दिल्ली जिमखाना क्लब में CIA एजेंट को किस गद्दार ने बेचे इंडियन टैंक के सीक्रेट्स?

ये कहानी CIA के एक हाई प्रोफाइल ऑपरेशन की है. कैसे दिल्ली जिमखाना क्लब से CIA एजेंट ने भारतीय सेना के टैंक की खुफिया जानकारियां हासिल की. ये टैंक सोवियत रूस में बना था, लेकिन इससे जुड़ा खेल में नई दिल्ली में खेला जा रहा था.

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जिमखाना क्लब डिप्लोमैट और हाई प्रोफाइल लोगों के सीक्रेट टॉक का अड्डा है. (Photo: ITG) जिमखाना क्लब डिप्लोमैट और हाई प्रोफाइल लोगों के सीक्रेट टॉक का अड्डा है. (Photo: ITG)

संदीप उन्नीथन

  • नई दिल्ली,
  • 27 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:54 PM IST

नई दिल्ली के 113 साल पुराने दिल्ली जिमखाना क्लब को 5 जून 2026 तक अपनी जगह खाली करने को कहा गया है. केंद्र सरकार की ओर से जारी इस बेदखली नोटिस में 27 एकड़ में फैले इस क्लब को अपने कब्जे में लेने की वजह 'राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर' और 'आवश्यक जनहित' बताया गया है. यह क्लब 7 लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री आवास से बिल्कुल करीब है.

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अपने सजे-संवरे लॉन, दो दर्जन टेनिस कोर्ट, एक स्विमिंग पूल, लकड़ी के फर्श वाले बॉलरूम और कई बार के साथ यह क्लब दिल्ली के एलीट क्लास की मनपसंद जगह है. लगभग पचास साल पहले यह क्लब भारतीय सेना के गोपनीय रहस्यों के बेहद गंभीर रूप से लीक होने का एक ठिकाना भी था. इस घटना का विस्तृत वर्णन 2002 में प्रकाशित CIA के पूर्व एजेंट रॉबर्ट बेयर की आत्मकथा ‘See No Evil’ में किया गया है.

उस समय जिमखाना क्लब उन जगहों में से एक था, जहां राजनयिकों का भेष धरकर आए जासूस भारतीय अधिकारियों के साथ घुल-मिल सकते थे. और ऐसा करके वे विदेशी नागरिकों से संपर्क पर रोक लगाने वाले सरकारी नियमों को भी दरकिनार कर देते थे. जासूस क्लब में प्रवेश करके भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो के उन एजेंटों से भी पीछा छुड़ा सकते थे जो उनका लगातार पीछा कर रहे होते थे.

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दिल्ली पहुंची शीत युद्ध की राइवलरी

इस कहानी की शुरुआत 1970 के दशक के आखिर में हुई. जब बेयर नाम का नया-नया CIA एजेंट US दूतावास में आया. उस समय शीत युद्ध अपने चरम पर था. पूरे यूरोप में NATO और वारसॉ पैक्ट की सेनाएं एक-दूसरे के आमने-सामने खड़ी थीं और हर पल हमले के लिए पूरी तरह तैयार थीं. इस दौरान सोवियत रूस ने युद्ध के लिए कुछ ऐसे प्लेटफॉर्म तैयार किए थे जिन्होंने पश्चिमी देशों की चिंता काफी बढ़ा दी थी.

अगर शीत युद्ध एक हकीकत के युद्ध में बदल जाता तो टाइटेनियम के खोल वाली 'अल्फा क्लास' इंटरसेप्टर पनडुब्बियां अटलांटिक महासागर में तेज़ी से आगे बढ़ते हुए NATO के जंगी जहाज़ों का शिकार करतीं; समताप मंडल की ऊंचाइयों पर उड़ने वाले MiG-25 'फॉक्सबैट' अमेरिकी बमवर्षकों को मार गिराते; और जमीन पर एक नया युद्धक टैंक—T-72—सोवियत बख्तरबंद दस्तों की अगुवाई करते हुए 'फुल्डा गैप' के रास्ते पश्चिमी जर्मनी में प्रवेश करता.

पेंटागन और CIA ने सोवियत हार्डवेयर में हुई इन तरक्की का पता लगाने के लिए पूरी लगन से काम किया. ताकि उनकी क्षमताओं को समझा जा सके, उनकी कमजोरियों का पता लगाया जा सके और उनके मुकाबले के लिए जवाबी उपाय तैयार किए जा सकें.

T-72 में पेंटागन की बहुत ज़्यादा दिलचस्पी थी. यह 41 टन का एक मीडियम टैंक था, जो पुराने T-55 और T-62 टैंकों के मुकाबले एक बहुत बड़ी छलांग थी. इसमें एक नई 125 mm की स्मूथबोर तोप लगी थी, जो 1,800 मीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से गोले दागती थी.

