देवस्थानम बोर्ड पर कैसे शुरू हुआ था विवाद, जानिए धामी सरकार को क्यों भंग करना पड़ा?

उत्तराखंड में तीन सालों से देवस्थानम बोर्ड के खिलाफ तीर्थ-पुरोहित आंदोलन कर रहे थे, जिसके चलते बीजेपी का सियासी समीकरण बिगड़ता नजर आ रहा था. ऐसे में अब बोर्ड को भंग कर साधू-संतों की नाराजगी को दूर करने का दांव चला है, लेकिन 2022 के चुनाव में बीजेपी कितनी सफल होगी यह कहना मुश्किल है? आखिर देवस्थानम बोर्ड का क्या विवाद रहा, जिसे धामी सरकार भंग करने के लिए मजबूर हुई है?

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देवस्थानम बोर्ड का विरोध करते तीर्थ पुरोहित देवस्थानम बोर्ड का विरोध करते तीर्थ पुरोहित

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 30 नवंबर 2021,
  • अपडेटेड 3:14 PM IST
  • देवस्थानम बोर्ड को धामी सरकार ने भंग किया
  • 2022 चुनाव के लिहाज से बीजेपी ने लिया फैसला
  • त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने बोर्ड गठन किया था

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने देवस्थानम बोर्ड को मंगलवार को भंग कर दिया. सूबे में तीन सालों से देवस्थानम बोर्ड के खिलाफ तीर्थ-पुरोहित आंदोलन कर रहे थे, जिसके चलते बीजेपी का सियासी समीकरण बिगड़ता नजर आ रहा था. ऐसे में अब बोर्ड को भंग कर साधू-संतों की नाराजगी को दूर करने का दांव चला है, लेकिन 2022 के चुनाव में बीजेपी कितनी सफल होगी यह कहना मुश्किल है? आखिर देवस्थानम बोर्ड का क्या विवाद रहा, जिसे धामी सरकार भंग करने के लिए मजबूर हुई है? 

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देवस्थानम बोर्ड का गठन
उत्तराखंड में बढ़ रही यात्रियों की संख्या और क्षेत्र को पर्यटन व तीर्थाटन की दृष्टि से मजबूत करने के उद्देश्य को लेकर त्रिवेंद्र सरकार ने चारधाम और मंदिर को अपने नियंत्रण में लेने का फैसला किया. सरकार का मानना था कि सरकारी नियंत्रण में बोर्ड मंदिरों के रखरखाव और यात्रा के प्रबंधन का काम बेहतर तरीके से करेगा. इसी मद्देनजर त्रिवेंद्र रावत के नेतृत्व वाली सरकार ने साल 2019 में उत्तराखंड के मंदिरों के प्रबंधन को अपने हाथ में लेने के लिए चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बनाने का फैसला किया. इसके दायरे में चारधाम बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री व इनसे जुड़े 43 मंदिरों समेत कुल 51 मंदिर शामिल किए हैं.  

27 नवंबर 2019 को त्रिवेंद्र सरकार ने कैबिनेट से उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम-2019 बोर्ड को मंजूरी दी. 5 दिसंबर 2019 में विधानसभा से विधेयक को पास भी सरकार ने करा लिया. उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम-2019 बोर्ड को 14 जनवरी 2020 को राजभवन ने मंजूरी मिल गई. इसके बाद सरकार ने 24 फरवरी 2020 को देवस्थानम बोर्ड का सीईओ नियुक्त कर दिया. इस तरह भारी-भरकम बोर्ड का गठन कर चार धामों के अलावा 51 मंदिरों का प्रबंधन अपने हाथों में ले लिया. 

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साधू-संत क्यों विरोध में उतरे?
देवस्थानम बोर्ड के साथ ही साधू-संत और तीर्थ पुरोहित विरोध में उतर गए. 24 फरवरी 2020 से देवस्थानम बोर्ड के खिलाफ पुरोहितों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. तीर्थ पुरोहितों के अलावा उत्तराखंड का एक बड़ा तबका सरकार के इस फैसले के विरोध में उतर आया. उनका कहना है कि सरकार इस बोर्ड की आड़ में तीर्थ-पुरोहितों के हकों को समाप्त करना चाह रही है. ऐसे में सरकार का यह फैसले को मंजूर नहीं करेंगे. 

माना जाता है कि साधू-संतों की नाराजगी के चलते त्रिवेंद्र सिंह रावत को अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी. ऐसे में तीरथ रावत के बाद मुख्यमंत्री बने पुष्कर धामी ने 11 सितंबर 2021 को साधू-संतों को बुलाकर पूरे विवाद खत्म करने का आश्वसन दिया था, लेकिन आंदोलन जारी रहा.   

मोदी के दौरे से पहले विरोध तेज
पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केदारनाथ दौरे से ठीक पहले देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग को लेकर तीर्थ पुरोहितों ने विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया. नाराज तीर्थ पुरोहितों ने केदारनाथ में पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को मंदिर जाने से रोक दिया. राज्य के कैबिनेट मंत्री धन सिंह रावत और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक का तीर्थ पुरोहितों ने काफी देर तक घेराव किया. 

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गंगोत्री में आंदोलन तेज करते हुए साधू-संतों ने बाजार बंद किए और रैलियां निकालीं. मोदी के केदारनाथ पहुंचने पर तीर्थ पुरोहितों के प्रतिनिधिमंडल ने उनसे मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा था. ज्ञापन में अधिनियम और बोर्ड को वापस लेने का आग्रह किया था. हाल ही में जिस तरह से साधू-संतों ने अपना आपा खोया है, उससे सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं. धामी सरकार ने
30 अक्टूबर 2021 तक विवाद निपटाने का आश्वासन दिया गया था. 

धामी सरकार ने एक कमेटी बनाई

तीर्थ पुरोहितों का गुस्सा इस बात पर है कि सरकार ने 2019 में जो देवस्थानम बोर्ड की घोषणा की थी, उसे वापस नहीं लिया जा रहा है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मनोहर कांत ध्यानी के अगुवाई में एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई थी. ऐसे में तीर्थ और पुरोहितों से मनोहर कांत ध्यानी ने कहा था कि बोर्ड को किसी कीमत पर भंग नहीं किया जाएगा. अगर पुरोहित समाज को इसके प्रावधानों से दिक्कत है तो उस पर विचार किया जा सकता है. ऐसे में तीर्थ-पुरोहितों का गुस्सा और भी बढ़ गया और उन्होंने विरोध तेज कर दिया. 

विधानसभा चुनाव के सियासी समीकरण को देखते हुए बीजेपी के लिए इसे सुलझाना पहली प्राथमिकता बन गई थी. मनोहर कांत ध्यानी की अगुवाई कमेटी ने देवस्थानम बोर्ड को लेकर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी. सीएम धामी ने रिपोर्ट को आधार बनाते हुए बोर्ड को भंग करने का फैसला किया. उन्होंने कहा कि देवस्थानम बोर्ड अधिनियम को वापस ले रहे हैं. आगे चल कर हम सभी से बात कर जो भी उत्तराखंड राज्य के हित में होगा उसी के अनुरुप कार्रवाई करेंगे. 

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