पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव ऐलान के साथ ही सियासी तपिश गर्म हो गई है. चुनावी जंग में टीएमसी प्रमुख व सीएम ममता बनर्जी ने बीजेपी के 'नो-रिपीट' फॉर्मूले को अपनाया है. बीजेपी अपने इस 'विनिंग फॉर्मूला' को केंद्र से लेकर राज्य के चुनाव तक में आजमाती रही है. अब इस दांव से ममता ने बंगाल की सियासी जंग को चौथी बार फतह करने की पटकथा लिखी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या बीजेपी की तरह जीत भी दर्ज कर पाएंगी?
बीजेपी 'नो रिपीट' फॉर्मूले को गुजरात से शुरू किया है, जो सबसे ज्यादा हिट रहा. बीजेपी चुनाव में पुराने चेहरों को हटाकर, उनकी जगह पर नए चेहरों को मैदान में उतारकर वह विपक्ष के सारे गणित और दांव को बिगाड़ती रही है.सत्ता विरोधी लहर से निपटने के लिए बीजेपी इस विनिंग फॉर्मूले को अपनी 'प्रयोगशाला' में आजमाती रही है, जिसे अब ममता बनर्जी ने बंगाल के चुनावी रण में आजमाने का दांव चला है.
बंगाल का चुनाव ममता बनर्जी के लिए साख का सवाल बना हुआ है. यही वजह है कि ममता अपने सियासी किले को बचाए रखने के लिए कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ रही हैं और पार्टी के कई बड़े चेहरों को भी कुर्बान करने से नहीं हिचक रही हैं. टीएमसी ने अपने मौजूदा विधायकों में से 74 विधायकों के टिकट काट दिए हैं. ममता बनर्जी ने यह तरीका पहली बार आजमाया है, लेकिन क्या बीजेपी की तरह विपक्ष के सारे समीकरण को भी फेल कर पाएंगी?
ममता ने काटे 74 मौजूदा विधायक के टिकट
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की 294 सीटों में से 291 सीट पर उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर दिया है और तीन सीटें अनित थापा के नेतृत्व वाली बीजीपीएम के लिए छोड़ दी है. ममता बनर्जी ने इस बार अपने 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए हैं और उनकी जगह पर नए चेहरे उतारे हैं. इसे लेकर पार्टी के भीतर हलचल मचा दी है, लेकिन इसे ममता के सियासी प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है.
ममता बनर्जी ने अपने मौजूदा 135 विधायकों पर एक बार फिर से भरोसा जताया है, उन्हें टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारा है. ममता ने जिन 135 विधायकों को दोबारा उम्मीदवार बनाया है 135 विधायकों को उनकी पुरानी सीटों से ही मैदान में उतारा जा रहा है. 15 विधायकों की सीट बदल दी है.
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टीएमसी ने जोर देकर कहा कि टिकट समर्पित जमीनी कार्यकर्ताओं को दिया गया है. ममता बनर्जी ने पार्थ चटर्जी, तपन दासगुप्ता, ज्योत्सना मंडी, माणिक भट्टाचार्य, मनोरंजन ब्यापारी, तजमूल हुसैन, मुकुटमणि अधिकारी, सौमेन महापात्रा, असित मजूमदार,मनोज तिवारी, बिप्लब रॉय चौधरी, परेश पाल, कंचन मलिक, स्वर्णकमल साहा, विकास रॉयचौधुरी और विवेक गुप्ता जैसे 74 विधायकों के टिकट काट दिए हैं. पार्टी ने इनकी जगह पर नए चेहरों को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा है.
ममता ने क्यों काटे मौजूदा विधायक के टिकट
ममता बनर्जी ने मौजूदा विधायकों को टिकट काटकर उनकी जगह पर नए चेहरों को उतारने का दांव नहीं चला बल्कि सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. बंगाल में 15 साल से ममता बनर्जी के अगुवाई में टीएमसी की सरकार है. इतने लंबे समय तक सत्ता में रहने के चलते एंटी- इनकंबेंसी सरकार के खिलाफ होना स्वाभाविक होता है. ममता बनर्जी इस बात को भी जानती हैं कि सरकार से ज्यादा नारजगी स्थानीय विधायक को लेकर है, जिसके चलते उन्होंने पुराने चेहरों की जगह पर नए उम्मीदवार को उतारने का दांव चला है.
टीएमसी रणनीतिकारों और ममता बनर्जी के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 'विनिंग फैक्टर' को तवज्जे दे रही हैं. इसके लिए वो पुराने रिश्तों का भी अहमियत नहीं दे रही हैं. ममता बनर्जी ने इस बार टिकट वितरण में जिताऊ उम्मीदवार पर ही दांव खेल रही हैं. इसके अलावा टीएमसी के जिन भी विधायक और मंत्रियों पर भ्रष्टाचार या फिर किसी तरह से आरोप लगे थे, उन्हें भी टिकट नहीं दिया है. इस तरह ममता बनर्जी अपनी इमेज के साथ कोई समझौता करने के मूड में नहीं है.
दागी विधायकों पर ममता बनर्जी की स्ट्राइक
ममता बनर्जी ने अपने उन विधायकों के ही टिकट काटे हैं, जो किसी का किसी मामले में फंसे हुए हैं या फिर उनके चलते टीएमसी की छवि को भी झटका लगा है. बंगाल में शिक्षक भर्ती से लेकर भ्रष्टाचार तक के मामले में सामने आए हैं, जिसे लेकर विपक्ष लगातार ममता बनर्जी को निशाने पर ले रहा था. ममता बनर्जी ने उन्हें पैदल कर दिया है.
