साक़ी शराब ला कि तबीअ'त उदास है
मुतरिब रुबाब उठा कि तबीअ'त उदास है
तौबा तो कर चुका हूँ मगर फिर भी ऐ 'अदम'
थोड़ा सा ज़हर ला कि तबीअ'त उदास है
मय (शराब) के दीवानों के लिए ये शेर जाना-पहचाना है, अब्दुल हमीद अदम की गज़ल की इन पंक्तियों को ना जाने कितने गानों, कव्वालियों, शायरियों में इस्तेमाल किया जा चुका है. जहां खुशी, ग़म, दोस्ती, मोहब्बत को सेलिब्रेट करने के लिए शराब का सहारा लिया जाता है. हिन्दुस्तान में शराब के शौकीन बहुत हैं और ये शौक नया नहीं है, सदियों से चला आ रहा है.
लेकिन, अब इसमें एक बदलाव आने लगा है. जैसे-जैसे Gen-Z यानी नई सदी में पैदा हुए लोग नशा करने की उम्र पार करने लगे हैं, देश में एक नया ट्रेंड में देखने को मिला है. ये ट्रेंड है शराब से दूरी का, या यूं कहे कि शराब की बजाय किसी और रास्ते निकल जाने का. कोरोना काल के बाद इस ट्रेंड ने रफ्तार पकड़ी है, जहां लोग अब शराब को छोड़ गांजा/चरस/भांग जैसे नशीले पदार्थ की ओर रुख कर रहे हैं.
भारत में गांजे का सेवन अभी भी अवैध है, लेकिन इसके बावजूद देश में गांजे का सेवन करने वालों की संख्या करोड़ों में है. तमाम रोक, कानून के बाद भी ये ट्रेंड रफ्तार पकड़ रहा है और अब मयखाने की लत नहीं बल्कि ‘हाई’ होने की इच्छा लोगों को दीवाना बना रही है. ये ट्रेंड कैसा है, कितनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, भारत में गांजे को लेकर किस तरह की बहस चल रही है, इन सभी बातों को समझने की कोशिश करते हैं.
शीशे में मय है, मय में नशा...
भारत में शराब का सेवन बहुत अधिक मात्रा में होता है. बिहार, गुजरात जैसे राज्यों में शराब बैन है. लेकिन बाकी राज्यों में सरकार के लिए शराब ही कमाई का सबसे बड़ा स्रोत है, क्योंकि इसपर लगने वाला टैक्स काफी ज्यादा होता है. देशी, विदेशी, कच्ची ना जाने कितनी तरह की शराब हिन्दुस्तान में पी जा रही है. जिसका सेवन करने वालों में पुरुष और महिलाएं एक तरह से बराबरी का योगदान देते हैं.
वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2018 तक हुए एक सर्वे में यह दावा है कि भारत में हर साल एक व्यक्ति करीब 5.5 लीटर शराब पी जाता है. 2010 में यह आंकड़ा 4.5 लीटर तक का था, यानी सिर्फ 8 साल में इसमें जबरदस्त उछाल आ गया. दुनिया में 2018 में वैसे यह आंकड़ा 6.2 लीटर प्रति व्यक्ति (सालाना) का है. यानी दुनिया के अन्य देशों के औसत के मुताबिक भारत में कुछ हदतक कम शराब कन्ज़्यूम हो रही है.
वर्ल्ड बैंक से अलग भारत सरकार द्वारा 2019-21 में एक सर्वे जारी किया गया था जिसके मुताबिक, 15 या उससे अधिक साल की करीब 1.5 फीसदी महिलाएं भारत में शराब का सेवन करती हैं, पुरुषों में यह संख्या 18.8 फीसदी की है. यह सरकारी आंकड़ा है, यानी देश में बड़ी मात्रा में शराब का सेवन हो रहा है इसे सरकार भी मानती है.
लेकिन अब ऐसा क्या और क्यों हो रहा है कि लोग शराब से हट रहे हैं और नशा करने के दूसरे रास्तों की ओर बढ़ रहे हैं. हालांकि यह भी साफ करना ठीक रहेगा कि इसका मतलब यह नहीं है कि शराब पीने वालों की संख्या कम हो रही है, बल्कि यह लगातार बढ़ ही रही है लेकिन पहले लोगों के पास शराब के अलावा कोई ऑप्शन नहीं होता था लेकिन अब रास्ते खुल रहे हैं और इसमें सबसे बड़ा सहारा गांजा (Cannabis) बन रहा है.
गांजा है क्या और क्या ये खतरनाक है?
