बंगाल चुनाव से पहले नंदीग्राम में वोटर लिस्ट पर सवाल, दावा- हटाए गए नामों में 95% मुस्लिम

नंदीग्राम में 2026 के चुनावों से पहले मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर मामला गरमा गया है. सबर इंस्टीट्यूट के मुताबिक, हटाए गए नामों में 95.5% मुस्लिम मतदाता हैं. ये चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है.

Advertisement
नंदीग्राम में मतदाता सूची को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. (File photo) नंदीग्राम में मतदाता सूची को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. (File photo)

अनिर्बन सिन्हा रॉय

  • कोलकाता,
  • 07 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:45 PM IST

नंदीग्राम, पश्चिम बंगाल के सबसे चर्चित चुनावी क्षेत्रों में से एक है. अब ये सीट 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले एक बार फिर चुनावी जांच के केंद्र में आ गई है. कोलकाता स्थित पब्लिक पॉलिसी रिसर्च संगठन 'सबर इंस्टीट्यूट' ने मतदाता सूची से नाम हटाने के विश्लेषण में एक चौंकाने वाला पैटर्न सामने आया है.

रिसर्चर्स का दावा है कि पूरक सूची में हटाए गए कुल मतदाताओं में से 95% मुस्लिम हैं. इन आंकड़ों ने नंदीग्राम जैसे संवेदनशील निर्वाचन क्षेत्र में चुनावी पारदर्शिता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

Advertisement

नंदीग्राम सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं है, बल्कि ये बंगाल की राजनीतिक लड़ाई का प्रतीक है. 2021 के चुनावों में यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी से मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा था.

2026 के चुनावों के लिए पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल को होना है और 6 अप्रैल को नामांकन बंद हो चुके हैं. ऐसे में चुनावी प्रक्रिया में किसी भी तरह की अनियमितता के गंभीर राजनीतिक मायने हैं. भारतीय चुनाव आयोग से मिले और सबर इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के मुताबिक, नंदीग्राम में मुस्लिम आबादी लगभग 25% है, लेकिन पहली सात पूरक सूचियों में हटाए गए नामों में 95.5% मुस्लिम हैं.

यह भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल चुनाव: BJP ने जारी की उम्मीदवारों की पांचवीं लिस्ट, देखें किसे कहां से मिला टिकट

ये गैर-मुस्लिम आबादी का करीब 75% हैं, हटाए गए नामों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 4.5% है. पूरक सूचियों में कुल 2,826 नाम हटाए गए, जिनमें से 2,700 मुस्लिम हैं. संस्थान ने इसे 'गंभीर और चिंताजनक असमानता' बताया है. अगर नाम हटाना डेमोग्राफी स्ट्रक्चर के अनुपात में होता, तो मुस्लिमों की हिस्सेदारी लगभग एक-चौथाई होनी चाहिए थी.

Advertisement

लिंग और पिछले आंकड़ों के साथ तुलना

विश्लेषण से पता चलता है कि ये रुझान लिंग आधारित नहीं है. हटाए गए मतदाताओं में 48.9% महिलाएं और 51.1% पुरुष हैं. हालांकि, पूरक सूची 4A में हटाए गए 100% लोग गैर-मुस्लिम महिलाएं थीं.

दिलचस्प बात ये है कि दिसंबर 2025 का सबर इंस्टीट्यूट का एक अलग डेटा सेट एक अलग तस्वीर पेश करता है. ये 'अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लिकेट' (ASDD) स्टैंडर्ड पर बेस्ड था. इस लिस्ट में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 33.3% और गैर-मुस्लिमों की हिस्सेदारी 66.7% थी.

सबर इंस्टीट्यूट का आधिकारिक बयान

सबर इंस्टीट्यूट ने अपने बयान में कहा, 'पहली बार नंदीग्राम निर्वाचन क्षेत्र में पूरक सूची के विश्लेषण से एक गंभीर असमानता सामने आई है. हटाए गए लोगों में 95.5% मुस्लिम हैं, जबकि वो दिसंबर 2025 की ASDD सूची में 33.3% और कुल जनसंख्या में लगभग 25% थे.'

संस्थान के निदेशक सबीर अहमद ने इसे एक रेगुलर प्रैक्टिस बताया. हालांकि उन्होंने कहा कि इसे जल्दबाजी में और डेमोग्रैफिक वैरायटी के बारे में सोचे बिना किया गया है. उन्होंने कहा, 'हमने रैंडम तरीके से नंदीग्राम, भवानीपुर और दूसरे क्षेत्रों की जांच की है. हर जगह डिलीटेड लिस्ट में मुस्लिम बिना किसी अनुपात के शामिल थे. ये साफ है कि इसके जरिए उन्हें टारगेट किया गया है. मतुआ और महिलाएं भी इसके निशाने पर हैं.'

Advertisement

यह भी पढ़ें: बंगाल SIR: 90 लाख से ज्यादा मतदाता वोटर लिस्ट से बाहर, EC ने पहली बार जारी किया जिलेवार डेटा

पारदर्शिता पर बहस तेज

2026 विधानसभा चुनाव के पहले चरण के करीब आने के साथ, इन नतीजों ने मतदाता सूची संशोधन और पारदर्शिता पर बहस तेज कर दी है. सबर इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों ने चुनाव अधिकारियों से जवाब मांगा है. एक ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में जहां हर वोट का वजन और राजनीतिक अहमियत बहुत ज्यादा है, वहां मतदाता सूची से नाम हटाने का मुद्दा मतदान के दिन तक एक बड़ा चर्चा का विषय बना रह सकता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement