पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों का भविष्य 29 अप्रैल को मतदाता तय कर देंगे. टीएमसी सत्ता बचा पाएगी या बीजेपी बाजी मारेगी, इसकी तस्वीर 4 मई की दोपहर तक साफ होगी. लेकिन उन हजारों प्रवासी मजदूरों की स्थिति बिल्कुल साफ है जो वोट देने अपने गांव आए हैं. उन्हें वापस उन्हीं शहरों की तंग गलियों और अस्थायी टेंटों में लौटना पड़ेगा. उनके लिए चुनाव के बाद भी संघर्ष वही रहेगा, काम और दिहाड़ी की तलाश. सुंदरबन की बसंती विधानसभा के गोरानबोस-4 के रहने वाले 25 साल के अरिजीत मंडल ने घर लौटने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया.
पिछले तीन महीनों की बिना मिली सैलरी, बिना कन्फर्म टिकट के सफर और नौकरी जारी रहने की अनिश्चितता, इन सब के बावजूद वह घर लौटे. अरिजीत ने बताया, "हमारे मालिक ने हमें पैसे देने से मना कर दिया और कहा, ''यदि मैं तुम्हारा बकाया चुका दूं, तो तुम वापस कैसे आओगे? हमने घर से पैसे उधार लिए, मालिक की मर्जी के खिलाफ गए और अपने गांव लौट आए. हमारा अपमान किया जाता है. हमारे रहने के हालात बहुत मुश्किल हैं. हम जंगल के बीच में रहते हैं, जहां आस-पास कोई बस्ती तक नहीं है."
अरिजीत मंडल और उनके पिता अभी गुजरात के एक तेल पाइपलाइन प्रोजेक्ट में ड्रिलिंग मजदूर के तौर पर काम करते हैं. ड्रिल करना, जमीन में छेद करना, धमाके का इंतजार करना और फिर से सब कुछ ठीक करके दोबारा वही काम करना, यही उनका रोज का काम है. अरिजीत हमें अपने मोबाइल फोन पर एक वीडियो दिखाते हैं, जिसमें दिखता है कि तेज हवा आने पर उनके टेंट भी कैसे उड़ जाते हैं.
यह इमरजेंसी वोट ही है, जिसकी वजह से उनके जैसे प्रवासी मजदूर सुंदरबन वापस लौटे हैं. यह बात फैल गई थी कि यदि आपने 2026 के चुनावों में वोट नहीं डाला, तो आप अपना वोट देने का अधिकार खो देंगे और आपकी नागरिकता पर भी सवाल उठ सकता है. अरिजीत का चार साल का बेटा अपने दादा-दादी के आस-पास ही घूमता रहता है. जब उनसे उनकी पत्नी रिया मंडल के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा, ''वह हमें छोड़कर चली गई है. वो जब गई, तब भी मैं गुजरात से पश्चिम बंगाल वापस नहीं आ पाया, क्योंकि मालिकों ने छुट्टी और पैसे/बकाया देने से मना कर दिया था.''
अरिजीत आगे कहते हैं, "मैं घर वापस आना चाहता था. लेकिन मेरे ठेकेदार ने मुझे पैसे नहीं दिए और न ही मुझे जाने दिया. मेरे पास पैसे नहीं थे. मैं 10 दिनों तक रोता रहा. मैं कई दिनों तक खाना भी नहीं खा पाया. मैं उसे बार-बार याद करता हूं. मैंने उससे शादी की थी. क्या मुझे उसकी याद नहीं आएगी. उसकी तस्वीरें दूसरे फोन में हैं, लेकिन मैं उसे खोलकर नहीं देखता, वरना मैं रोने लगूंगा. मैं अपना दर्द किसके साथ साझा करूं? शायद, यदि मैं काम के लिए बाहर न गया होता, तो वो हमारे परिवार को छोड़कर न जाती."
अरिजीत लगातार पछताता रहता है और सोचता रहता है, यदि वो अपने घर से दूर न होता, तो उसकी पत्नी और छोटा बेटा उसके साथ होते. हाल के वर्षों में, अरिजीत मंडल गुजरात, अंडमान और तमिलनाडु में काम करते रहे हैं. इसी बीच, उनके पिता ने कहा था कि वह घर पर ही रुकेंगे और राज्य सरकार की सहायता योजना के तहत बन रहे पक्के घर का काम पूरा करेंगे. पश्चिम बंगाल में कोई भी राजनीतिक पार्टी सत्ता में आए, अरिजीत को काम के लिए ट्रेन पकड़नी ही पड़ेगी और एक प्रवासी मजदूर के तौर पर पहचान बनी रहेगी.