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यह रफ़्तार पश्चिमी टैंकों के मुकाबले कई सौ मीटर प्रति सेकंड ज़्यादा थी. इसका 'ग्लेसिस' यानी टैंक का आगे का ढलान वाला हिस्सा सिरेमिक और स्टील की परत वाले कवच से सुरक्षित था; इसमें एक 'लेजर रेंजफ़ाइंडर' और एक 'ऑटो-लोडर' भी लगा था, जिसकी वजह से टैंक के चालक दल में चौथे सदस्य की जरूरत ही नहीं पड़ती थी. इस टैंक का बड़े पैमाने पर उत्पादन 1979 में शुरू हुआ.  USSR ने इस साल 2,000 T-72 टैंक बनाए.

पश्चिम खेमा रूस से जानकारी निकालने के लिए तरह तरह के ऑपरेशन पर भरोसा करता, जैसे सोवियत पायलट विक्टर बेलेंको जो 1976 में अपना MiG-25 विमान उड़ाकर जापान चला गया था. पश्चिमी इंजीनियरों ने दुनिया के सबसे तेज जेट के पीछे के रहस्यों को समझने के लिए उस जेट को खोलकर उसके पुर्ज़े-पुर्ज़े की जांच की.

लेकिन ऐसी सफलताएं कम मिलती थी.

1970 के दशक तक भारत सोवियत सैन्य साजो-सामान का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका था. जिसमें टैंक से लेकर लड़ाकू जेट और पनडुब्बियां तक शामिल थीं.

बेयर लिखते हैं,'चूंकि सोवियत संघ आमतौर पर भारत को अपने सबसे आधुनिक हथियार बेचता था, इसलिए सोवियत सेना के बारे में जानकारी जुटाने के मामले में भारत दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण देश बन गया था.'

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1978 में भारतीय सेना ने सीधे सोवियत संघ से 500 T-72, T-72M और T-72M1 टैंकों का पहला जत्था आयात किया. नई दिल्ली में मौजूद CIA स्टेशन ने भारतीय सेना के इन नए हथियारों के बारे में जानकारी हासिल करने के अपने प्रयासों को और तेज़ कर दिया. बेयर का दावा है कि इन प्रयासों में कई तरह की कोशिशें शामिल थीं, जैसे कि किसी भारतीय सैन्य संपर्क को 'बेलेंको' जैसा काम करने के लिए राजी करना. यानी T-72 टैंक को सीमा पार करके पाकिस्तान ले जाना या फिर टैंक डिपो में मौजूद किसी संपर्क को रिश्वत देकर T-72 के ढांचे में छेद करवाकर उसके कवच की बनावट को समझने की कोशिश करना. लेकिन ये सभी प्रयास बेकार साबित हुए.

रूस में बने टैंक के राज जानने को बेताब CIA

अगस्त के आखिर में किसी समय बेयर को खुफिया जानकारी का एक बड़ा खज़ाना हाथ लगा. उसके भारतीय एजेंटों में से एक ने उसके लिए T-72 टैंक के मैनुअलों से भरा एक बैग लेकर आया.

‘T-72 टैंक के मैनुअल हमारे लिए किसी Holy Grail से कम नहीं थे, जिनकी तलाश में हम सालों से लगे हुए थे. ये तो सूचना के खजाने की चाबियां थीं. मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा, खासकर तब जब एजेंट ने कहा कि उसे ये मैनुअल दो घंटे के अंदर वापस चाहिए. जिस सार्जेंट ने ये मैनुअल उधार लिए थे, उसे अपनी ड्यूटी खत्म होने से पहले इन्हें वापस तिजोरी में रखना था. ऑफिस जाकर, इनकी कॉपी बनाने और फिर निगरानी से बचने के लिए सुरक्षित रास्ते से लौटने का हमारे पास बिल्कुल भी समय नहीं था. और तो और उस वक्त नई दिल्ली में IB के जासूसों का जाल बिछा होता; ऐसे में मेरे पास बस यही एक मौका था कि मैं उसी रात उन्हें हासिल कर लूं, वरना शायद फिर कभी नहीं.’

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बेयर ने मैनुअल लेने का फैसला किया. उसने जोर से ब्रेक लगाए, एजेंट को कार से बाहर धकेला और उस पर चिल्लाकर कहा कि वह दो घंटे बाद दिल्ली के जिमखाना क्लब में गेस्ट हाउस नंबर तीन के पीछे उससे मिले.

