सैलरी नहीं 'शांति' चाहिए... डेटा साइंट‍िस्ट ने बेंगलुरु के ल‍िए ठुकरा द‍ि‍या गुरुग्राम में 32 लाख का जॉब ऑफर

स्नेहा ने अपने एक इंस्टाग्राम पोस्ट में इस बात का खुलासा किया है कि आखिर क्यों उन्होंने गुड़गांव शिफ्ट होने के बजाय बेंगलुरु में ही रुकने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि बेंगलुरु शहर का अपनापन, वहां मिलने वाला सुरक्षा का अहसास और 'घर जैसी फीलिंग' इस आकर्षक नौकरी के मौके से कहीं ज्यादा बढ़कर थी.

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बेंगलुरु में रहने के लिए IITian ने ठुकराई गुड़गांव की 32 लाख की नौकरी, वजह जीत लेगी दिल (Image: Instagram/@snehapriya9955) बेंगलुरु में रहने के लिए IITian ने ठुकराई गुड़गांव की 32 लाख की नौकरी, वजह जीत लेगी दिल (Image: Instagram/@snehapriya9955)

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 03 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 12:54 PM IST

सालाना 32 लाख रुपये का जॉब ऑफर ठुकरा देना... एक ऐसा फैसला है जिसे लेने से पहले कोई भी सौ बार सोचेगा. लेकिन आईआईटी रुड़की की ग्रेजुएट और डेटा साइंटिस्ट स्नेहा प्रिया के लिए एक भारी-भरकम पे-चेक से कहीं ज्यादा मायने उनकी मानसिक शांति रखती थी.

स्नेहा ने अपने एक इंस्टाग्राम पोस्ट में इस बात का खुलासा किया है कि आखिर क्यों उन्होंने गुड़गांव शिफ्ट होने के बजाय बेंगलुरु में ही रुकने का फैसला किया. उन्होंने बताया कि बेंगलुरु शहर का अपनापन, वहां मिलने वाला सुरक्षा का अहसास और 'घर जैसी फीलिंग' इस आकर्षक नौकरी के मौके से कहीं ज्यादा बढ़कर थी.

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स्नेहा ने बेंगलुरु के आसमान में दिखे दोहरे इंद्रधनुष के वीडियो के साथ लिखा कि आज के दिन मुझे गुड़गांव में होना चाहिए था, जहां बेंगलुरु को पीछे छोड़कर मुझे अपनी जिंदगी का एक नया चैप्टर शुरू करना था. लेकिन मैंने यहीं रुकने का फैसला किया. और बेंगलुरु ने भी दोहरे इंद्रधनुष के साथ मेरे सारे संशयों को अलविदा कह दिया. उन्होंने अपनी बात को एक ऐसी लाइन के साथ खत्म किया जिसने सोशल मीडिया पर लाखों लोगों का दिल छू लिया, उन्होंने ल‍िखा, 'कभी-कभी करियर का सबसे बेहतरीन फैसला वो नहीं होता जो आपको सबसे ऊंचा ऑफर देता है... बल्कि वो होता है जो आपको सुकून देता है!' 

स्नेहा ने साफ किया कि उनके इस फैसले में सुरक्षा से जुड़े सरोकारों  ने एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई. उनके मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) के उनके पिछले कुछ दौरों के अनुभव काफी अप्रिय रहे थे. यही वजह थी कि इतना शानदार सैलरी पैकेज मिलने के बावजूद वे वहां री-लोकेट (Relocate) होने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं. उन्होंने आईआईटी रुड़की में पढ़ाई के दौरान दिल्ली की अपनी कई यात्राओं और वहां के माहौल की तुलना बेंगलुरु के लोगों से मिलने वाले अपनेपन और शालीनता से की.

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सोशल मीडिया पर छिड़ी नई बहस
स्नेहा की इस पोस्ट ने इंटरनेट पर इस बात को लेकर दोबारा बहस छेड़ दी है कि आखिर एक अच्छे और सफल करियर की परिभाषा क्या है? अमूमन नौकरियों के फैसले मोटी सैलरी को देखकर ही लिए जाते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने स्नेहा की बात से सहमति जताई. लोगों का मानना है कि पर्सनल सेफ्टी, मेंटल वेल-बीइंग (मानसिक स्वास्थ्य) और लाइफ की ओवरऑल क्वालिटी कई बार आर्थिक फायदों से कहीं ज्यादा भारी पड़ती है.

स्नेहा प्रिया की यह कहानी आज के युवा प्रोफेशनल्स की बदलती प्राथमिकताओं को दिखाती है. उनके लिए, एक बड़े पैकेज के मुकाबले मानसिक शांति को चुनना कोई समझौता नहीं था, बल्कि एक बिल्कुल सही फैसला था. उनकी यह वायरल पोस्ट याद दिलाती है कि सबसे बेस्ट करियर चॉइस हमेशा वो नहीं होती जो सबसे ज्यादा सैलरी दे, बल्कि वो होती है जो आपको वैसी जिंदगी दे जैसी आप जीना चाहते हैं.

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