असम विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह बिखरती नजर आ रही है. प्रदेश अध्यक्ष से लेकर सांसद तक पाला बदलकर बीजेपी में शामिल हो रहे हैं. बताया जा रहा है कि असम कांग्रेस नेता पार्टी नेतृत्व द्वारा सुनवाई न होने और गौरव गोगोई की कार्यप्रणाली से नाराज हैं और इसी कारण वो दशकों बाद कांग्रेस से किनारा कर रहे हैं. वहीं, लगातार नेताओं के पार्टी छोड़ने की घटना ने कांग्रेस को चुनावी रण में बेहद कमजोर स्थिति में खड़ा कर दिया है. वहीं, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की रणनीतिक घेराबंदी के कारण कांग्रेस के बड़े चेहरे बुधवार को नई दिल्ली में बीजेपी में शामिल हो गए. इसी क्रम में प्रद्युत बोरदोलोई ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर दिसपुर सीट से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है.
संसद के गलियारों में बुधवार को कांग्रेस के लिए उस वक्त और भी अजीब स्थिति पैदा हो गई, जब असम के नगांव से कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने केंद्रीय मंत्री रवनीत बिट्टू को गले लगाया और कहा कि अब उन्हें भी 'गद्दार' कहा जाएगा.
दरअसल, राहुल गांधी ने हाल ही में पाला बदलने वाले बिट्टू पर ये तंज कसा था. इसके तुरंत बाद प्रद्युत ने बीजेपी ज्वाइन कर ली. उन्होंने आरोप लगाया कि वो महीनों से संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल से मिलने का वक्त मांग रहे थे, लेकिन उनके संदेशों का कोई जवाब नहीं मिला. एक मौजूदा सांसद का साढ़े तीन साल का कार्यकाल छोड़कर जाना कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की विफलता को दिखाता है.
भूपेन बोरा ने भी छोड़ा साथ
असम कांग्रेस के लिए सबसे शर्मनाक पल तब आया, जब प्रियंका गांधी वाड्रा की स्क्रीनिंग कमेटी की पहली बैठक के दौरान ही पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा ने पार्टी छोड़ दी. चौंकाने वाली बात ये है कि एक रात पहले ही उन्होंने प्रियंका गांधी, गौरव गोगोई और भंवर जितेंद्र सिंह के साथ डिनर किया था, लेकिन अगले ही दिन वो मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ खड़े नजर आए.
बोरा ने आरोप लगाया कि 32 साल पार्टी की सेवा करने के बावजूद उन्हें अपमानित किया गया और उनके 22 पत्रों का आलाकमान ने कोई संज्ञान नहीं लिया.
हालांकि, प्रियांक के दौरे से पहले कई लोगों को उम्मीद थी कि स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष के रूप में प्रियंका गांधी वाड्रा का असम में फैसले लेने की प्रक्रिया में एंट्री सत्ता समीकरणों को बदल सकता है और पार्टी को उतार-चढ़ाव भरे माहौल से निकलने में मदद करेगा. लेकिन उसके उलट कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ा.
क्यों हिली कांग्रेस की नीव
वहीं, गौरव गोगोई को जब असम कांग्रेस की कमान सौंपी गई थी, तब दिल्ली में उन्हें एक युवा और ऊर्जावान चेहरे के रूप में देखा जा रहा था.
कई लोगों का मानना था कि वो एक युवा, होनहार चेहरा हैं, जिसमें राज्य में पार्टी को फिर से खड़ा करने की ताकत है. इससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाता था जो हिमंता बिस्वा सरमा को टक्कर देते हैं. लेकिन उनकी नियुक्ति से कई वरिष्ठ नेता नाराज हो गए. पिता तरुण गोगोई के वक्त के पुराने नेता गौरव की कार्यशैली को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं.
