केरल विधानसभा चुनाव की सियासी सरगर्मी के बीच सबरीमाला मंदिर का मुद्दा फिर से एक सुर्खियों में है. धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव से संबंधित याचिकाओं सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संवैधानिक पीठ 7 अप्रैल से सुनवाई करेगी. सबरीमला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं की एंट्री को लेकर दोबारा से सुनवाई शुरू हो रही है. ऐसे में सबकी नजरें लेफ्ट के सियासी स्टैंड पर है. आखिर लेफ्ट की अगुवाई वाला सत्ताधारी गठबंधन विपक्ष के सियासी चक्रव्यूह को कैसे पार करती है?
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली 9 बेंच ने सोमवार को कहा कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री,मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश सहित महिलाओं के साथ धार्मिक स्थलों पर होने वाले भेदभाव पर सुनवाई करेगा.
कोर्ट ने कहा कि सुनवाई 22 अप्रैल तक पूरी होने की संभावना है. इसके लिए सभी पक्षकारों से 14 मार्च तक लिखित जवाब मांगे गए हैं. ऐसे में लेफ्ट सरकार और पार्टी दोनों का सियासी स्टैंड बदल गया है, लेकिन सवाल यही है कि यह यू-टर्न हिंदू वोटों की मजबूरी है?
सबरीमाला का मुद्दा फिर गरमाया
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट अब अपने 2018 के फैसले पर रिव्यू पिटीशन की सुनवाई कर रहा है, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को केरल के सबरीमाला दिर में जाने की इजाज़त दी गई थी. इसके बाद नवंबर 2019 में सर्वोच्च अदालत ने दूसरे धर्म के मामलों की याचिकाओं की सुनवाई के लिए 9 जजों की एक बेंच गठित कर दी थी, जिसे लेकर अब 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू करने का जा रहा है.
केरल विधानसभा के बीच मामला फिर से सियासी पटल पर आ गया है. ऐसे में सियासत भी शुरू हो गई है, बीजेपी से लेकर कांग्रेस तक लेफ्ट सरकार से अपना नजरिया साफ करने के लिए मांग की है. बीजेपी सबरीमाला मंदिर में केरल के उन हिंदू समुदाय के साथ खड़ी है, जो मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ हैं.
मंदिर में इंट्री के खिलाफ हिंदू संगठन
केरल के दो बड़े हिंदू जाति संगठनों नायर सेवा सोसायटी (एनएसएस) और श्री नारायण धर्म परिपालन (एसएनडीपी) योगम ने फिर कहा कि मासिक धर्म वाली महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश नहीं मिलना चाहिए. एनएसएस के महासचिव जी सुकुमारन नायर ने कहा कि संगठन ने सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश के खिलाफ अपना रुख नहीं बदला है. हमें उम्मीद है कि सरकार मंदिर में परंपराओं और रीति-रिवाजों की रक्षा के पक्ष में खड़ी होगी. एक प्रोग्रेसिव तरीका आस्था की कीमत पर नहीं होना चाहिए, हम आस्था की रक्षा के लिए लड़ते रहेंगे.
वहीं, श्री नारायण धर्म परिपालन (एसएनडीपी) योगम के महासचिव वेल्लप्पल्ली नटेसन ने कहा कि संगठन मासिक धर्म वाली महिलाओं के प्रवेश का विरोध करता है. सरकार को अपना स्टैंड सुधारना चाहिए. सरकार को वह ठीक करना चाहिए जिसे ठीक करने की ज़रूरत है, जागरूक महिलाएं सबरीमाला नहीं जाएंगी.
लेफ्ट सरकार का स्टैंड अब बदला
सुप्रीम कोर्ट के रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई करने की बात कहने के बाद केरल सरकार के कानून मंत्री और सीपीएम लीडर पी राजीव ने कहा कि राज्य सरकार हमेशा आस्था की रक्षा के लिए खड़ी रहेगी, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में है. यह एक संवैधानिक मुद्दा है, जिसे एक मिनट में नहीं लिया जा सकता है. ये समय हां या फिर न कहने का नहीं है.
