कभी आपने ध्यान दिया है कि जब भी आप फेसबुक पर कोई फोटो अपलोड करते हैं, वो आपके या आपके परिचित के फेस को टैग करने का सजेशन देता है. ये कोई जादू या कमाल नहीं है, बल्कि असल मायने में ये ही फेस रिकग्निशन तकनीक का उदाहरण है. पूरी दुनिया में आजकल किसी अपराधी या खोए हुए लोगों की पहचान के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में नकाबपोश हमलावरों को पहचानने के लिए भी इस तकनीक के इस्तेमाल की बात हो रही है, आइए जानें- क्या है ये तकनीक और कैसे होता है इसका इस्तेमाल.
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कुदरत ने हर इंसान को विशिष्ट बनाया है. हर इंसानी चेहरा एक दूसरे से मिलता-जुलता होने के बावजूद एक दूसरे से एकदम भिन्न है. विज्ञान ने इसी विशिष्टता के आधार पर ऐसी तकनीक विकसित की है.
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ये वो तकनीक है जिसमें आपकी आंखें, फेस और पूरे चेहरे की एक गणितीय गणना के आधार पर सॉफ्टवेयर आपकी पहचान दर्ज कर लेता है. इस पहचान का एक पूरा डेटाबेस तैयार होता है. इसके जरिये आपको ग्रुप में भी सॉफ्टवेयर की मदद से पहचाना जा सकता है.
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आपको शायद पता भी नहीं चला होगा कि बीते पांच सालों में फेसबुक, गूगल सहित अन्य वेबसाइट के रिसचर्स ने ऐसी तकनीकें विकसित कर ली हैं जो ऑटोमेटिक तरीके से चेहरों को पहचान लेती हैं.
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क्या नकाबपोश को पहचाना जा सकता है
अगर जेएनयू की घटना की बात करें तो यहां कुछ नकाबपोश लोगों ने तोड़फोड़ और मारपीट की. लेफ्ट और राइट के छात्र संगठन एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर रहे हैं. लेकिन ये सच है कि इस तकनीक के इस्तेमाल से उन्हें भी पहचाना जा सकता है.
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नकाबपोश को लेकर 2017 में एक रीसर्च हुई थी. यहां कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के अमरजोत सिंह और उनके साथियों ने एक एल्गोरिदम बनाया था. ये एल्गोरिदम 14 अहम फेशियल फीचर्स का इस्तेमाल करके तैयार किया गया था. ये लगभग वही फीचर्स हैं जिनपर हमारा दिमाग सबसे ज़्यादा ध्यान देता है.
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इस रिसर्च में 25 लोगों की 200 तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया था. तस्वीरों के लोग टोपी, चश्में और स्कार्फ पहने हुए थे. आधा चेहरा ढंके होने के बावजूद एल्गोरिदम ने कुछ फीचर्स पहचान लिए. इस रिसर्च के नतीजे कहते हैं कि नकाबपोश को भी पहचानना मुश्किल नहीं है.
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इस एल्गोरिदम ने वो चेहरे पहचाने जो सिर्फ स्कार्फ से ढके थे, वो 77 प्रतिशत एक्यूरेसी से पहचाने गए. वहीं, स्कार्फ और टोपी पहने लोगों को 69 प्रतिशत एक्यूरेसी से पहचाना गया. जो टोपी, स्कार्फ और चश्मा तीनों पहने थे, उन्हें 55 प्रतिशत एक्यूरेसी से पहचाना गया.
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अगर पुलिस इस तकनीक का इस्तेमाल करती है तो उसमें सॉफ्टवेयर काफी महत्व रखता है. जिस सॉफ्टवेयर के पास जितना ज़्यादा डेटा होगा, वो उतना सटीक रिज़ल्ट देगा. साथ में एक्यूरेसी भी पता चलेगी यानी पहचाना गया चेहरा उस इंसान का है या किसी और का.
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हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस ने त्रिनेत्र ऐप लिया है. इसमें तकरीबन 5 लाख अपराधियों का डेटाबेस है. इससे फेस रिकग्निशन और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसे फीचर्स के ज़रिए आरोपियों की पहचान की जाएगी. फिलहाल ये ऐप सिर्फ सीनियर पुलिस अफसरों के पास है.
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