ऐसी भी धारणा थी कि गौरव ऊपरी असम में वोटों को एकजुट कर सकते हैं और अहोम समुदाय के चेहरे के रूप में उभर सकते हैं, जिसकी आबादी लगभग 13 लाख से 20 लाख है और जो शिवसागर, डिब्रूगढ़, जोरहाट, गोलाघाट और लखीमपुर जैसे जिलों में केंद्रित है. बीजेपी ने इसी अंदरूनी कलह का फायदा उठाकर कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगा दी है.
सांप्रदायिक राजनीति का आरोप
प्रद्युत बोरदोलोई ने जाते-जाते स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य इमरान मसूद पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि मसूद असम में 'वंदे मातरम' न गाने वाले और सांप्रदायिक तत्वों को बढ़ावा दे रहे हैं.
इसके जवाब में इमरान मसूद ने कहा कि मैं सांप्रदायिक राजनीति नहीं करता. हमारे देश में धर्म का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता है. हम राष्ट्रगान का सम्मान करेंगे, लेकिन किसी को इसे गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. अब प्रद्युत इसे सांप्रदायिक रंग दे रहा है, क्योंकि उसकी योजना का पर्दाफाश हो गया है. वह लगभग 10 कांग्रेस उम्मीदवारों को उनके नाम घोषित होते ही अपने साथ ले जाने की तैयारी कर रहा था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. क्योंकि हमें इसकी भनक लग गई.
मन बना चुके की प्रद्युत
वहीं, स्क्रीनिंग कमेटी के एक अन्य सदस्य सांसद सप्तगिरि उलका ने कहा कि बोरदोलोई पाला बदलने की बहुत जल्दी में थे और उन्होंने कहा कि आसिफ नजर (जिस विधायक का उन्होंने विरोध किया था) ने उन्हें एक लाख से अधिक वोट दिलाए थे.
उन्होंने कहा, 'हमने अभी तक ये भी तय नहीं किया था कि लहरीघाट से कौन चुनाव लड़ेगा. प्रद्युत प्रियंका गांधी और भंवर जितेंद्र सिंह से मिल चुके थे और हम अभी भी विचार-विमर्श कर रहे थे. केंद्रीय चुनाव समिति (सीईसी) को उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर चर्चा करने के लिए बैठक करनी थी, लेकिन उम्मीदवार को अंतिम रूप दिए जाने से पहले ही वो चले गए. इसका मतलब है कि उन्होंने अपना मन बना लिया था. वो दिसपुर से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते थे, इसलिए बीजेपी सीईसी के फैसले लेने से पहले ही पार्टी में शामिल हो गए.'
हिमंत का मास्टरस्टोक
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इस पूरी उठापटक के सूत्रधार बनकर उभरे हैं. उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस में अब बहुत कम हिंदू नेता बचे हैं और आने वाले दिनों में और भी कई चेहरे बीजेपी में शामिल होंगे.
सरमा की जमीनी पकड़ इतनी मजबूत है कि वो विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं को भी नाम से जानते हैं. संसद भवन में उनकी मौजूदगी और प्रद्युत बोरदोलोई की अमित शाह से मुलाकात यह साफ करती है कि बीजेपी असम में कांग्रेस को पूरी तरह साफ करने की तैयारी में है.
इस सबके इतर असम में कांग्रेस के मामलों से परिचित एक नेता ने कहा, 'शुरू से ही हमें पता था कि कांग्रेस के जीतने की कोई उम्मीद नहीं है. हमारी स्थिति बेहद कमजोर है, यहां एकतरफा मुकाबला है. हिमंता जमीनी स्तर पर अपनी ही पार्टी के अलावा अन्य पार्टी के कार्यकर्ताओं के भी नाम से जानते हैं. दरअसल, उनमें से कई उनके नियुक्त किए हुए हैं और उनके जरिए ही वो प्रतिद्वंद्वी गुटों पर अपना नियंत्रण बनाए हुए हैं.'
मौसमी सिंह