अपने आसपास, यार-दोस्तों में या किसी पान के खोखे पर आपने अब कुछ नए शब्दों को सुनना शुरू किया होगा. ‘हाई होते हैं..., रोल करेंगे..., रोल ले लो... माल है क्या... स्टफ है ना?’. ये नई जेनरेशन की भाषा है, जो गांजे की लती हो रही है. भले ही यह लीगल ना हो, लेकिन बाज़ार में इससे जुड़ी चीज़ें उपलब्ध हो जाती हैं.
ये गांजा है क्या और कैसे असर करता है, इसे भी समझ लेते हैं. कैनेबिस एक पौधा होता है, यानी भांग का पौधा. जिसकी अलग-अलग वैराइटी होती हैं, इसी पौधे में से तीन चीज़ें निकलती हैं जिसका अलग-अलग इस्तेमाल होता है. ये तीन चीज़ें होती हैं गांजा, भांग और चरस. भारत में भांग बेचना अपराध नहीं है, लेकिन गांजा और चरस बेचना-रखना या उसका सेवन करना अपराध है.
इनका सेवन करने पर आप ‘हाई’ फील करते हैं, ये वो भाषा है जिसका इस्तेमाल अक्सर किया जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि गांजा का सेवन सीधा आपके दिमाग पर हिट करता है, जहां आपको ऐसा लगता है कि आप कुछ देर के लिए चकरा गए हैं. लेकिन यह नशा शराब जैसा नहीं होगा, बिल्कुल अलग होगा जो सेकेंडों में ही आपको पता लगने लगेगा.
गांजा प्राकृतिक है. इससे क्या नुकसान होता है इसकी रिसर्च काफी कम है. हालांकि, National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine की रिसर्च बताती है कि सांस की दिक्कतें हैं, गर्भवती हैं या कोई और स्पेशल कंडीशन है, तब इसका सेवन बेहद हानिकारक हो सकता है. भारत में भले ही यह लीगल ना हो, लेकिन 2019 में आई एक रिपोर्ट बताती है कि देश में 3.1 करोड़ लोग गांजे का सेवन करते हैं, 2.3 करोड़ लोग अफीम भी लेते हैं. जबकि शराब का सेवन करने वालों की संख्या 16 करोड़ से अधिक है.
क्या हिन्दुस्तान में कैनेबिस लीगल है?
अमेरिका के कई राज्यों में कैनेबिस को वैध माना जाता है, यानी ये आपको आसानी से मिलेगा और आपपर कोई कार्रवाई नहीं होगी. दुनिया के अलग-अलग देशों में कैनेबिस को इलाज के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है. पिछले कुछ वक्त में हिन्दुस्तान में कैनेबिस (गांजा, भांग, चरस) को लीगल करने की मांग उठी है, इसको लेकर बहस भी हमेशा चलती ही रहती है.
साल 1985 में जब देश में राजीव गांधी की अगुवाई में सरकार चल रही थी, उस वक्त Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act लाया गया और देश में गांजे के सेवन, बिक्री और अन्य चीज़ों पर बैन लग गया. अभी कुछ वक्त पहले कांग्रेस के ही सांसद शशि थरूर ने एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने यह आवाज़ उठाई थी कि अब वक्त आ गया कि जब देश में कैनेबिस को लीगल कर दिया जाए.
शशि थरूर ने अपने उस लेख में तर्क दिया था, ‘मैंने अपने जीवन में कभी किसी ऐसे ड्रग का इस्तेमाल नहीं किया है, जो मेडिकल सुपरविज़न में नहीं आता है. मैंने कभी भांग भी नहीं चखी है, ना होली पर. लेकिन इस सबके बावजूद मैं इस बात का पक्षधर हूं कि भारत में कैनेबिस के इस्तेमाल, सप्लाई और प्रोडक्शन को लीगल करने से ड्रग्स का गलत इस्तेमाल, क्राइम, करप्शन कम हो सकता है और साथ ही देश को इससे आर्थिक लाभ भी होगा.’.
अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ के भारतीय जनता पार्टी के विधायक कृष्णमूर्ति बांधी ने भी कहा कि अपराध को रोकने के लिए शराब के इस्तेमाल को कम करना चाहिए और गांजा, भांग को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. इस बयान पर काफी विवाद हुआ था, अलग-अलग बहस छिड़ी. क्योंकि एक तरफ जहां कई नेता, समाज के अलग-अलग तबके देश में कैनेबिस को लीगल करने की मांग करते हैं, वहीं दूसरी ओर एनसीबी जैसी एजेसियों द्वारा देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाली कार्रवाई बताती हैं कि अभी के दौर में देश में ऐसा होना मुश्किल ही दिखता है.
शराब से गांजा पर क्यों शिफ्ट हो रहे लोग?
