रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक बैरकपुर क्षेत्र में एक विशाल रोड शो के जरिए बीजेपी के चुनाव अभियान को धार दी है. दो किलोमीटर लंबे इस रोड शो में चारों तरफ भगवा झंडे, पोस्टर और उत्साही समर्थकों की भीड़ दिखाई दी. राजनाथ ने विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनावी मुद्दा बनाते हुए सीमा पार से आने वाली बयानबाजी और घुसपैठ पर तीखा प्रहार किया.
हालांकि, इस सार्वजनिक उत्साह के बीच जब स्थानीय मतदाताओं से उनके व्यक्तिगत मतदान विकल्पों पर बात की गई तो अधिकांश ने चुप्पी साध ली. लोगों ने बीजेपी के प्रति सार्वजनिक समर्थन तो दिखाया, लेकिन निजी बातचीत में वो काफी सतर्क नजर आए. सड़क किनारे खड़े युवाओं से लेकर महिलाओं तक, हर किसी के मन में विकास और सुरक्षा को लेकर अपनी राय थी, जिसे वो सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने से बचते दिखे. मतदाताओं के अंदर ये विरोधाभास दिखाता है कि बंगाल का चुनाव केवल शोर-शराबे तक सीमित नहीं है, बल्कि असली फैसला मतदाताओं की उस खामोशी में छिपा है जो वो मतदान केंद्र तक बनाए रखना चाहते हैं.
बैरकपुर की सड़कों पर राजनाथ सिंह का रोड शो किसी उत्सव से कम नहीं था. सफेद कुर्ता-पायजामा और मोदी जैकेट पहने रक्षा मंत्री प्रचार वाहन के ऊपर से लगातार भीड़ का अभिवादन कर रहे थे. उनके साथ बीजेपी उम्मीदवार सुमित्रो चटर्जी और बैरकपुर प्रभारी निशिकांत दुबे भी मौजूद थे. दुकानों की छतों और बालकनियों से लोग फूलों की बारिश कर रहे थे. सुरक्षा और विकास के नारों के साथ बीजेपी ने यहां अपनी ताकत का अहसास कराया, जिसे देखकर पहली नजर में बीजेपी के पक्ष में एक मजबूत लहर का संकेत मिलता है.
बंगाल में घुसपैठ बड़ा मुद्दा
इस रोड शो से ठीक 24 घंटे पहले सियालकोट से पाकिस्तान के रक्षा मंत्री द्वारा कोलकाता पर हमले की धमकी वाला बयान आया था. राजनाथ सिंह ने चतुराई से इस अंतरराष्ट्रीय बयानबाजी को बंगाल के स्थानीय चुनाव से जोड़ दिया.
उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ जैसे मुद्दों को विकास के साथ जोड़कर पेश किया. बंगाल के इस चुनाव में, जहां घुसपैठ हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है, सीमा पार से आई इस धमकी ने चुनावी चर्चा को एक नया और गंभीर आयाम दे दिया है.
मतदाताओं ने साधी चुप्पी
जैसे ही कैमरा और माइक रोड शो की चकाचौंध से हटकर आम जनता की ओर मुड़ा, माहौल पूरी तरह बदल गया. जब मैंने भीड़ में शामिल लोगों से पूछा कि क्या उन्हें लगता है कि बीजेपी विकास लाएगी तो प्रतिक्रियाएं बेहद संभली हुई थीं. कुछ लोग बस मुस्कुराए तो कुछ ने धीरे से सिर हिलाया. एक महिला ने तो सीधे कह दिया कि जवाब देने की 'कोई जरूरत' नहीं है. सार्वजनिक रैली में जो जोश दिख रहा था, वह निजी बातचीत में गायब था, मानो लोग अपनी राजनीतिक पसंद को गुप्त रखना ही बेहतर समझ रहे हों.
