बीट रिपोर्ट: काले झंडे लहराकर और परिसीमन विधेयक की प्रतियां जलाकर DMK ने जताया विरोध

डीएमके ने काले झंडे लहराकर और परिसीमन विधेयक की प्रतियां जलाकर विरोध प्रदर्शन किया.16 अप्रैल को डीएमके की बैठकों में ‘काला रंग’ छाया रहा.

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डीएमके की सभी बैठकों में ‘काला रंग’ छाया रहा. (Photo: ITG) डीएमके की सभी बैठकों में ‘काला रंग’ छाया रहा. (Photo: ITG)

अनघा

  • चेन्नई,
  • 17 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:36 PM IST

नई दिल्ली में सुबह करीब 11 बजे संसद में महिला आरक्षण विधेयक पर जोरदार बहस शुरू हुई, जहां तीखी राजनीतिक नोकझोंक देखने को मिली. महिलाओं को सशक्त बनाने के इस बड़े कदम ने देशभर की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है.

उधर, चेन्नई में माहौल बिल्कुल अलग था. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने काले झंडों के साथ और परिसीमन विधेयक की प्रतियां जलाकर विरोध प्रदर्शन किया.

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तमिलनाडु चुनाव में महज कुछ दिन शेष हैं और चेन्नई की भीषण गर्मी की तरह ही राजनीतिक माहौल गरमा रहा है. सारा ध्यान महिला मतदाताओं पर केंद्रित हो गया है, जो प्रमुख चुनावी मैदान बनकर उभर रही हैं.

दिल्ली की हलचल बनाम चेन्नई का विरोध प्रदर्शन

संसद में महिला आरक्षण विधेयक पर बहस शुरू होने के साथ ही राजनीतिक गहमागहमी मच गई. महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम के रूप में पेश किए जा रहे इस विधेयक ने अलग-अलग दलों में राजनीतिक उथल-पुथल को फिर से हवा दे दी है.

वहीं दूसरी ओर, चेन्नई में माहौल बिल्कुल अलग था. डीएमके ने काले झंडे लहराकर और परिसीमन विधेयक की प्रतियां जलाकर प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया.

16 अप्रैल को डीएमके की सभी बैठकों में ‘काला रंग’ छाया रहा. काले झंडे, काली शर्ट और जली हुए कागज़ात पार्टी मुख्यालय ‘अरिवालयम’ के आसपास नजर आए. चेन्नई से करीब 390 किमी दूर नमक्कल में मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने भी काले कपड़े पहनकर परिसिमन विधेयक की प्रतियां जलाईं. आमतौर पर साफ-सुथरी सफेद कमीज में दिखने वाले स्टालिन ने उस दिन काली कमीज और काली पतलून पहनी थी.

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मुख्यमंत्री ने नारा लगाया, “पोराडम पोराडम, वेल्वोम ओन्द्रगा,” जिसका अर्थ है हम लड़ेंगे, हम जीतेंगे, और भीड़ ने भी उनके नारे का समर्थन किया. उनके बेटे और उपमुख्यमंत्री ,उदयनिधि स्टालिन ने भी काली टी-शर्ट पहनी हुई थी.

'उत्तर बनाम दक्षिण' की चर्चा जोर पकड़ रही

डीएमके के चेन्नई स्थित केंद्रीय कार्यालय में हजारों पार्टी कार्यकर्ता जमा हुए थे, जो इस विधेयक का विरोध करने के लिए बड़ी संख्या में आए थे. नेताओं और कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि यह विधेयक क्षेत्रीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है.

नारों, भाषणों के प्रदर्शनों ने इस चिंता को उजागर किया कि विधेयक स्टेट-स्पेसिफिक पॉलिटिकल डायनेमिक्स विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों में, को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं कर सकता है.

काली साड़ियां, बड़ा संदेश

कई महिला नेताओं ने काली साड़ी पहनकर विरोध में हिस्सा लिया, जो एक मजबूत प्रतीक के रूप में सामने आया. यह संदेश भी साफ था कि महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े इस मुद्दे पर सभी महिला नेता एकमत नहीं हैं. हालांकि, यह भी ध्यान देने वाली बात रही कि केंद्रीय प्रदर्शन में सिर्फ एक  DMK महिला नेता ही मौजूद थीं. 

महिला मतदाता, असली गेम चेंजर

जैसे-जैसे चुनाव प्रचार अंतिम चरण में पहुंच रहा है, सभी पार्टियां महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए प्रयास कर रही हैं. कई योजनाओं के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े नारों के माध्यम से भी लुभाने की कोशिश की जा रही है. जहां संसद सशक्तिकरण पर बहस कर रही है, वहीं चेन्नई की सड़कों पर प्रतिरोध की आवाजें गूंज रही हैं.

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आने वाला हफ्ता बतायेगा कि मतदाताओं को कैसे प्रभावित किया जाता है. विशेष रूप से महिलाओंको , जो चुनावी परिणाम तय कर सकती हैं.

कमल हासन की मक्कल नीधि मय्यम ने भी एक गंभीर रंगत अपनाई, जिसके तहत उसके कार्यालय में काले झंडे फहराए गए. हासन ने इस हफ्ते सलेम में डीएमके के लिए प्रचार करते हुए काली कमीज पहनी थी, शायद आने वाले समय के लिए संकेत देते हुए. 
 
अमित शाह ने संसद में जोरदार बयान देते हुए कहा कि परिसीमन प्रक्रिया से दक्षिणी राज्यों को लाभ होगा और उनका प्रतिनिधित्व बढ़ेगा. उन्होंने कहा कि तमिलनाडु को 20, केरलम को 10, तेलंगाना को 9 और आंध्र प्रदेश को 13 सीटें और मिलेंगी. महाराष्ट्र, जिसके पास उत्तर प्रदेश के बाद लोकसभा में सांसदों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है, उसे 24 और सीटें मिलने की उम्मीद है.

तमिलनाडु में परिसीमन क्या चुनावी मुद्दा है?

डीएमके ने इसे एक अहम चुनावी मुद्दा बना लिया है, मानो यह उन्हें राजनीतिक हथियार के तौर पर मिला हो. इससे पार्टी की छवि को काफी मजबूती मिली है. नैरेटिव फैलाया जा रहा है कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार दक्षिण भारतीयों को दूसरे दर्जे का नागरिक मान सकती है. हालांकि, तमिलनाडु में जनमत पर इसका कितना असर पड़ेगा, यह असली सवाल बना हुआ है. 

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