गोरानबोस-4 में लगभग हर दूसरे घर में कोई न कोई गुजरात, तमिलनाडु, केरल या तेलंगाना में काम कर रहा है. राज्य का नाम बदल जाता है, लेकिन प्रवासी मजदूर की पहचान वही रहती है. इसका नतीजा यह होता है कि गांव में नए तरह के रोजगार पैदा हो जाते हैं. स्थानीय ठेकेदार यह पक्का करते हैं कि गांव के नौजवानों को काम के लिए बाहर भेजा जाए. बदले में, उन्हें उन ठेकेदारों से कमीशन मिलता है जो इन नौजवानों को काम पर रखते हैं.
पश्चिम बंगाल से बाहर रोजी-रोटी कमाने की मजबूरी ही उन्हें घर से दूर रखती है. स्थानीय लोग कहते हैं, ''यदि आप गांव में ही रुकते हैं, तो ज्यादा से ज्यादा आपको तीन महीने का काम मिलेगा. बाकी नौ महीनों के लिए छोटे-मोटे कामों पर अनिश्चितता छाई रहती है और यह भी पक्का होता है कि मजदूरी कम मिलेगी. दक्षिण 24 परगना के इन गांवों में जिंदगी काफी मुश्किल भरी है. 31 साल के शब्बीर मोल्ला बताते हैं कि कैसे मॉनसून में हर दूसरे साल उनके आस-पड़ोस में बाढ़ आ जाती है और उनके घर पानी में डूब जाते हैं.
शब्बीर मोल्ला उन मजदूरों के पहले जत्थे में शामिल थे जो गुजरात के सूरत से भागकर आए थे. कढ़ाई का काम करने वाले मोल्ला कहते हैं, ''हमारी बंगाली पहचान की वजह से हमें निशाना बनाया जा रहा था. हमारी फैक्ट्री के मालिक ने भी हमसे कहा था कि जब हालात सामान्य हो जाएं तो हम वापस आ जाएं. हम सम्मान के साथ काम करने का अधिकार चाहते हैं. हम पर इसलिए हमला किया जाता है, क्योंकि हम बंगाली हैं. मैं प्रधानमंत्री से गुजारिश करना चाहता हूं कि दूसरे राज्यों में बंगालियों पर हमला नहीं होना चाहिए.''
उनका कहना है कि बिहार और उत्तर प्रदेश से आए मजदूरों को पश्चिम बंगाल में सुरक्षित माहौल मिलता है. वैसा ही माहौल उनको दूसरे राज्यों में मिलना चाहिए. वो बांस से बने और मिट्टी से लीपे हुए दो कमरों के घर में रहते हैं. सूरत में, इस घर से थोड़ी ही बड़ी जगह में उनके जैसे करीब 30 प्रवासी मजदूर एक साथ रहते हैं. दिवाली के समय, जब छुट्टियां शुरू होती हैं, तो जिंदगी और भी मुश्किल हो जाती है. घर पर, उसके परिवार के पास मछलियों वाला एक तालाब, थोड़ी सी खेती की जमीन और उनका साथ देने के लिए एक समुदाय है.
भले ही प्रकृति ने उन्हें हरियाली का तोहफा दिया है, लेकिन घोर गरीबी और बहुत ही कम संसाधनों की वजह से उन्हें एक बात साफ समझ आ गई है कि अपने परिवार को पालने के लिए घर से दूर रहना ही पड़ेगा. सुंदरबन के गांवों को चक्रवातों, भारी बारिश और बाढ़ का डर सताता रहता है. मॉनसून के मौसम में यहां का इलाका बहुत खतरनाक हो जाता है. शब्बीर जैसे लोगों के लिए मुसीबत के समय परिवार की मदद करना भी एक हफ्ते की लंबी यात्रा बन जाती है.
शब्बीर मोल्ला के बड़े भाई कहते हैं, ''2009 के चक्रवात में हमने अपने मवेशी खो दिए थे. यहां के गांव समुद्र में बदल गए थे. लगभग 29 लोगों की जान चली गई थी. जब बहुत ज्यादा बारिश होती है, तो यहां पहुंचने में 2-3 दिन लग जाते हैं.'' वो याद करते हैं कि कैसे दो साल पहले, जिस घर में वे अभी बैठे हैं, उसी में बाढ़ आ गई थी, जिसकी वजह से पूरे परिवार को सड़क पर आना पड़ा था.
