वो द्वीप, जहां छींक भी हो सकती है जानलेवा, क्यों अंडमान की सेंटिनल आबादी को बचाया जा रहा बाहरी दुनिया से?

अमेरिकी इन्फ्यूएंसर मिखाइलो विक्टरोविच पोल्याकोव को भारत के प्रतिबंधित नॉर्थ सेंटिनल द्वीप पर अवैध रूप से जाने के आरोप में अरेस्ट कर लिया गया. 24 वर्षीय ये शख्स न केवल चुपके से वहां गया, बल्कि वापसी में कोक की बोतल भी छोड़ आया. अब पड़ताल जारी है कि वो द्वीप पर आखिर गया क्यों? सेंटिनल आइलैंड को लेकर इतना हल्ला इसलिए भी है क्योंकि वहां रहने वाले आदिवासी बाहरी दुनिया और उसकी बीमारियों से एकदम अछूते हैं.

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 अंडमान निकोबार द्वीपसमूह के उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर जाना प्रतिबंधित है. (Photo- Getty Images) अंडमान निकोबार द्वीपसमूह के उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर जाना प्रतिबंधित है. (Photo- Getty Images)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 अप्रैल 2025,
  • अपडेटेड 6:44 PM IST

अंडमान निकोबार द्वीपसमूह का उत्तरी सेंटिनल द्वीप चर्चा में है. दरअसल 24 वर्षीय एक अमेरिकी नागरिक ने प्रतिबंधित द्वीप में घुसने की कोशिश की. ये द्वीप दुनिया की सबसे आइसोलेटेड जनजातियों में से एक सेंटिनल्स का ठिकाना है. डर है कि बाहरी घुसपैठ की वजह से अगर सर्दी-खांसी जैसा मामूली संक्रमण भी वहां पहुंचा तो जनजाति खत्म हो सकती है. ऐसा दुनिया में कई और जनजातियों के साथ हो चुका, जो घने जंगलों या द्वीपों पर बसी हुई थीं. 

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क्या और कैसे हुआ 

मिखाइलो विक्टोरोविच पोल्याकोव पहले अंडमान के पोर्ट ब्लेयर पहुंचे और वहां से रबर की नाव के जरिए द्वीप तक पहुंचे. जाने से पहले उन्होंने समुद्र की तेजी, हवा की गति जैसी जरूरी चीजों की बाकायदा स्टडी भी की थी ताकि सफर में रुकावट न आए. वहां किनारे पहुंचकर उन्होंने लगभग घंटाभर बिताया ताकि जनजाति के कुछ लोग दिख सकें. साथ ही इस यात्रा का वीडियो भी रिकॉर्ड किया और रेत के नमूने लेकर लौट गए.

लौटने से पहले शख्स वहां पर कोक की एक बोतल और नारियल भी छोड़ आया. वापसी में उन्हें स्थानीय मछुआरों ने देख लिया और पुलिस को सूचना दे दी. कथित तौर पर पोल्याकोव पिछले अक्टूबर में भी ऐसी कोशिश कर चुके थे. अब हिरासत में उनसे पूछताछ चल रही है कि आखिर उनका मकसद क्या था. 

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क्यों हो सकता है खतरनाक

सेंटिनलीज सैकड़ों या शायद हजारों सालों से पूरी दुनिया से कटे हुए लोग हैं. इनका इम्यून सिस्टम मॉडर्न दुनिया के सामान्य वायरस से लड़ने में भी सक्षम नहीं. जैसे सर्दी या चेचक जैसी बीमारियां जो हमें छूकर गुजर जाती हैं, इन तक पहुंच जाएं तो ये बेहद खतरनाक हो सकता है . अगर कोई बाहरी व्यक्ति संक्रमण लेकर द्वीप पर जाए, तो वह बीमारी इन लोगों में फैल सकती है. इनके पास न दवाएं हैं, न जांच की ही सुविधा, ऐसे में पूरी कम्युनिटी खत्म हो जाएगी. यही वजह है कि हमारी सरकार ने पचास के दशक से इस द्वीप पर बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा रखा है, ताकि जनजाति की सुरक्षा पक्की हो सके. 

