विजय बने तमिलनाडु के नए 'जननायक', TVK की जीत से टूटा 60 साल का सियासी चक्र

तमिलनाडु की राजनीति में थलापति विजय की पहली चुनावी जीत ने 60 सालों से चले आ रहे दो प्रमुख दलों AIADMK और DMK के वंशवादी राज को चुनौती दी है. विजय ने चेन्नई, मदुरै और कोंगू नाडु क्षेत्रों में भारी बहुमत हासिल कर राजनीति में नए युग की शुरुआत की है.

Advertisement
विजय ने तमिलनाडु की राजनीति में तहलका मचा दिया है. (Photo: ITGD) विजय ने तमिलनाडु की राजनीति में तहलका मचा दिया है. (Photo: ITGD)

सिद्धार्थ विश्वनाथन

  • चेन्नई,
  • 04 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:47 PM IST

साल 1991 में एक फिल्म आई थी 'इधयम'. उसकी कुछ लाइनें थीं- "अप्रैल और मई के महीने में इस गर्मी में कहीं हरियाली नहीं है... ये शहर और ये दुनिया सब अस्त-व्यस्त है, सब उबाऊ है.' मेरे बड़े होने के सालों में तमिलनाडु की हकीकत बिल्कुल ऐसी ही थी.

बचपन में जब भी मैं तमिलनाडु जाता था, तो वहां मुझे सिर्फ कुछ ही जोड़ियां नजर आती थीं. AIADMK और DMK, जयललिता और एम. करुणानिधि, कमल हासन और रजनीकांत. 

Advertisement

मेरे लिए तमिलनाडु की दुनिया बस इन्हीं के इर्द-गिर्द सिमटी हुई थी. विकल्प बहुत कम थे और राजनीति बेहद उबाऊ लगने लगी थी.

दो दलों का 60 साल का राज

तमिलनाडु के करोड़ों युवाओं की तरह मैंने भी देखा कि कैसे इन दो दलों ने करीब 60 सालों तक बारी-बारी से राज किया. तमिल गौरव, संस्कृति और हिंदी विरोध बचपन का हिस्सा बन गए थे. मुझे लगता था कि तमिलनाडु की मानसिकता हमेशा हमारे 'थाथा-पाटी' (दादा-दादी) जैसी ही रहेगी- कठोर, लकीर की फकीर और सिर्फ व्यक्तित्व की पूजा करने वाली.

एक तरफ जयललिता के आभा मंडल से टिकी AIADMK थी, तो दूसरी तरफ करुणानिधि के नेतृत्व वाली DMK, जिसने भाषा के विमर्श को नई परिभाषा दी. मंदिरों और परंपराओं की धरती पर इन नास्तिक विचारधारा वाले दलों ने अपनी जड़ें कैसे जमाईं, ये हमेशा मेरे लिए हैरान करने वाली बात रही. 

Advertisement

यह भी पढ़ें: Thalapathy Vijay Networth: फिल्मों से राजनीति तक... थलपति विजय का धमाल, जानिए कितनी है नेटवर्थ

दोनों द्रविड़ दल एक-दूसरे को भ्रष्टाचार और 'बड़ा व्यक्तित्व' होने की रेस में पछाड़ने में लगे रहते थे. तमिल पहचान का असली 'कॉपीराइट' किसके पास है? मैं ये कभी समझ नहीं पाया.

क्यों जरूरी था बदलाव?

मेरे स्कूल की छुट्टियां अप्रैल के आखिर से मई के आखिर तक होती थीं. मेरे पिता पूरे परिवार को चेन्नई ले जाते थे, वो भी ट्रेन के स्लीपर क्लास में. मेरे दादाजी दक्षिणी रेलवे के पूर्व जनरल मैनेजर थे, लेकिन मेरे पिता ने कभी सुविधाओं का फायदा नहीं लिया.

मुंबई से चेन्नई की वो दो दिन का थका देने वाला सफर और फिर चेन्नई की जानलेवा गर्मी और उमस. हमारा घर अडयार में था, जो वेलाचेरी विधानसभा का हिस्सा है. वो AIADMK का गढ़ था और वहां सिर्फ जयललिता मायने रखती थीं.

बिजली कटौती, बुनियादी ढांचे और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे वहां गौण थे. 'परम नेता' ने जो कह दिया, वही कानून था. तमिल पहचान की आड़ में जनता की व्यावहारिक समस्याओं को हमेशा पीछे धकेल दिया गया। बदलाव की सख्त जरूरत थी, लेकिन समस्या ये थी कि कोई भी व्यवहार्य विकल्प नजर नहीं आ रहा था.

विजय की जीत क्यों है ऐतिहासिक?

दक्षिण भारत की राजनीति में हमेशा से फिल्मी सितारों का दबदबा रहा है. MGR, करुणानिधि, जयललिता और एनटी रामाराव- ये सभी मेगास्टार थे जिन्होंने पर्दे से निकलकर राजनीति में अपनी जगह बनाई. जब 'थलापति' विजय ने राजनीति में कदम रखा, तो लगा कि इतिहास खुद को दोहरा सकता है. कमल हासन जैसे दिग्गज अभिनेता ने भी 'मक्कल निधि मय्यम' के जरिए उम्मीद जगाई थी, लेकिन वो विफल रहे.

Advertisement

इस चुनाव में किसी ने विजय को मौका नहीं दिया था. सभी एग्जिट पोल उन्हें सिर्फ 0 से 6 सीटें दे रहे थे. लेकिन क्या शानदार उलटफेर हुआ है. चेन्नई से मदुरै और कोंगू नाडु तक, विजय ने अपने पहले ही चुनाव में सबको पीछे छोड़ दिया. 'घिल्ली' बॉय, जो 'मास्टर' बना और अब सच्चा 'जन नायक' बनकर उभरा है.

विजय की ये जीत इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि इसने तमिलनाडु की 60 साल पुरानी वंशवादी और दो-पक्षीय संरचना को जड़ से मिटा दिया है. 'वेत्तैकरन' (शिकारी) अब राजनीति का सबसे चमकता सितारा बन गया है.

यह भी पढ़ें: 'थलपति' अब सियासी सुपरस्टार, डेढ़ साल में विजय की आंधी में ऐसे उड़े स्टालिन

विजय की पार्टी का प्रतीक 'सीटी' है. चेन्नई में सुपर किंग्स का एक मशहूर नारा है 'व्हिसल पोडू'. अब वक्त आ गया है कि अपनी निष्ठा बदली जाए- थला धोनी से थलापति विजय की तरफ. तमिलनाडु के आसमान में बदलाव की एक नई और तेज लकीर खिंच चुकी है. ये जीत सिर्फ एक चुनाव की जीत नहीं है, बल्कि एक नए युग की शुरुआत है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement