'बॉस' बनेंगे पर अपनी शर्तों पर...कॉर्पोरेट की पुरानी लीडरशिप बदल रहा है जेन-जी, डेलॉयट सर्वे में बड़ा खुलासा

डेलॉयट सर्वे में 44 देशों के 22,500 से अधिक युवाओं ने बताया कि वे सीनियर लीडरशिप रोल्स में रुचि रखते हैं, लेकिन तनाव और बर्नआउट से बचना चाहते हैं. आर्थिक असुरक्षा, बढ़ती महंगाई और करियर में स्थिरता उनकी प्रमुख चिंताएं हैं. AI को वे एक सहायक उपकरण मानते हैं, लेकिन कंपनियों की तकनीकी तैयारी पर सवाल उठाते हैं.

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डेलॉयट सर्वे ने खोली पोल, अपनी शर्तों पर लीडर बनने को तैयार है देश का युवा डेलॉयट सर्वे ने खोली पोल, अपनी शर्तों पर लीडर बनने को तैयार है देश का युवा

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 26 मई 2026,
  • अपडेटेड 10:49 AM IST

कॉर्पोरेट की बंद कमरों वाली बैठकों और बोर्डरूम में तय होने वाले पुराने नियम अब काम नहीं आ रहे हैं. देश और दुनिया का युवा अब सफलता, लीडरशिप और वर्क-कल्चर की सदियों पुरानी परिभाषाओं को सिरे से चुनौती दे रहा है. डेलॉयट के हालिया वैश्विक सर्वे ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि देश-दुनिया का युवा वर्कप्लेस की पुरानी प्रणाली से बुरी तरह ऊब चुका है. 44 देशों के करीब 22,500 से अधिक जेन-जी (Gen Z) और मिलेनियल्स पर किए गए इस सर्वे के आंकड़े एचआर (HR) लीडर्स की नींद उड़ाने वाले हैं.

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शर्तों पर होगी लीडरशिप

अक्सर सोशल मीडिया पर एक नैरेटिव चलाया जाता है कि आज के युवाओं में महत्वाकांक्षा नहीं है और वे बड़ी ज़िम्मेदारियों या लीडरशिप रोल से भाग रहे हैं. लेकिन, सर्वे ने इस कॉर्पोरेट नैरेटिव की हवा निकाल दी है. आंकड़ों के अनुसार, करीब 76% जेन-जी और 67% मिलेनियल्स अपने पूरे करियर के दौरान सीनियर या एग्जीक्यूटिव लीडरशिप पोजीशन हासिल करने में गहरी दिलचस्पी रखते हैं. लेकिन पेंच यहां यह है कि वे केवल 6% युवा ऐसे हैं जो इस अंधी दौड़ को अपना पहला और इकलौता लक्ष्य मानते हैं. 

युवाओं का साफ कहना है कि वे लीडर बनने के लिए तैयार हैं, लेकिन वे पुरानी घिसी-पिटी लीडरशिप की उस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेंगे जो तनाव और बर्नआउट (मानसिक थकावट) की कीमत पर मिलती है.

तनाव और बर्नआउट की बलि चढ़ने से इंकार

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सर्वे में जब उन युवाओं से बात की गई जो फिलहाल लीडरशिप रोल को तवज्जो नहीं दे रहे हैं, तो उन्होंने बेहद चौंकाने वाले कारण गिनाए. करीब 50% जेन-जी और 49% मिलेनियल्स का मानना है कि आज के दौर में लीडर बनने का मतलब है अंधाधुंध तनाव और बर्नआउट का शिकार होना. वहीं 50% युवाओं ने 'अत्यधिक जिम्मेदारी' और 41-46% ने 'वर्क-लाइफ बैलेंस' बिगड़ने को सबसे बड़ा रोड़ा बताया. 

साफ है कि युवा अब ऐसा कोई भी पद स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं जो उनके मेंटल हेल्थ को नुकसान न पहुंचाए. वे केवल भारी-भरकम सैलरी पैकेज से नहीं पिघलने वाले, उन्हें लीडरशिप रोल में आने के लिए काम करने की आज़ादी (फ्लेक्सिबिलिटी), एक सुरक्षित माहौल और करियर ग्रोथ का एक पारदर्शी रास्ता चाहिए.

पैसों की तंगी और डिलेड डिसीजंस

इस सर्वे का एक और बेहद गंभीर पहलू युवाओं की आर्थिक असुरक्षा है, जिसे 'मेबी लेटर' रियलिटी कहा गया है. लगातार पांचवें साल 'कॉस्ट ऑफ लिविंग' (बढ़ती महंगाई और जीने की लागत) इन दोनों पीढ़ियों की सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरी है.  हालत यह है कि करीब आधे युवा आज भी 'पे-चेक टू पे-चेक' (महीने की पूरी सैलरी ख़त्म होने के ढर्रे पर) जी रहे हैं. 

इस आर्थिक दबाव का परिणाम यह हो रहा है कि 55% जेन-जी और 52% मिलेनियल्स अपनी शादी, परिवार बढ़ाने या नया बिजनेस शुरू करने जैसे बड़े जीवन-निर्णयों को टाल रहे हैं.  करीब 51% जेन-जी का मानना है कि वे चाहकर भी कभी अपना घर नहीं खरीद पाएंगे. ऐसे में उनके लिए करियर में स्थिरता और मानसिक सुकून पहली प्राथमिकता बन गए हैं.  

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AI को माना दोस्त, पर कंपनियां अब भी पीछे

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर जहां पुरानी पीढ़ी डरी हुई है, वहीं जेन-जी इसे एक खतरे के बजाय तरक्की की रफ्तार बढ़ाने वाला मान रहा है. करीब 74% युवा अपनी रोजमर्रा के काम में किसी न किसी रूप में एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं. मजेदार बात यह है कि युवा न सिर्फ अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए, बल्कि करियर की सलाह लेने और काम के तनाव से निपटने के लिए भी एआई टूल्स की मदद ले रहे हैं. हालांकि, 30% युवाओं को लगता है कि उनकी कंपनियां तकनीकी बदलावों के हिसाब से अब भी बहुत पीछे चल रही हैं और उनके पास सही ट्रेनिंग सिस्टम नहीं है.

अब बदलना होगा पुराना मॉडल

डेलॉयट की चीफ पीपल एंड पर्पस ऑफिसर एलिजाबेथ फेबर का कहना है कि यह सर्वे युवाओं के पीछे हटने की कहानी नहीं, बल्कि उनके समझदार होने की कहानी बयां करता है. युवा अपनी शर्तों पर आगे बढ़ रहे हैं. अगर कॉरपोरेट जगत को इस बेहतरीन टैलेंट को अपने साथ बनाए रखना है, तो एचआर लीडर्स को 'परफॉर्मेटिव' (दिखावे वाली) लीडरशिप के ढर्रे को डंप करना होगा. उन्हें एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना होगा जहां काम के घंटे गिनने के बजाय 'काम के मायने' और कर्मचारी की सेहत को तवज्जो दी जाए. 

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