महाराष्ट्र की राजनीति में एक वायरल तस्वीर और कुछ सेकंड की मुलाकात ने सियासी गलियारों में नई चर्चाएं छेड़ दी हैं. मंगलवार को समृद्धि एक्सप्रेसवे पर उद्धव ठाकरे खेमे के वरिष्ठ नेता अंबादास दानवे और एकनाथ शिंदे गुट के नेता तथा मंत्री अब्दुल सत्तार के बीच मुलाकात हुई. उनके गर्मजोशी से गले मिलने की तस्वीर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई.
इसके बाद से यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या शिवसेना के दोनों टूटे हुए धड़े भविष्य में फिर एक साथ आ सकते हैं. राजनीतिक हलकों में इस मुलाकात को महज संयोग नहीं माना जा रहा है. खासकर तब, जब दोनों नेताओं के हालिया सार्वजनिक बयानों ने पहले ही सुलह और पुनर्मिलन की संभावनाओं को लेकर चर्चा छेड़ रखी थी. हाईवे मीटिंग ने अटकलों को हवा दे दी.
आगामी MLC चुनावों और बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच दोनों खेमे किसी नए रास्ते की तलाश कर सकते हैं. दरअसल, ठाकरे गुट के नेता अंबादास दानवे ने हाल ही में कहा था कि भारतीय जनता पार्टी का तेजी से बढ़ता राजनीतिक विस्तार क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व के लिए चुनौती बनता जा रहा है. उनका बयान क्षेत्रीय राजनीति के संदर्भ में काफी अहम माना गया था.
दूसरी ओर, शिंदे गुट के वरिष्ठ नेता अब्दुल सत्तार ने भी संकेत दिया था कि यदि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे मंजूरी दें, तो वर्षों तक साथ काम कर चुके नेताओं के बीच दूरी कम होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. इसी पृष्ठभूमि में समृद्धि एक्सप्रेसवे पर दोनों नेताओं की मुलाकात ने राजनीतिक चर्चाओं को और तेज कर दिया है. तस्वीरों में दोनों नेता एक-दूसरे से आत्मीयता से मिलते दिख रहे हैं.
यही वजह है कि इस मुलाकात को सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार से आगे बढ़कर देखा जा रहा है. इस पूरे घटनाक्रम का समय भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. महाराष्ट्र में जल्द ही MLC चुनाव होने हैं. उससे पहले सत्ताधारी महायुति गठबंधन के भीतर भी कई मुद्दों पर मतभेदों की चर्चाएं सामने आ रही हैं. ऐसे में ये नजदीकी राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींच रही है.
हाल के दिनों में अब्दुल सत्तार का एक बयान भी काफी चर्चा में रहा था. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों के रिश्तों को लेकर "स्लो पॉइज़निंग" जैसा शब्द इस्तेमाल किया था. इस बयान को महायुति के भीतर मौजूद असहजता और असंतोष के संकेत के रूप में देखा गया. इस तरह के बयान शिंदे खेमे के भीतर बढ़ती बेचैनी की ओर इशारा करते हैं.
हालांकि, इन तमाम अटकलों के बीच दोनों पक्षों के शीर्ष नेताओं ने फिलहाल पुनर्मिलन या मर्जर की संभावना को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया है. उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा है कि उनका गुट ही बालासाहेब ठाकरे की असली विरासत को आगे बढ़ा रहा है और जनता का जनादेश उनके साथ है. उन्होंने किसी भी संभावित विलय की चर्चा को महत्व देने से इनकार किया है.
उधर, उद्धव ठाकरे खेमे के प्रमुख नेताओं में शामिल संजय राउत ने भी अपनी अलग व्याख्या पेश की है. राउत का कहना है कि असली शिवसेना ठाकरे परिवार के नेतृत्व वाली शिवसेना है. यदि किसी को अपने पुराने राजनीतिक घर में लौटना है, तो उसके लिए मातोश्री के दरवाजे खुले हैं. उनके इस बयान को भी राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
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