देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी चुनाव से सिर्फ इन राज्यों नेताओं की किस्मत फैसला होने के साथ-साथ राजस्थान के चार बड़े नेताओं के भाग्य का भी निर्णय होगा. पांच में से तीन राज्यों की चुनावी कमान राजस्थान के नेताओं के हाथ में है, जहां पर हार और जीत दोनों का श्रेय उनके हिस्से में जाएगा.
राजस्थान से आने वाले बीजेपी के दिग्गज नेता और केंद्रीय मंत्री के पास पश्चिम बंगाल के चुनावी कमान है, जहां पर बीजेपी के कमल खिलाने का जिम्मा उन्हें मिला है.
वहीं, कांग्रेस के दिग्गज नेता व पार्टी के महासचिव सचिन पायलट को केरलम चुनाव का ऑब्जर्वर बनाया है तो साथ में राज्यसभा सांसद नीरज डांगी स्क्रीनिंग कमेटी के सदस्य हैं. कांग्रेस के महासचिव व पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के पास असम का प्रभार है. इस तरह राजस्थान के चार नेताओं की किस्मत का फैसला पांच राज्यों के चुनावी नतीजे से तय होगा?
भूपेंद्र यादव क्या बंगाल खिला पाएंगे कमल
राजस्थान से आने वाले भूपेंद्र यादव को भाजपा का संकट मोचक कहा जाता है. महाराष्ट्र से उत्तर प्रदेश और गुजरात तक भाजपा को जिताने में अहम रोल अदा कर चुके हैं और अब उनके कंधे पर पश्चिम बंगाल चुनाव की कमान है. बीजेपी ने उन्हें बंगाल चुनाव का प्रभारी नियुक्त कर रखा है.
हालांकि, पश्चिम बंगाल देश के उन चुनिंदा राज्यों में से एक है, जहां पर बीजेपी अभी सत्ता में नहीं आ सकी है. भूपेंद्र यादव के जीत के सियासी ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए बंगाल जैसे चुनौती भरे राज्य की ज़िम्मेदारी दे रखी है. ममता बनर्जी पिछले 15 सालों से सूबे की सत्ता में है और बंगाल के समीकरण भी बीजेपी के अनुकूल नहीं है. इस तरह भूपेंद्र यादव को बहुत मुश्किल टॉस्क मिला हुआ.
बीजेपी के लिए विपक्षी दलों में सबसे बड़ी चुनौती ममता हैं. ममता बनर्जी देश की सबसे ताक़तवर नेताओं में से एक हैं. भाजपा के पास न बंगाली अस्मिता का तोड़ है और न ही ममता बनर्जी के क़द का कोई चेहरा, जिसे आगे कर चुनौती दे सके. इतना ही नहीं, 30 फ़ीसदी मुस्लिम वोटरों का एकमुश्त समर्थन ममता बनर्जी के साथ है. इसीलिए 2021 विधानसभा चुनाव में तमाम प्रयासों के बावजूद भाजपा सत्ता हासिल नहीं कर सकी और पार्टी 77 सीट पर सिमट गई थी.
अब देखना है कि इस बार भूपेंद्र यादव क्या करिश्मा दिखाते हैं, क्योंकि पश्चिम बंगाल में इस बार पार्टी को बड़ी उम्मीद है. भूपेंद्र यादव के नेतृत्व में पार्टी ने नेताओं एवं पदाधिकारियों की लंबी-चौड़ी फौज वहां उतार दी है, वहां भाजपा की सीधी लड़ाई टीएमसी से ही है. अब देखा है कि बंगाल में कैसे बीजेपी को जिताते हैं.
केरल में कांग्रेस सत्ता में ला पाएंगे पायलट और डांगी
केरलम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सचिन पायलट को सीनियर ऑर्ब्जवर बना रखा है, जिसके चलते पूरे चुनाव की कमान संभाल रहे हैं. यहां से पहले राहुल गांधी और अब कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी लोकसभा सांसद हैं. पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल भी केरल से आते हैं. ऑर्ब्जवर होने के नाते सचिन पायलट के ऊपर टिकट वितरण की जिम्मेदारी रही है तो डांगी स्क्रीनिंग कमेटी होने के नाते उनकी भूमिका रही है.
केरलम की चुनावी लड़ाई कांग्रेस के अगुवाई वाले यूडीएफ और लेफ्ट के नेतृत्व वाले एलडीएफ गठबंधन के बीच है. बीजेपी नेतृ्त्व वाले एनडीए का बहुत ज्यादा प्रभाव केरलम में नहीं है, जिसके चलते सीधी लड़ाई यूडीएफ बनाम एलडीएफ की है. 10 साल से सत्ता में यूडीएफ है और उसके खिलाफ इस बार सत्ता विरोधी लहर भी कही जा रही है.
कांग्रेस को केरलम से बहुत ज्यादा उम्मीदें लगा रखी है, जिसके चलते ही राहुल गांधी ने पूरी ताकत झोंक रखी है. ऐसे में कांग्रेस केरल की सता में लौटती है तो फिर सचिन पायलट का सियासी कद बढ़ सकता है, जिसका लाभ उनको राजस्थान में मिलेगा. ऐसे ही नीरज डांगी की साख भी दांव पर लगी है.
असम में क्या बीजेपी को रोक पाएंगे जितेंद्र सिंह
असम में कांग्रेस की कमान जितेंद्र सिंह के कंधों पर है, वो राज्य के प्रभारी हैं. दस साल से बीजेपी सत्ता में है और चुनाव ऐलान के साथ ही कांग्रेस को एक के बाद एक झटके लगे हैं. ऐसे में कांग्रेस के लिए सत्ता के सूखा खत्म करने की जिम्मा जितेंद्र सिंह पर है, क्यों बीजेपी को चुनावी मात देने में सफल हो पाएंगे.
हिमंत बिस्वा सरमा के चेहरे के सहारे बीजेपी लगातार तीसरी बार असम में सत्ता की कोशिशों में है. हिमंता खुलकर हिंदुत्व का दांव खेल रहे और हर वो दांव चल रहे हैं, जिससे धार्मिक धुर्वीकरण हो सके. असम में कांग्रेस और बीजेपी का सीधा मुकाबाला है. जितेंद्र सिंह के साथ प्रियंका गांधी और भूपेश बघेल भी असम के रणभूमि में कांग्रेस को जिताने में लगे हैं. ऐसे में असम में कांग्रेस को सत्ता में लाने में सफल नहीं होते हैं तो जितेंद्र सिंह पर सवाल खड़े होंगे?
कुबूल अहमद