वो आगे बताते हैं, ''मैं सूरत में करीब 5000 रुपए में अपना खर्च चला लेता हूं. घर भेजने के लिए 10000 रुपए तक बचा लेता हूं. हम छह भाई हैं और हमारे पास खेती की जमीन बहुत कम है. अब मेरे दो बच्चे हैं. हममें से हर किसी के दो या तीन बच्चे हैं. जब आपकी कमाई कम हो, तो बड़ा परिवार नहीं होना चाहिए, वरना उनका पेट कौन भरेगा?''
कुछ किलोमीटर दूर, सुंदरबन के मैंग्रोव जंगलों के प्रवेश द्वार, गोतखाली फेरी पोर्ट पर, हमने प्रवासी मजदूरों की एक लंबी कतार देखी, जो फेरी से गोसाबा निर्वाचन क्षेत्र के अपने गांवों को लौट रहे थे. महाराष्ट्र से एक गहने चमकाने वाला मजदूर और छत्तीसगढ़ से एक निर्माण मजदूर, दोनों ही वोट डालने के लिए अपने घर जा रहे थे. दोनों की भावना एक जैसी थी, प्रवासी मजदूर बनकर रहने की मजबूरी और घर पर ही टिके रहने की गहरी चाहत. लेकिन दक्षिण 24 परगना में उनके परिवारों का गुजारा चलाने लायक नौकरियां नहीं हैं.
2000 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर, शिव रंजन सरकार मुंबई में गहने चमकाने का काम करते हैं. सुंदरबन के एक द्वीपीय प्रशासनिक क्षेत्र गोसाबा ब्लॉक जाने वाली फेरी में बैठे हुए वो कहते हैं कि यदि उन्हें मौका मिले, तो वह घर पर ही रहना पसंद करेंगे. "मैं पिछले आठ साल से मुंबई में रह रहा हूं. घर की जिंदगी ज्यादा अच्छी है. मेरा परिवार यहीं है. मुझे अपने परिवार से दूर रहने का दर्द महसूस होता है," यह कहते हुए वो भावुक हो जाते हैं. हाथों में बस दो बैग लिए उन्होंने बताया कि उनकी वापसी का टिकट सात दिन बाद का है.
शिव रंजन कहते हैं, "गांव में सुकून है, लेकिन कम वेतन या रोजगार के अवसरों की कमी सुंदरबन की प्राकृतिक सुंदरता से दूर रखती है. जब मैं काम से लौटता हूं, तो मुंबई में मेरा इंतजार करने वाला कोई नहीं होता. परिवार से दूर रहने का यही सबसे मुश्किल पहलू है. मेरी जिंदगी कुंवारे लोगों जैसी हो गई है. रोजी-रोटी के कारण हम अपने बच्चों को बड़ा होते हुए नहीं देख पाते.'' एक निर्माण मजदूर, जिसके पास एक गहरे लाल-काले रंग का बैग और एक झोला था, ट्रेन से 16 घंटे से भी ज्यादा का सफर तय करके आया था.
ट्रेन में उसकी सीट शौचालय के ठीक बगल वाली जमीन पर थी. मैथी मंडल कहते हैं, "यहां कोई रोजगार नहीं है. हमारे पास और क्या विकल्प हैं? यह एक जरूरी वोट है, जिसके लिए हम घर वापस आए हैं. कौन भला छत्तीसगढ़ या किसी दूसरी जगह वापस जाना चाहेगा? लेकिन, यहां काम-धंधा है ही कहां?" ताजा आंकड़ों के अनुसार, बंगाल के 20 लाख से भी ज्यादा मतदाता प्रवासी मजदूर माने जाते हैं. घर पर रोजगार के अवसरों की कमी और कम वेतन के कारण उन्हें दक्षिण 24 परगना जैसे अपने प्राकृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों से दूर परदेस में रहने पर मजबूर होना पड़ता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तरी बंगाल, मालदा, मुर्शिदाबाद और दक्षिण 24 परगना से सबसे ज्यादा लोग प्रवासी मजदूर के तौर पर बाहर जाते हैं.
अमित भारद्वाज