वहीं, सीपीएम के प्रदेश सचिव एम वी गोविंदन ने कहा कि सबरीमाला मुद्दे पर, सरकार और पार्टी का स्टैंड जरूरी नहीं कि एक जैसा हो, सरकार का हमेशा अपना स्टैंड होगा तो पार्टी की अपनी लाइन है.
कांग्रेस और बीजेपी ने लेफ्ट को घेरा
कांग्रेस नेता वी डी सतीशन ने कहा कि केरल सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपने पहले के हलफनामें को ठीक करना चाहिए, जिसमें उसने सबरीमाला मंदिर में लड़कियों की एंट्री का समर्थन किया था. साथ ही बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने कहा कि मौजूदा स्टैंड बता रहा है कि लेफ्ट सरकार सबरीमाला मुद्दे पर यू-टर्न ले रही है. लेफ्ट सरकार ने यह फैसला विधानसभा चुनाव को देखते हुए लिया है, जिसका अंदाजा साफ लगाया जा सकता है.
हिंदुओं वोटों पर पकड़ बनाने का प्लान
केरल में हिंदुओं के बीच अपनी इमेज को फिर से बनाने की अपनी हालिया कोशिशों में, जो लंबे समय से लेफ्ट का ट्रेडिशनल वोट बैंक रहे हैं, मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और CPI(M) ने हिंदू समुदाय नेताओं के साथ करीबी बढ़ाने में जुटा है. सितंबर 2025 में त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड, जो सबरीमाला मंदिर को मैनेज करने वाली स्टेट गवर्नमेंट बॉडी है.
75वीं एनिवर्सरी पर ग्लोबल अयप्पा संगमम समिट भी ऑर्गनाइज़ किया है. संगमम अपनी स्पॉन्सरशिप और इवेंट के लिए देवस्वम बोर्ड के फंड के इस्तेमाल को लेकर केरल हाई कोर्ट की जांच के दायरे में भी है, जिससे सीपीएम बैकफुट पर आ गई है. यही वजह है कि वो अपना स्टैंड बदल रही है.
दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला दिया था तो LDF सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया था, यह स्टैंड लेते हुए कहा था कि वह प्रोग्रेसिव वैल्यूज़ को बढ़ावा दे रही है. सरकार ने सबरीमाला में युवतियों की एंट्री को आसान बनाना शुरू किया था, इस फैसले से हिंदुओं के बीच बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हो गया था. 2019 चुनाव में उसे नुकसान उठाना पड़ा था. यही वजह है कि अब लेफ्ट फिर से अपना स्टैंड बदला है और अब आस्था के साथ खड़े होने की बात कर है.
लेफ्ट ने क्यों बदला अपना सियासी स्टैंड
लेफ्ट के अगुवाई वाले यूडीएफ ने 2021 में सत्ता में वापसी करने में कामयाब रही. 10 सालों से सत्ता में है, लेकिन 2026 में हैट्रिक लगाना आसान नहीं है. 2024 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट को सिर्फ एक सीट मिली तो हाल ही में हुए केरल के शहरी निकाय चुनाव में उसे हार मिली है.
एलडीएफ ने कांग्रेस की अगुवाई वाली यूडीएफ को वापसी करने का मौका दे दिया है.एलडीएप की हार का कारण सबरीमाला से कथित सोने की चोरी को बताया गया, यह एक ऐसा स्कैंडल था जिसमें कथित तौर पर कुछ CPI(M नेता शामिल थे. कांग्रेस और BJP दोनों ने ही इस स्कैंडल को आने वाले चुनावों में LDF के खिलाफ अपने मुख्य विधानसभा चुनाव के मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. ऐसे में लेफ्ट ने सबरीमाला के मुद्दे पर अपना सियासी स्टैंड बदलकर हिंदू वोटों को जोड़े रखने क दांव चला है.
कुबूल अहमद