पहले हो चुकीं संपर्क की कोशिशें

साल 1956 में आजाद भारत में प्रतिबंध लगने से पहले साल 1880 में एक ब्रिटिश अधिकारी ने ऐसी कोशिश की थी. नौसेना अधिकारी मॉरिस विडल ने रिसर्च के लिए द्वीप से जबरन एक बुजुर्ग कपल और चार बच्चों को उठा लिया और साथ ले आए. कपल कुछ ही समय में संक्रमण से खत्म हो गए. आनन-फानन बच्चों को वापस द्वीप के किनारे छोड़ा गया लेकिन शायद वे भी न बच सके हों.

ब्रिटिश सर्वे टीम समय-समय पर द्वीप के आसपास गश्त करती थी लेकिन लोग तीर मारने लगते. जल्द ही समझ आ गया कि ये समुदाय बाहरी हस्तक्षेप नहीं चाहता. 

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बनाया गया सुरक्षा का नियम

आजादी के बाद भी रिसर्च के लिए कई कोशिश हुईं. जैसे किनारे पर तोहफे छोड़ना. लेकिन सेंटिनलीज की रुख साफ था. वे तीर चलाते, चिल्लाते और जंगलों में भाग जाते. कई लोग दोस्ती के इस मिशन के दौरान मुसीबतों में भी फंसे. इसके बाद ही सरकार ने साल 1956 में अंडमान एंड निकोबार प्रोटेक्शन ऑफ एबओरिजिनल ट्राइब्स रेगुलेशन (ANPATR) बनाया और द्वीप के लोगों को पूरी तरह आजाद छोड़ दिया.

इसे हैंड्स ऑफ पॉलिसी भी कहा गया. अब वे कानूनी तौर पर बाहरी दुनिया से सुरक्षित हैं और कोई भी उनसे संपर्क करे तो उसे गिरफ्तार किया जा सकता है, जैसे हाल में हुआ. साल 2018 में भी एक अमेरिकी मिशनरी वहां पहुंचा था, जिसकी खुद वहां बसे समुदाय ने हत्या कर दी. 

क्या कभी ऐसा हुआ है कि कोई आदिवासी समुदाय बाहरी संक्रमण से खत्म हो गया हो

हां. पहले कई बार ऐसा हुआ है, खासतौर पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका में. जब कोलंबस और यूरोपीय लोग अमेरिका आए तो उन्होंने वहां के आदिवासी समूहों से संपर्क किया. ये लोग अपने साथ चेचक, फ्लू जैसी बीमारियां लेकर आए थे. तब आदिवासी आबादी का बड़ा हिस्सा सिर्फ इंफेक्शन से खत्म हो गया, बिना किसी हमले या युद्ध के.

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खासकर कोलंबस से पहली बार मिलने वाली कैरिबियन जनजाति ताइनो मिट गई. साल 1492 में इनसे मुलाकात के बाद  कोलंबस ने लिखा कि वे लोग मासूम और मेहनती हैं, जिनका धर्म भी बदला जा सकता है. जल्द ही उनसे मजदूरी कराई जाने लगी. इस बीच कोलंबस और उनके साथियों से आबादी तक फ्लू और चेचक जैसी बीमारियां पहुंच गईं. ताइनो में इसके लिए इम्यूनिटी नहीं थी, वे पटापट खत्म होने लगे और फिर पूरी तरह से मिट गए.

कई ऐसे मामले दुनिया में दिखते रहे. वैसे भी संक्रमण से खत्म न हों तो भी आधुनिक लोगों से मिलकर आदिवासी भी अपनी पहचान खो देते हैं, यह भी एक तरह का जोखिम है.

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