US एम्बेसी में बेयर ने टैंक के मैनुअल की कॉपी बनाई. उसके पास जिमखाना क्लब वापस जाने के लिए ठीक 17 मिनट थे. अब तक उसके पीछे तीन कारों की लाइटें थीं, जिससे यह आभास हो रहा था कि वे उसके IB जासूस थे. जब तक वह जिमखाना के गेट से अंदर पहुंचा तब तक उन तीन लाइटों की जगह पांच लाइटें हो गई थीं.

आगे-आगे CIA एजेंट, पीछे-पीछे IB जासूसों की कार

"अपने रियरव्यू मिरर में मैंने उन्हें एक-एक करके गेट से अंदर आते देखा. सबसे नजदीक वाली कार शायद मेरे पिछले बम्पर से दस फ़ीट दूर थी. आगे कोई सड़क नहीं थी, लेकिन मैं चलता रहा. सीधे दो टेनिस कोर्ट के बीच बने बजरी वाले रास्ते पर. मुझे लगा कि वे मेरा पीछा नहीं करेंगे. मैं सही था. पांचों कारें क्लब की मुख्य इमारत के सामने रुक गईं और उनमें से लोग पैदल बाहर निकलने लगे. मैंने ब्रेक लगाए, मैनुअल से भरे डफ़ल बैग को एक टेनिस बैग में ठूंसा और दो इमली के पेड़ों के बीच छिप गया. मेरे पीछे पैरों की आहट गूंज रही थी; मैं लंबे-लंबे मर्टल के झाड़ियों से घिरे रास्ते पर चलता रहा, जब तक कि मैं उस सुरक्षित जगह पर नहीं पहुंच गया जहां गेस्ट हाउस नंबर तीन के सामने वाली बाड़ थी."

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"मैं पेड़ों की पत्तियों के बीच से एजेंट की परछाई देख सकता था. ठीक उसी जगह पर जहां मैंने उसे रहने के लिए कहा था. बिना रुके मैंने डफ़ल बैग को टेनिस बैग से बाहर निकाला और एक ही झटके में बाड़ के उस पार फेंक दिया. मैंने अपनी आंख के कोने से देखा कि उस एजेंट ने बैग उठा लिया और वहां से चला गया."

फिर बेयर पिछले दरवाजे से जिमखाना के बार में दाखिल हुआ. वे लिखते हैं, "वहां एक प्रतिष्ठित भारतीय सज्जन के अलावा और कोई नहीं था; वे थ्री-पीस सूट पहने अकेले बैठे अखबार पढ़ रहे थे. मैं उनके पास गया और उनके बगल में बैठ गया. बिना कुछ कहे मैंने एक वेटर को बुलाया और हम दोनों के लिए दो डबल स्कॉच का ऑर्डर दिया. बर्फ़ के बिना, सीधे. जब मैंने उनसे इस तरह बातचीत शुरू की मानो हम पुराने दोस्त हों."

जब CIA एजेंट ने पीछे के दरवाजे की तरफ देखा तो उसे दो IB जासूस नजर आए जो उन दोनों को ही घूर रहे थे. ‘मैं समझ गया था कि उनकी दिलचस्पी तेजी से उस भारतीय सज्जन पर आकर टिक गई थी; वे यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि मैं उनसे मिलने के लिए इतनी जल्दबाज़ी में क्यों आया था. जब तक वे उस सज्जन से पूछताछ करने की सोचते तब तक तो वह एजेंट वहां से काफी दूर निकल चुका होता और सार्जेंट को वो मैनुअल्स भी लौटा चुका होता.’

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बाद में इन टैंक मैनुअलों की प्रतियां  लैंगली स्थित CIA मुख्यालय और पेंटागन तक पहुंच गईं. शायद ये सूचनाएं पाकिस्तानी आर्मी को भी गई होंगी.

किसने बेचे भारत के राज?

बेयर ने अपनी किताब लिखना CIA की सबसे बड़ी खुफिया विफलता 11 सितंबर, 2001 के 9/11 हमलों के ठीक दो महीने बाद पूरा किया.
बेयर की किताब 2002 में बाजार में आई, जब CIA के प्रकाशन समीक्षा बोर्ड ने उसे मंज़ूरी दे दी थी. बोर्ड ने किताब में से गोपनीय जानकारी हटा दी थी. हैरानी की बात है कि भारत में इस किताब पर किसी का ध्यान ही नहीं गया.

दिल्ली जिमखाना में बेयर को T-72 टैंक के मैनुअल देने वाले उन रहस्यमयी शख्स की पहचान कभी सामने नहीं आई. इन जासूसों ने विदेशी एजेंसियों को देश के और कौन-से राज बताए? और इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि क्या वे अब भी सक्रिय हैं? शायद हमें यह कभी पता न चले.

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