामले की बारीकियों को देखने के लिए ‘मजबूत कॉमन सेंस’ की जरूरत पर जोर दिया.

CJI चंद्रचूड़ ने कहा, "जिन लोगों को निचली अदालतों से जमानत मिलनी चाहिए, उन्हें वहां नहीं मिल रही है. इसकी वजह से उन्हें हमेशा उच्च न्यायालयों का रुख करना पड़ता है. जिन लोगों को उच्च न्यायालयों से जमानत मिलनी चाहिए, उन्हें जरूरी नहीं कि वह मिले, इसकी वजह से उन्हें सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ता है. यह देरी उन लोगों की मुश्किल को और बढ़ा देती है, जिन्हें मनमानी गिरफ्तारी का सामना करना पड़ रहा है."

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चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ बर्कले सेंटर (Berkeley Centre) के 11वें वार्षिक सम्मेलन में तुलनात्मक समानता और भेदभाव विरोधी (Comparative Equality and Anti-Discrimination) मुद्दे पर स्पीच दे रहे थे. इस दौरान उनसे कुछ सवाल पूछे गए, जिसके जवाब में उन्होंने ये बातें कही. CJI से किया गया सवाल मनमाने ढंग से की जाने वाली गिरफ्तारियों के बारे में था.

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सवाल करने वाले ने कहा कि हम ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहां पहले काम किया जाता है और बाद में माफी मांगी जाती है. यह बात विशेष रूप से पब्लिक अथॉरिटीज के लिए सच हो गई है, जो राजनीतिक रूप से प्रेरित तरीके से कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, पत्रकारों और यहां तक कि विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों सहित राजनेताओं को हिरासत में लेकर काम कर रहे हैं. सवाल करने वाले शख्स के मुताबिक, ये सभी काम गहरे विश्वास के साथ किए जाते हैं, क्योंकि इंसाफ मिलने में बहुत ज्यादा वक्त लग जाता है.

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'गंभीर मामलों में जमानस से बच रहे ट्रायल जज...'

सवाल के जवाब में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट लगातार यह बताने की कोशिश कर रहा है कि इसकी एक वजह यह भी है कि देश के संस्थानों में अंतर्निहित अविश्वास है. मुझे लगता है कि यह अहम है कि हम उन लोगों पर भरोसा करना सीखें जो हायरार्कियल लीगल सिस्टम में हैं, जैसे कि बहुत नीचे, जो कि ट्रायल कोर्ट हैं. हमें ट्रायल कोर्ट को प्रोत्साहित करना होगा कि वे आजादी चाहने वाले लोगों की चिंताओं को समायोजित करने की जरूरत के प्रति ज्यादा ध्यान दें."

CJI चंद्रचूड़ आगे कहते हैं कि दुर्भाग्यवश, आज समस्या यह है कि हम ट्रायल जजों द्वारा दी गई किसी भी राहत को संदेह के नजरिए से देखते हैं. इसका मतलब यह है कि ट्रायल जज गंभीर अपराधों के अहम मामलों में जमानत देने से बचते हुए आगे बढ़ रहे हैं.

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CJI के मुताबिक, जजों को हर मामले की बारीकियों और उसके बारीक पहलुओं को देखना चाहिए. आपके (जज) पास मजबूत कॉमन सेंस होना चाहिए. अब, जब तक हम आपराधिक न्यायशास्त्र में अनाज को भूसे से अलग नहीं करते, तब तक यह बहुत कम उम्मीद है कि हमारे पास न्यायसंगत समाधान होंगे. फैसला देने वालों को अनाज को भूसे से अलग करने की छूट देने के लिए, यह अहम है कि हम भरोसा भी रखें.

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'मुझे इस बात से नफरत है...'

चीफ जस्टिस के मुताबिक, ज्यादातर मामलों को सुप्रीम कोर्ट में आना ही नहीं चाहिए था. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि हम जमानत को प्राथमिकता इसलिए दे रहे हैं, जिससे पूरे देश में यह मैसेज जाए कि फैसला लेने की प्रक्रिया के सबसे शुरुआती स्तर पर बैठे लोगों को यह भावना रखे बिना अपना कर्तव्य निभाना चाहिए. मुझे इस बात से नफरत है कि मेरा करियर दांव पर लग जाएगा.

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