दुनिया में जब कोरोना वायरस आया तब उसने काफी कुछ बदल दिया. लोगों के रहने, खाने-पीने के तरीके में बड़ा बदलाव आया और ऐसा ही बदलाव नशा करने के तरीके में भी आया. में दावा किया था कि कोरोना महामारी के वक्त बड़ी संख्या में लोग शराब से कैनेबिस पर शिफ्ट कर रहे हैं या कर चुके हैं. फोर्ब्स की रिपोर्ट में करीब 45 फीसदी ऐसे थे, जिन्होंने लॉकडाउन के वक्त ही शराब से कैनेबिस पर शिफ्ट किया और अब वह उसी पर टिके हैं.
ऐसा क्यों होता है, इसके कई तर्क दिए जाते हैं. जैसे ‘शराब का नशा आपको कुछ देर के लिए हाईपर एक्टिव कर सकता है, लेकिन मैरुआना के साथ ऐसा नहीं है ये आपको Calmness का अनुभव देता है.’
भारत में कैनेबिस का सेवन लोग अलग-अलग तरीके से करते हैं, इसकी क्वालिटी क्या होती है यह इलाके पर निर्भर करती है. नाम का खुलासा ना करने की शर्त पर एक व्यक्ति ने बताया, ‘जब उन्होंने पहली बार इसका सेवन किया, तो कुछ देर के लिए ऐसा लगा मानो बुखार आ गया हो. आप सही मात्रा में लेंगे तो आपको ‘गुड ट्रिप’ फील होगी, वरना ये ‘बैड ट्रिप’ हो सकती है.’ (गुड और बैड ट्रिप एक स्लैंग लैंग्वेज है, जो कैनेबिस का सेवन करने वाले इस्तेमाल करते हैं)
क्या कहते हैं रिसर्च और आंकड़े?
मैरिहुआना और शराब के सेवन को लेकर अमेरिका में कुछ वक्त पहले एक रिसर्च की गई थी, जिसमें पाया गया था कि लगातार शराब पीने वाले लोग शराब के साथ-साथ गांजा का भी सेवन कर रहे हैं, जबकि करीब 10 फीसदी लोग ऐसे हैं जो शराब का सेवन नहीं करते हैं, लेकिन गांजे का सेवन करते हैं.
अमेरिका की सरकारी एजेंसी Centers for Disease Control and Prevention के मुताबिक, 2015-19 के पैटर्न को देखें तो कोलाराडो में 18.8 फीसदी लोग ऐसे थे तो बिन्ज ड्रंकर्स (पांच या उससे अधिक पैग पीने वाले) लोग थे, जबकि करीब 16.6 फीसदी ऐसे हैं, जो गांजे का सेवन करते हैं. इसमें 18 से 24 साल की उम्र वाले लोग ऐसे हैं, जो खास तौर पर गांजे का सेवन करते हैं इनकी संख्या 28 फीसदी तक है. जबकि इससे अधिक उम्र वाले 20.2 फीसदी तक हैं.
रिपोर्ट ने पाया है कि जो व्यक्ति अधिक शराब पी रहा है, वह उससे अलग कुछ तलाशने की कोशिश में गांजे या उससे जुड़ी चीज़ों की तरफ देखता है. रिपोर्ट का कहना है कि अमेरिका में हर साल लगभग 80 हज़ार मौतें शराब के अधिक डोज़ की वजह से होती हैं, जबकि मैरिहुआना से होने वाली मौत की संख्या ज़ीरो ही है. यही कारण है कि एक बड़ा तबका इस ओर रुख कर रहा है.
हालांकि, ऐसा नहीं है कि मैरिहुआना मौत का कारण नहीं बनता है. रिसर्च का कहना है कि अगर आप एक दिन में 238 से 1113 ज्वाइंट तक लेते हैं, तब यह मैरिहुआना का ओवरडोज़ है जो आपके लिए जानलेवा है.
इस बहस का अंत क्या...?
दुनिया के अलग-अलग देशों में अब बड़ी मात्रा में कैनेबिस को लीगल करने की ओर कदम बढ़ाए जा चुके हैं, अमेरिका के लगभग हर राज्य में कैनेबिस लीगल है. इनके अलावा कई देश हैं जो इस ओर बढ़ रहे हैं, कुछ ने शुरुआत में मेडिसन लेवल पर इसे लीगल किया और बाद में आम इस्तेमाल में भी लीगल कर दिया. भारत में इसकी मांग उठ रही है, कई राजनेताओं, कुछ संगठनों ने इस मसले को उठाया भी है.
हालांकि, इनके द्वारा दिए जाने वाले तर्क सही हैं या नहीं, यह भी बहस का विषय है. भारत सरकार की ओर से अभी तक इस ओर कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई गई है. क्योंकि कई मेडिकल रिपोर्ट दावा कर चुकी हैं कि कैनेबिस का अधिक इस्तेमाल (हद से ज्यादा) आपके दिमाग पर असर डाल सकता है.
मोहित ग्रोवर