भोजशाला विवाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट ने नया भूचाल ला दिया है. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ के आदेश के पालन में एएसआई ने 22 मार्च 2024 से भोजशाला मंदिर सह कमाल मौला मस्जिद परिसर और उसके 50 मीटर परिधीय क्षेत्र में वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और उत्खनन किया. यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप की गई और इस दौरान मौजूदा संरचना के स्वरूप को बदले बिना काम किया गया.
जांच और उत्खनन के दौरान मिली सभी वस्तुओं का विधिवत दस्तावेजीकरण किया गया. इनमें शिलालेख, मूर्तियां, सिक्के, स्थापत्य अवशेष, मिट्टी के बर्तन, टेराकोटा, पत्थर, धातु और कांच की वस्तुएं शामिल हैं.
आंगन में किया गया रडार सर्वे
साल 1951 में 'प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष (राष्ट्रीय महत्व की घोषणा) अधिनियम' के तहत भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया था. इसी वजह से पूरी जांच बेहद सावधानी से की गई ताकि मौजूदा ढांचे को कोई नुकसान न पहुंचे.
ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (जीपीआर) सर्वे आंगन में किया गया. इसमें तीन परतों वाली भू-आकृति का पता चला. पहली परत लगभग 1 मीटर मोटी है, जिसमें पत्थर की पट्टियों से बनी संरचनाएं हैं और स्पष्ट स्तरीकरण नहीं दिखता. दूसरी परत 4-5 मीटर तक फैली है और खंडित सामग्री से भरी है. तीसरी परत 5 मीटर से अधिक गहराई में है और इसे लगभग अक्षुण्ण आधार स्तर माना गया है, जहां सभी संरचनाएं स्थित हैं.
जांच में क्या आया सामने?
ASI के मुताबिक सर्वेक्षण, उत्खनन, शिलालेखों के अध्ययन, मूर्तियों और स्थापत्य टुकड़ों की जांच के आधार पर कहा जा सकता है कि मौजूदा संरचना एक पूर्ववर्ती बेसाल्ट संरचना के ऊपर निर्मित है जिसका निचला हिस्सा आज भी आधार के रूप में मौजूद है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस स्थल पर वास्तुकला के तीन अलग-अलग चरण रहे. मौजूदा ढांचा तीसरे चरण का प्रतिनिधित्व करता है जो पहले के क्षतिग्रस्त ढांचे के ऊपर निर्मित है.
उत्खनन में पक्की ईंटों से बनी संरचनाएं भी मिलीं. दक्षिण-पश्चिम कोने में खुदाई के दौरान सामने आई दीवारें बताती हैं कि शुरुआती संरचनाएं प्राकृतिक मिट्टी पर ईंटों से बनी थीं. मोटी और ऊंची दीवारें संकेत देती हैं कि यह संभवतः सार्वजनिक उपयोग की विशाल संरचना रही होगी. मुख्य संरचना के आसपास की संरचनाओं का स्तर समय-समय पर ऊंचा किया गया, जिससे संकेत मिलता है कि यह स्थल लंबे समय तक उपयोग में रहा. ठोस चबूतरे, मोटी ईंटों की दीवारें और फर्श सार्वजनिक उपयोग का संकेत देते हैं.
मिला 'शारदा सदन' शिलालेख
इन प्राचीन संरचनाओं के अवशेष आज भी यथास्थान मौजूद हैं और बेसाल्ट की भारी शिलाओं के नीचे दबे हैं. प्राप्त कलाकृतियों के आधार पर इन ईंट संरचनाओं को परमार काल (10वीं-11वीं शताब्दी) का माना गया है. बेसाल्ट पत्थर से बनी संरचनाएं भी मिलीं. पहले की ईंट संरचनाओं को स्थानीय बेसाल्ट पत्थर से विस्तारित किया गया. कई शिलालेख बड़ी बेसाल्ट शिलाओं पर उत्कीर्ण मिले.
'शारदा सदन' का उल्लेख परिजातमंजरी नामक शिलालेख में मिलता है, जो वर्तमान संरचना में स्थापित है. सैकड़ों शिलालेखों के टुकड़े संकेत देते हैं कि ये पहले पत्थर की संरचना का हिस्सा रहे होंगे. रिपोर्ट के अनुसार पत्थर संरचना के ऊपरी भाग में बाद में बदलाव किए गए और इसे मस्जिद में परिवर्तित किया गया. पूर्ववर्ती संरचना में प्रवेश के साक्ष्य भी स्पष्ट हैं. पूर्वी क्षेत्र मौजूदा संरचना के स्तर से 3-4 मीटर ऊंचा है, जहां कई कब्रें हैं. सीमित स्थान के कारण पूर्वी हिस्से में खुदाई संभव नहीं हो सकी.
देवी-देवताओं की आकृतियों को किया गया विकृत?
मौजूदा ढांचा एक विशाल बेसाल्ट चबूतरे पर बना है. ऊपरी हिस्सा सामग्री और शैली में अलग दिखता है. इसमें मुख्यतः चूना पत्थर का उपयोग हुआ है, जबकि पहले की बेसाल्ट संरचना के कुछ हिस्सों का पुन: उपयोग किया गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान संरचना जल्दबाजी में बनाई गई प्रतीत होती है. दीवारों में पत्थरों की परतें असमान हैं और ब्लॉक एक समान आकार में तराशे नहीं गए. मुख्य गुंबद में कमल और संकेंद्रित वृत्तों की नक्काशी है. उत्तर में छोटा गुंबद है, जबकि दक्षिण में नहीं. पश्चिमी मेहराब नई संरचना मानी गई है.
पूर्व संरचना के स्तंभ, बीम और खिड़कियों पर उकेरी गई मूर्तियों को काटकर पुन: उपयोग किया गया. देवी-देवताओं की आकृतियों को विकृत किए जाने के भी संकेत मिले हैं. संस्कृत और प्राकृत के शिलालेखों के अलावा 56 अरबी और फारसी शिलालेख भी दर्ज किए गए, जिनमें आगंतुकों के उल्लेख, धार्मिक वाक्यांश और फारसी दोहे शामिल हैं.
'ॐ सरस्वती नमः' और 'ॐ नमः शिवाय' वाले शिलालेख
उत्खनन में इंडो-ससानियन, दिल्ली सल्तनत, मालवा सुल्तान, मुगल, धार राज्य, ब्रिटिश और स्वतंत्र भारत काल के कुल 31 सिक्के मिले. सबसे पुराने सिक्के 10वीं-11वीं शताब्दी के माने गए हैं. पूर्वी स्तंभों में प्राकृत भाषा के 'अवनिकूर्माशतम' शिलालेख मिले, जिन्हें परमार राजा भोज से जोड़ा जाता है. शिलालेखों की शुरुआत 'ॐ सरस्वती नमः' और 'ॐ नमः शिवाय' से होती है. एक अन्य शिलालेख में परिजातमंजरी नाटिका और परमार वंश के राजाओं का उल्लेख है. इसमें सरस्वती मंदिर में प्रथम प्रदर्शन का जिक्र भी मिलता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि संस्कृत और प्राकृत शिलालेख अरबी-फारसी शिलालेखों से पूर्व के हैं. 859 हिजरी (1455 ईस्वी) के महमूद शाह खिलजी के शिलालेख में उल्लेख है कि इस पुराने मठ में स्थित धर्म केंद्र को मूर्तियां तोड़कर मस्जिद में बदला गया. एएसआई ने स्थापत्य अवशेषों, मूर्तियों और शिलालेखों के आधार पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत में सौंपी है.
संजय शर्मा