टीएमसे के दिग्गज नेता पार्थ चटर्जी, माणिक भट्टाचार्य और जीवनकृष्ण साहा जैसे वे कद्दावर नाम, जो कभी टीएमसी की कोर कमिटी का हिस्सा हुआ करते थे. भ्रष्टाचार में नाम जुड़ने के बाद पार्टी ने इन नेताओं से न केवल पूरी तरह से किनारा कर लिया है,बल्कि चुनाव में टिकट काट दिए हैं.इस तरह से स्पष्ट संदेश दे दिया है कि घोटालों के दाग लेकर कोई भी नेता चुनाव नहीं सकता है.
टीएमसी ने 'सितारों' को भी किया पैदल
ममता बनर्जी चुनावी मैदान में ग्लैमरस और बंगाली सिनेमा स्टार को उतारती रही हैं. टॉलीवुड के तमाम चेहरे टीएमसी से विधायक और सांसद बनते रहे हैं, लेकिन इस बार के चुनाव में ग्लैमरस चेहरों की जगह जमीन से जुड़े नेताओं को टिकट दिया है. इसके लिए स्वच्छ छवि का ख्याल भी रखा है. शिबपुर से विधायक व क्रिकेट खिलाड़ी मनोज तिवारी की जगह राणा चटर्जी को टिकट दिया है. मनोज तिवारी ममता सरकार में मंत्री हैं.
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टीएमसी ने मशहूर अभिनेता और विधायक कांचन मल्लिक और चिरंजीत चक्रवर्ती को टिकट नहीं दिया. कांचन मल्लिक का टिकट कटना सबसे ज्यादा चर्चा में है, क्योंकि उनकी निजी जिंदगी और सोशल मीडिया पर उनकी बयानबाजी से उपजे विवाद के चलते टिकट कटा है. उत्तरपारा (हुगली) से कंचन मलिक की जगह सांसद कल्याण बनर्जी के बेटे शीर्षन्या बनर्जी को टिकट दिया है. बारासात से चिरंजीत चक्रवर्ती की जगह सब्यसाची दत्ता को प्रत्याशी बनाया है.
ममता ने कई विधायकों के परिवार को दिया टिकट
ममता बनर्जी ने अपने जिन विधायकों के टिकट काटे हैं, उनमें कई ऐसे हैं, जिनकी जगह पर उनके परिवार के किसी दूसरे सदस्य को टिकट दिया गया है. महेशतला विधानसभा सीट से दुलाल चंद्र दास की जगह उनके बेटे शुभाशीष दास को टिकट दिया है.एंटाली विधानसभा सीट से विधायक स्वर्णकमल साहा की जगह उनके बेटे संदीपन साहा को प्रत्याशी बनाया है.
मानिकतला विधानसभा सीट से सुप्ति पांडे की जगह उनकी बेटी श्रेया पांडे को टिकट दिया गया है. पानीहाटी विधानसभा सीट से निर्मल घोष की जगह उनके बेटे तीर्थंकर घोष को टिकट दिया गया है. बालीगंज से बाबुल सुप्रियो की जगह पर शोभनदेब चट्टोपाध्याय को टिकट दिया है. ऐसे ही बेलेघाटा से विधायक परेश पाल की जगह कुणाल घोष चुनाव लड़ेंगे.
अभिषेक बनर्जी के लिए तैयार हो रही सियासी पिच
ममता बनर्जी के सियासी वारिस उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी को माना जाता है, टीएमसी में नंबर दो ही पोजिशन है. टीएमसी ने 74 विधायकों टिकट काटे हैं, उसे जेनरेशनल शिफ्ट की तरह देखा जा रहा है. यह अभिषेक बनर्जी की मजबूत होती पकड़ का भी सीधा प्रमाण है.
टीएमसी ने 74 विधायकों को टिकट नहीं दिया है, उनमें कई ऐसे नाम हैं जो सालों से अपने-अपने इलाकों के क्षत्रप माने जाते थे. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए टीएमसी ने तमाम बड़े और वरिष्ठ नेताओं के टिकट काटकर नए चेहरों पर भरोसा जताया है. इससे यह साफ है कि टीएमसी को भविष्य के लिए तैयार की जा रही है.
ममता क्या बीजेपी जैसी जीत भी दर्ज कर पाएंगी?
ममता बनर्जी ने अपने विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी को समझ रहे हैं. इसीलिए बीजेपी के फॉर्मूले पर टिकट काटने का दांव चला है. बीजेपी सत्ता विरोधी रुझान से बचने के लिए अपने विधायक की बलि देती रही है. इस तरह बीजेपी एंटी-इंकम्बेंसी से पार पाने के लिए पुराने विधायकों की जगह नए चेहरे के साथ सियासी रण में उतरती रही है.
बीजेपी के इसी विनिंग फॉर्मूले को ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के रण में आजमाने का दांव चला, लेकिन क्या वह बीजेपी की तरह जीत भी दर्ज कर सकेगी. यह बड़ा सवाल है, क्योंकि बीजेपी से उनका सीधा मुकाबला है, लेकिन लेफ्ट से लेकर कांग्रेस और कई छोटे दल ममता बनर्जी के वोटबैंक में सेंधमारी करती दिख रही है. ऐसे में देखना होगा कि बंगाल का किला ममता कैसे बचा पाएंगीं?
कुबूल अहमद