मॉन्टेग्यू सुधार से पेरियार तक... तमिलनाडु में कैसे पड़ी आरक्षण की नींव और उदय हुआ पेरियार का सोशल जस्टिस

1920 के दशक में मद्रास प्रेसीडेंसी में जस्टिस पार्टी ने पहली गैर-ब्राह्मण सरकार बनाई और सामाजिक न्याय के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए. उन्होंने सरकारी नौकरियों में आरक्षण की शुरुआत की और मंदिर प्रशासन में सुधार किए. डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी जैसे नेताओं ने महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया.

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मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड से पेरियार तक, कैसे गढ़ा गया तमिल गौरव और सोशल जस्टिस की राजनीति का आधार मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड से पेरियार तक, कैसे गढ़ा गया तमिल गौरव और सोशल जस्टिस की राजनीति का आधार

टीआर जवाहर

  • नई दिल्ली,
  • 24 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:57 PM IST

तमिलों के गौरव पर बातचीत के बीच थोड़ा इतिहास भी उठाकर देखते हैं. 1919 में मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार लागू हुए. इसमें हुआ ये कि स्टेट्स में अब शासन की जिम्मेदारी दो हिस्सों में बांटी गई. एक एक हिस्सा अंग्रेज अफसरों के हाथ आया और दूसरा भारतीय मंत्रियों के पास. आप इससे ये बिल्कुल न समझें कि अंग्रेज हमें शासन में अपनी बराबर समझने लगे थे. नहीं, बिल्कुल भी नहीं. असल में ये तो नीचा दिखाने का ही एक और तरीका ही था.

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अंग्रेज गवर्नरों ने वित्त, पुलिस और लॉन एंड ऑर्डर तो खुद के ही पास रखा, भारतीय मंत्रियों के हिस्से आए एजुकेशन, हेल्थ और लोकल जमींदारी और फॉर्मिंग. गाहे-बगाहे ये सब भी अंग्रेजों के ही अधीन ही थे. इस सिस्टम में असली ताकत अभी भी ब्रिटिश सरकार के हाथ में थी.

ये वो दौर था, जब आजादी का आंदोलन जोर पकड़ रहा था. उत्तर भारत में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था. सरकारी स्कूलों, कोर्ट्स, गवर्नमेंट जॉब्स से भारतीय किनारा कर रहे थे, लेकिन दक्षिण भारत, खासतौर पर मद्रास प्रेसीडेंसी में सिचुएशन कुछ अलग थी. यहां जस्टिस पार्टी ने अंग्रेजी शासन के साथ सहयोग का रास्ता चुना.

जस्टिस पार्टी की पॉलिटिक्स का आधार

जस्टिस पार्टी वैसे तो गैर-ब्राह्मण समुदायों के हितों की रक्षा के लिए बनी थी. उनका तर्क था कि प्रशासन, शिक्षा और नौकरियों में ब्राह्मणों का बहुत बोलबाला है, जबकि वे आबादी का बहुत छोटा हिस्सा हैं. अंग्रेजी शिक्षा और संस्कृत पर पकड़ के कारण ब्राह्मणों को सरकारी नौकरियों में अधिक अवसर मिले. इससे अन्य समुदायों में असंतोष पैदा हुआ. जस्टिस पार्टी ने इसी असंतोष को अपनी पॉलिटिक्स की सान पर चढ़ाया.

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अब आया साल 1920. जब चुनाव हुए, तो कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के कारण चुनावों से दूरी बना ली, और इसका फायदा जस्टिस पार्टी को मिला. मद्रास लेजिस्लेटिव काउंसिल की 98 में से 63 सीटें जीतकर उन्होंने सरकार बनाई. यह दक्षिण भारत में पहली गैर-ब्राह्मण सरकार थी. ए सुब्बारायलु रेड्डियार पहले प्रीमियर (मुख्यमंत्री) बने, लेकिन कुछ समय बाद पनागल के राजा की लीडरशिप में स्थिर सरकार बनी.

तमिलनाडु की राजनीति में कहां से आई सोशल जस्टिस की बात

इस सरकार की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक थी 1921 और 1922 के 'कम्यूनल जीओ.' (सरकारी आदेश). इन आदेशों के जरिये सरकारी नौकरियों में अलग-अलग कम्यूनिटी के लिए परसेंटेज तय हुए. गैर-ब्राह्मण, ब्राह्मण, मुस्लिम, एंग्लो-इंडियन/ईसाई कम्यूनिटी के लिए अलग-अलग हिस्सेदारी तय हुई. यह भारत में स्ट्रक्चरल रिजर्वेशन पॉलिसी की एक तरीके से पहली शुरुआत थी. आगे चलकर तमिलनाडु की राजनीति में सोशल जस्टिस और रिजर्वेशन की जो मजबूत परंपरा बनी, उसकी जड़ें यहीं थीं.

जस्टिस पार्टी ने मंदिर प्रशासन में भी बदलाव किए. 1921 में हिंदू धार्मिक एंडोमेंट्स एक्ट पारित किया गया, जिसे 1926 में और मजबूत किया गया. इसके तहत मंदिरों के मैनेजमेंट को पारंपरिक पुजारियों या निजी परिवारों से हटाकर एक सरकारी बोर्ड के अधीन कर दिया गया. इसका उद्देश्य था मंदिर संपत्तियों का पारदर्शी और जवाबदेह प्रबंधन. हालांकि इस कदम को लेकर मतभेद भी रहे. कुछ लोगों ने इसे धार्मिक मामलों में सरकारी हस्तक्षेप माना, तो कुछ ने इसे सामाजिक सुधार की दिशा में जरूरी कदम बताया.