महिला मतदाताओं का संतुलित नजरिया
बीजेपी का झंडा थामे महिलाओं के एक समूह से बात करने पर राजनीति का एक अलग और बारीक पहलू सामने आया. उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बारे में सम्मान पूर्वक बात की और उन्हें एक मजबूत नेता बताया, लेकिन साथ ही उनके मन में इस बात की उत्सुकता भी थी कि अगर बीजेपी को मौका मिला तो वह क्या नया कर सकती है. ये न तो पूरी तरह से समर्थन था और न ही अस्वीकार, बल्कि एक ऐसी स्थिति थी. जहां मतदाता वर्तमान से परिचित तो है, लेकिन विकल्प को लेकर अभी-भी अनिश्चितता और जिज्ञासा के बीच झूल रहा है.
2021 की हिंसा का डर
सड़क किनारे खड़े युवाओं के बीच चर्चा का मुख्य विषय घुसपैठ और सीमावर्ती क्षेत्रों में बदलती डेमोग्राफी थी. उन्होंने इसे एक गहरी चिंता के रूप में पेश किया.
बातचीत के दौरान 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा का जिक्र भी बार-बार आया. बीजेपी समर्थकों के मन में उस हिंसा की यादें आज भी ताजा हैं. शायद यही वह डर या कड़वा अनुभव है, जिसकी वजह से लोग सार्वजनिक रूप से किसी एक पार्टी का नाम लेने के बजाय खामोश रहना ज्यादा पसंद करते हैं.
वामपंथी कैडर का शांति मार्च
उधर, जैसे ही बीजेपी का काफिला आगे बढ़ा और भीड़ कम हुई, उसी जगह पर अचानक वामपंथी कैडर (CPI) के लोग इकट्ठा होने लगे. इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं थीं जो शांतिपूर्वक झंडे लेकर मार्च कर रही थीं. पिछले 15 वर्षों से सत्ता से बाहर रहने के बावजूद इन समर्थकों में अटूट वफादारी दिखी. जब उनसे पूछा गया कि वो हार के बावजूद साथ क्यों हैं तो उन्होंने इसे अपनी विचारधारा के प्रति निष्ठा बताया. उन्होंने वर्तमान सरकार के 2011 के बाद के अधूरे वादों पर निराशा भी जाहिर की.
बदलाव की राह
एक वामपंथी महिला समर्थक ने तीखा सवाल किया कि बंगाल आज राजनीतिक हिंसा के अलावा और किन पांच चीजों के लिए जाना जाता है? उनका दावा था कि शहरी इलाकों में असंतोष बहुत गहरा है, लेकिन वह शांत है.
उनके मुताबिक, चुनाव के नतीजे इस बार सबको चौंका सकते हैं, क्योंकि लोग अब चुपचाप बदलाव की राह देख रहे हैं. वामपंथियों का ये शांत मार्च बीजेपी के हाई-वोल्टेज रोड शो के ठीक बाद एक अलग ही राजनीतिक तस्वीर पेश कर रहा था.
मतदाताओं ने विरोधाभास
बैरकपुर के इस एक घंटे ने बंगाल की राजनीति के एक बड़े विरोधाभास को उजागर किया. सार्वजनिक रूप से भाजपा का समर्थन ऊर्जावान, दृश्यमान और मुखर है. लेकिन निजी तौर पर मतदाता कहीं अधिक सतर्क है और अपने पत्ते खोलने से बच रहा है. वह विकल्पों को तौल रहा है और किसी भी स्पष्ट घोषणा से परहेज कर रहा है. बीजेपी के मेगा रोड शो से लेकर वामपंथियों के शांत मार्च तक, संदेश साफ था कि असली मुकाबला उस शोर में नहीं है जो सुनाई दे रहा है.
पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में असली जंग उन मुद्दों और पसंद के बारे में है जो फिलहाल अनकही हैं. मतदाता का मौन किसी बड़ी हलचल का संकेत हो सकता है या फिर अपनी सुरक्षा के लिए अपनाया गया एक कवच. बैरकपुर के अनुभव ने ये स्पष्ट कर दिया कि जब तक मतपेटी नहीं खुलती, तब तक बंगाल के मन को पढ़ना लगभग नामुमकिन है. वहां जो जोर से कहा जा रहा है, वह शायद उतना महत्वपूर्ण नहीं है. जितना कि वह जो वोट डालने तक मन में दबा कर रखा गया है.
ऐश्वर्या पालीवाल