पश्चिम बंगाल का सिंगूर पिछले लगभग 17 वर्षों से भारत के सबसे बड़े औद्योगिक विवादों में से एक का प्रतीक बना हुआ है. साल 2008 में यहां आंदोलन के बाद टाटा मोटर्स ने अपनी निर्माणाधीन टाटा नैनो की फैक्ट्री को बंद कर गुजरात के साणंद में शिफ्ट कर दिया था.
उस समय यह आंदोलन राज्य की राजनीति का टर्निंग पॉइंट बना और ममता बनर्जी सत्ता में आ गईं, जिससे 34 साल पुराना वाम मोर्चा शासन खत्म हो गया. लेकिन आज सिंगूर की ज़मीनी हकीकत कुछ और कहानी बयां करती है. यह कहानी है छूटे हुए मौके, बेरोजगारी और अधूरे विकास की.
साल 2006 में वाम मोर्चा सरकार ने सिंगूर में लगभग 1000 एकड़ जमीन अधिग्रहित की थी, जहां टाटा मोटर्स दुनिया की सबसे सस्ती कार नैनो का प्लांट लगाने जा रही थी. लेकिन तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में आंदोलन शुरू हुआ. आंदोलनकारियों का कहना था कि बहुफसली उपजाऊ जमीन पर उद्योग नहीं लगना चाहिए. आंदोलन इतना बड़ा हो गया कि सिंगूर राजनीतिक युद्ध का मैदान बन गया.
किसानों की आपबीती
आखिरकार 3 अक्टूबर 2008 को रतन टाटा ने आधिकारिक रूप से सिंगूर से नैनो प्रोजेक्ट हटाने का ऐलान कर दिया. बाद में 2016 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद किसानों को जमीन वापस मिल गई, लेकिन आज कई लोग इसे अधूरी जीत मानते हैं.
राजेश दास, जो पेशे से ड्राइवर हैं, कभी 'अनिच्छुक किसानों' के आंदोलन के फ्रंटलाइन कार्यकर्ता थे. आज उन्हें लगता है कि उस समय उनसे गलती हो गई. राजेश कहते हैं, “उस समय हमें कहा गया था कि उद्योग आने से खेती खत्म हो जाएगी, लेकिन आज हम हर तरह से पिछड़ गए हैं. टाटा ने हर जमीन देने वाले परिवार को नौकरी देने का वादा किया था. अगर फैक्ट्री लगती तो आज मैं वहीं काम कर रहा होता. आज मुझे जिंदा रहने के लिए दिन-रात गाड़ी चलानी पड़ती है.”
राजेश का आरोप है कि अब सरकारी मदद भी राजनीतिक आधार पर मिलती है और जिनकी राजनीतिक पहुंच है, उन्हें ज्यादा फायदा मिलता है. वह कहते हैं, 'हमने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली.'
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नई पीढ़ी की बेरोज़गारी
बाजेमेलिया की रहने वाली प्राइवेट ट्यूटर राखी दास सिंगूर की नई पीढ़ी की कहानी बताती हैं. उनके पिता उन किसानों में थे जिन्होंने फैक्ट्री का विरोध किया था.
उनके पिता एक ऐसे किसान थे जो खेती नहीं करना चाहते थे और उन्होंने फ़ैक्टरी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी. अब, जब वह उस खाली पड़ी ज़मीन को देखती हैं, तो उन्हें अपना भविष्य बर्बाद होता हुआ नज़र आता है.
वह कहती हैं, "मेरे पिता को उनकी ज़मीन तो वापस मिल गई, लेकिन अब वह खेती के लायक नहीं रही. सरकार हर महीने 2,000 रुपये देती है, लेकिन इतने पैसों से क्या हो सकता है? अगर वह इंडस्ट्री यहीं रहती, तो मेरी पीढ़ी के लोग आज डिग्री लेकर यूं ही खाली नहीं बैठे होते. हमें काम की तलाश में कोलकाता या दूसरे राज्यों में पलायन नहीं करना पड़ता."
स्थानीय किसान अरुण दास का मानना है कि वाम मोर्चा सरकार किसानों के हित में ही काम कर रही थी. उनका कहना है कि जिस जमीन को बहुफसली बताया गया, उसमें से काफी जमीन एक फसल वाली थी.
अरुण कहते हैं, “यहां के कई युवाओं ने टाटा में नौकरी के लिए ट्रेनिंग भी पूरी कर ली थी. फैक्ट्री शुरू होने वाली थी, लेकिन सब बंद हो गया. आज ज्यादातर युवा बेरोज़गार हैं. नई पीढ़ी खेती करना नहीं चाहती और जमीन भी बेकार पड़ी है.”
जमीन मिली, लेकिन खेती नहीं हो पा रही
सिंगूर में ज्यादातर लोगों की राय अब बदल चुकी है. किसानों को जमीन तो वापस मिल गई, लेकिन फैक्ट्री के निर्माण के कारण जमीन के नीचे कंक्रीट और ढांचा बन चुका था, जिससे कई जगह खेती करना मुश्किल हो गया है. यानी जमीन वापस मिलने के बावजूद स्थायी रोजगार का कोई साधन नहीं बन पाया.
सामाजिक कार्यकर्ता अनुराधा तलवार, जो सिंगूर आंदोलन का प्रमुख चेहरा थीं, कहती हैं कि इस आंदोलन को दो नजरिए से देखना चाहिए. पहला-किसानों से जबरन जमीन लेना गलत था, इसलिए आंदोलन सही था. दूसरा-सरकार को जमीन वापस मिलने के बाद उसे खेती के लायक बनाना चाहिए था, जो ठीक से नहीं किया गया. उनका कहना है कि आज की सरकार कृषि विकास की बजाय लोगों को आर्थिक सहायता देने पर ज्यादा ध्यान दे रही है.
राजनीति जारी, विकास का इंतजार
फरवरी 2026 में PM मोदी ने सिंगूर में एक बड़ी रैली की. लोगों को उम्मीद थी कि औद्योगिक विकास को लेकर कोई बड़ा ऐलान होगा, लेकिन भाषण राजनीतिक रहा और कोई ठोस योजना सामने नहीं आई. इसके एक हफ्ते बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी रैली की और अपनी सरकारी योजनाओं की बात की, लेकिन उद्योग या बड़े विकास प्रोजेक्ट पर कुछ साफ नहीं कहा.
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आज सिंगूर में एक दिलचस्प स्थिति है. 17 साल पहले जिन लोगों ने टाटा को यहां से जाने पर मजबूर किया था, आज वही लोग उद्योग के वापस आने का इंतजार कर रहे हैं. सिंगूर आज भी राजनीति और विकास के बीच फंसा हुआ है-जहां जमीन है, लोग हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर रोजगार और उद्योग नहीं है. सिंगूर की कहानी सिर्फ एक फैक्ट्री की नहीं, बल्कि यह उस सवाल की कहानी है-क्या जमीन बचाना ज्यादा जरूरी था या रोजगार? 17 साल बाद भी इस सवाल का जवाब सिंगूर तलाश रहा है.
तपस सेनगुप्ता / राही हलदर