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जस्टिस पार्टी के भीतर क्या थी समस्याएं

महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में भी इस दौर में बहुत काम हुए. डॉ. मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी ब्रिटिश भारत की पहली महिला विधायक बनीं. उन्होंने देवदासी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई और 1929 में इसे खत्म करने के लिए कानून बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने विधवा पुनर्विवाह और महिलाओं के संपत्ति अधिकारों का समर्थन किया. उनके प्रयासों ने दक्षिण भारत में महिला सशक्तिकरण की नींव मजबूत की.

हालांकि जस्टिस पार्टी की उपलब्धियां महत्वपूर्ण थीं, लेकिन उसके भीतर कई समस्याएं भी थीं. पार्टी पर एलीट इमेज का आरोप लगता रहा. लीडरशिप अक्सर ही उन लोगों के हाथों में रही जो पॉवरफुल, रिच और एजुकेटेड थे. यानी पढ़े-लिखे और सफिस्टिकेटेड लोगों के पास. ग्रामीण और गरीब गुरबों तक पार्टी की पहुंच या तो सीमित रही या फिर नहीं के बराबर. लिहाजा दलित समुदाय के कई नेताओं को लगा कि उनके मुद्दों को जरूरी नजरिए से नहीं देखा जा रहा है.

इसके अलावा क्षेत्रीय असंतुलन भी एक कारण बना. पनागल के राजा और बाद में बोब्बिली राजा जैसे तेलुगु लीडर्स का प्रभाव ज्यादा ही था, जिससे कुछ तमिल नेताओं को हीन भावना और उपेक्षा जैसा लगने लगा और यहीं से पार्टी में अंदर ही अंदर मतभेद ने पैर पसारना शुरू किया.

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1935 के भारत सरकार अधिनियम ने प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) को बढ़ाया, लेकिन साथ ही गवर्नरों को भी विशेष अधिकार दिए. गवर्नर किसी भी फैसले को रोक सकते थे या अपने विवेक से हस्तक्षेप कर सकते थे. इससे साफ था कि ब्रिटिश सरकार अभी भी कंट्रोल बनाए रखना चाहती थी.

1937 का चुनाव और कांग्रेस की जीत

1937 के चुनाव में कांग्रेस भी एक्टिव हुई और चुनावों में शामिल हुई. इस बार जस्टिस पार्टी को कड़ी चुनौती मिली. कांग्रेस के नेता सी. राजगोपालाचारी की लीडरशिप में कांग्रेस ने जीत हासिल की और जस्टिस पार्टी सत्ता से बाहर हो गई. यह पार्टी के पतन की शुरुआत थी. फिर भी जस्टिस पार्टी की लीगेसी खत्म नहीं हो गई. सोशल जस्टिस, रिजर्वेशन और गैर-ब्राह्मण चेतना का जो बीज उन्होंने बोया था, वह आगे चलकर द्रविड़ आंदोलन के रूप में डिवेलप होता गया. इसी आंदोलन से एक नए और प्रभावशाली नेता का उदय हुआ, ईवी. रामासामी, जिन्हें पेरियार के नाम से जाना गया.

पेरियार ने आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement) की शुरुआत की. उनका उद्देश्य था जाति-आधारित भेदभाव का खात्मा, महिलाओं की समानता और तर्कवाद का प्रचार. उन्होंने धर्म और परंपराओं की आलोचना की, खासतौर पर उन परंपराओं की जो सामाजिक असमानता को बढ़ावा देती थीं. पेरियार का असर इतना अधिक था कि उन्होंने तमिल राजनीति की दिशा ही बदल दी.

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पेरियार के विचारों ने आगे चलकर द्रविड़ कड़गम और फिर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) जैसे संगठनों को जन्म दिया. भाषा, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक न्याय उनके मुख्य मुद्दे बने. हिंदी विरोधी आंदोलनों में भी इन संगठनों ने प्रमुख भूमिका निभाई.

राजनीतिक प्रयोगों की जमीन बना तमिलनाडु

इस पूरी यात्रा को देखें तो साफ है कि दक्षिण भारत की राजनीति केवल अंग्रेज बनाम भारतीय संघर्ष तक सीमित नहीं थी. यह समाज के भीतर प्रतिनिधित्व, समान अवसर और पहचान की लड़ाई भी थी. जस्टिस पार्टी ने प्रशासनिक स्तर पर सामाजिक संतुलन की कोशिश की, जबकि पेरियार ने वैचारिक और सामाजिक स्तर पर बदलाव की मुहिम चलाई.

आज तमिलनाडु की राजनीति में जो सोशल जस्टिस, रिजर्वेशन और प्राउड वाली फीलिंग नजर आती है, उसकी ऐतिहासिक जड़ें इसी दौर में मिलती हैं.

आखिरकार मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों से शुरू हुई यह कहानी केवल प्रशासनिक बदलाव की कहानी नहीं है. यह सामाजिक परिवर्तन, पहचान की खोज और शक्ति संतुलन की लंबी प्रक्रिया की कहानी है. जस्टिस पार्टी की सरकार भले ही लंबे समय तक न चली हो, लेकिन उसने जो विचारधारा और नीतियां शुरू कीं, उन्होंने दक्षिण भारत की राजनीति को प्रभावित किया.

इस तरह, 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में मद्रास प्रेसीडेंसी में जो राजनीतिक प्रयोग हुए, वे आगे चलकर तमिलनाडु के खास पॉलिटिकल कल्चर का आधार बने. सोशल जस्टिस, रिजर्वेश, महिलाओं के हक और आइटेंटिटी, ये सभी मुद्दे उसी ऐतिहासिक संघर्ष की देन हैं.

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