महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम और एनसीपी नेता अजित पवार का बारामती प्लेन क्रैश हादसे में निधन हो गया. आज बारामती के विद्या प्रतिष्ठान श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ, जिसमें कई सीनियर नेता शामिल हुए है. अजित पवार के निधन के बाद आज यानी 29 फरवरी के ‘सामना’ के अंक में एक एडिटोरियल लिखा गया है, जिसका टाइटल है- हिम्मतवाले दादा! …जिगरवाले दादा!
एडिटोरियल में लिखा गया, "कुछ लोग जन्मजात नेतृत्व गुणों से संपन्न होते हैं. अजित पवार उनमें से एक थे. उन्होंने शरद पवार की छत्रछाया में भी अपने नेतृत्व को साबित किया. लेकिन मृत्यु निर्दयी हो गई और महाराष्ट्र के इस महान और दिलदार नेतृत्व को हमसे छीन लिया."
"अजित पवार का विमान बारामती में दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उनकी मृत्यु की खबर से महाराष्ट्र स्तब्ध रह गया. शोक का पहाड़ न केवल पवार के प्रशंसकों पर, बल्कि पूरे राज्य पर टूट पड़ा. अजित दादा के पैरों में चकरी थी और वे लगातार यात्रा करते रहते थे. अब वे ऐसी यात्रा पर चले गए हैं, जहां से वे कभी वापस नहीं लौटेंगे."
"अजित पवार का अचानक चले जाना महाराष्ट्र के सामाजिक मामलों, राजनीति और लाखों लोगों के निजी जीवन में एक खालीपन पैदा होने जैसा है. वे शरद पवार के भतीजे के रूप में महाराष्ट्र की राजनीति में आए. उन्होंने पवार जैसे सह्याद्रि की छत्रछाया में रहकर अपना स्थान बनाया और अपनी उपलब्धियों से अपना अनूठा मार्ग प्रशस्त किया. उनकी मौजूदा यात्रा शरद पवार की यात्रा से अलग थी. शरद पवार द्वारा स्थापित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को अजीत दादा ने अपने ‘काका’ की आंखों के सामने चालीस विधायकों के साथ अपने हाथ में लिया और बीजेपी के साथ सरकार में शामिल हो गए. लेकिन शरद पवार और उनके परिवार से उनका नाल जुड़ा रहा, रिश्ते बरकरार रहे."
"शरद पवार और अजित पवार की पार्टियों ने हाल के नगरपालिका चुनावों में एक साथ चुनाव लड़ा. वे जिला परिषद चुनाव भी एक साथ लड़ने वाले थे. दादा जिला परिषद चुनावों के लिए प्रचार करने बारामती गए थे. लेकिन विमान हादसे में दादा अपने प्रिय बारामती की ही गोद में हमेशा के लिए विलीन हो गए. अजित पवार को शरद पवार कीविरासत मिली. शरद पवार अजित दादा के पीछे खड़े रहे. लेकिन अजीत पवार खुद मेहनती स्वभाव के थे. वे छह बार उप मुख्यमंत्री बने. उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत काटेवाड़ी के एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में की थी."
"काटेवाड़ी की सहकारी सोसाइटियों से लेकर राज्य सहकारी बैंक, सांसद, विधायक, मंत्री, उप मुख्यमंत्री तक उनका सफर लंबा चला. पृथ्वीराज चव्हाण, विलासराव देशमुख, उद्धव ठाकरे, देवेंद्र फडणवीस, अशोक चव्हाण मुख्यमंत्री के तौर पर आते-जाते रहे, लेकिन अजीत दादा इन सभी के मंत्रिमंडलों में उप मुख्यमंत्री बने रहे. वे एक चतुर राजनीतिज्ञ थे. प्रधानमंत्री मोदी ने खुद उन पर 70 हजार करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले का आरोप लगाया था, लेकिन अजित दादा की चतुराई ऐसी थी कि एक महीने के अंदर ही वे उसी मोदी पार्टी की महाराष्ट्र सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए. एक बार सुबह-सुबह उन्होंने फडणवीस के साथ शपथ ली. वे 35 घंटे के लिए उप मुख्यमंत्री रहे और अपने खिलाफ सभी जांच बंद करने का आदेश जारी करने के बाद स्वगृह लौट आए और उद्धव ठाकरे के मंत्रिमंडल में शामिल हो गए."
"अजित पवार राजनीति में बहुत बड़े नाम बन गए. फिर भी लोग उन्हें शरद पवार के भतीजे और पवार के खरे वारिस के रूप में जानते थे. अजित पवार ने सत्ता और संपत्ति का भरपूर फायदा उठाया. जब उनके पास मंत्री पद नहीं था, तब भी विपक्ष में बैठकर उन्होंने अपना दबदबा कायम रखा. उन्हें प्रशासन से काम करवाने की कला आती थी. भाषण देते समय वे अक्सर तालियों के लिए बह जाते थे. उन्हें इसके परिणाम भी भुगतने पड़े. लेकिन हाल के वर्षों में उनके व्यवहार और भाषण में संयम देखने को मिला. उनमें एक मंत्री के रूप में फैसला लेने की क्षमता थी. वे फैसला लेकर आजाद हो जाते और उन्हें सफलतापूर्वक लागू भी करते थे."
अजित पवार राजनीति में एक स्पष्टवादी और कुशल नेता के रूप में प्रसिद्ध थे. उन्हें समय की पाबंदता स्वच्छता और टिप टॉप रहना पसंद था. खोखले वादे करना उनकी कार्यशैली के अनुरूप नहीं था. वे ‘देखते हैं आप वैâसे चुने जाते हैं’ वाली भाषा का प्रयोग करते थे और उसे सच भी कर देते थे. बीजेपी के चक्कर में उन्होंने अपनी पत्नी को अपनी बहन सुप्रिया सुले के खिलाफ लोकसभा चुनाव में उतारा. बारामती की जनता ने उनकी इस योजना को विफल कर दिया. लेकिन बारामती की उसी जनता ने अजित पवार को रिकॉर्ड वोटों से विधानसभा के लिए चुना. अजित पवार वर्तमान राजनीति में एक छत्र की तरह थे."
"हजारों लोग उस छत्र के नीचे खड़े थे. जब यह छत्र टूटा, तो अजित पवार पर निर्भर लोगों का भविष्य अंधकारमय हो गया. अजित पवार एक ‘दादा’ ही थे. यह दादा युग समय से पहले ही खत्म हो गया. प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे, विलासराव देशमुख, आर. आर. पाटील जैसे प्रतिभाशाली और युवा मंडली महाराष्ट्र और देश की राजनीति से विदा हो गए हैं. ऐसा लगता है मानो महाराष्ट्र की मराठी राजनीति पर किसी की नजर लग गई है."
"महाराष्ट्र ने एक बार फिर एक सक्षम और सशक्त नेता को खो दिया है. राजनीति में अजित पवार जैसे नेता की अनुपस्थिति से मानो महाराष्ट्र की राजनीति कमजोर, सुस्त और दिशाहीन हो गई है. अजित पवार के नाम और जीवन पर राजनीति करने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग इस समय अनाथ हो गया है. महाराष्ट्र की राजनीति का एक दृढ़ और हिम्मती, जिगरबाज व्यक्तित्व काल के पर्दे के पार चला गया है. अजित पवार की अनगिनत यादें पीछे रह गई हैं."
विद्या