क्या भारत में सिर्फ एक कॉलेज डिग्री के भरोसे करियर बनाना अब नामुमकिन होता जा रहा है? क्या भारत के कॉलेज युवाओं को भविष्य के लिए तैयार करने के बजाय सिर्फ 'रट्टा मारने' की मशीन बन चुके हैं? ये सवाल हम नहीं, बल्कि देश के बड़े वित्तीय विश्लेषकों और सरकार के शीर्ष आर्थिक सलाहकारों की तरफ से उठाए जा रहे हैं.
मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के फाउंडर और सीआईओ (CIO) सौरभ मुखर्जी ने एक पॉडकास्ट में बेहद कड़ा बयान देते हुए कहा है कि भारत में कक्षा 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देने वाले छात्र, ग्रेजुएशन करने वाले छात्रों की तुलना में वित्तीय रूप से बेहतर स्थिति में हैं. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि भारत में आपके लिए यूनिवर्सिटी न जाना ही बेहतर है. आइए इस तीखी बहस को कड़े आंकड़ों और दुनिया के सबसे बड़े एक्सपर्ट्स की राय के साथ डिकोड करते हैं.
आंकड़े नहीं झूठ बोलते: 100 में से सिर्फ 3 ग्रेजुएट्स को नौकरी?
सौरभ मुखर्जी ने अपनी बात को किसी हवा-हवाई दावे के बजाय सीधे सरकारी और बाजार के आंकड़ों से साबित किया. आंकड़ों के अनुसार भारत में कॉलेज से निकलने वाले हर 100 ग्रेजुएट्स में से केवल 3 छात्रों को ही उनके ग्रेजुएशन के साल में नौकरी मिल पा रही है.
वहीं कॉलेज पास करने वाले युवाओं में बेरोजगारी की दर 30 से 40 प्रतिशत के बीच मंडरा रही है. इसके विपरीत, जो बच्चे कभी स्कूल या कॉलेज नहीं गए, उनमें बेरोजगारी दर महज 3% के आसपास है. आज मुंबई जैसे शहर में एक एयर-कंडीशन केबिन वाली डेस्क जॉब ढूंढने वाला ग्रेजुएट, कंस्ट्रक्शन साइट पर शारीरिक श्रम करने वाले मजदूर से आधा कमा रहा है. एक अनुभवी JCB ऑपरेटर आज के आम ग्रेजुएट या इंजीनियर से दोगुना कमा लेता है.
'रट्टा मारो' बनाम न्यू-एज टेक्नोलॉजी
सौरभ मुखर्जी के मुताबिक, भारतीय शिक्षा व्यवस्था आज भी क्रिटिकल थिंकिंग पर नहीं, बल्कि सिर्फ याद करने पर चलती है. स्कूल से लेकर कॉलेज तक का पूरा ढांचा 'रट्टा मारो और एग्जाम में उगल दो' की नीति पर टिका है. नतीजा यह है कि आज जब पूरी दुनिया AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस), इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), बायोटेक, क्लीन टेक और एडवांस्ड साइंस की तरफ बढ़ रही है, भारत के ग्रेजुएट्स इन सेक्टर्स के लिए पूरी तरह अनफिट हैं.
मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) ने भी चेताया, 'ट्रेड स्किल्स' को इज्जत दो
सौरभ मुखर्जी अकेले नहीं हैं. भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने भी ठीक ऐसा ही रुख अपनाया है. उन्होंने भारतीय युवाओं को एक तयशुदा लीक (स्कूल, कॉलेज, फिर UPSC या सरकारी नौकरी की अंधी दौड़) से बाहर निकलने की सलाह दी है.
नागेश्वरन के मुताबिक, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे विकसित देशों में वेल्डिंग, प्लंबिंग, कारपेंट्री और इलेक्ट्रिकल रिपेयर जैसे 'ट्रेड स्किल्स' को बेहद सम्मानित और उच्च वेतन वाला पेशा माना जाता है, जबकि भारत में इसे हिकारत की नजर से देखा जाता है.
अब वो दौर बीत चुका है जब एक कंप्यूटर साइंस की डिग्री या MBA आपको दूसरों पर बढ़त दिला देता था. अब जमाना उन 'ह्यूमन स्किल्स' (जैसे केयरगिविंग, काउंसलिंग, हॉस्पिटैलिटी) का है, जिन्हें मशीनें या AI आसानी से रिप्लेस नहीं कर सकते.
एलन मस्क और संजीव सान्याल भी उठा चुके हैं सवाल
यह बहस आज की नहीं है. दुनिया के सबसे अमीर शख्स और टेक लीडर एलन मस्क सालों से कह रहे हैं कि उन्हें अपनी कंपनियों (Tesla, SpaceX) में काम देने के लिए किसी कॉलेज डिग्री की जरूरत नहीं है. मस्क के मुताबिक कॉलेज सिर्फ मजे करने और यह साबित करने के लिए है कि आप अपने काम समय पर पूरे कर सकते हैं, सीखने के लिए डिग्री की मजबूरी नहीं, स्किल जरूरी है.
वहीं, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य संजीव सान्याल ने भी हाल ही में भारतीय युवाओं द्वारा जीवन के कीमती 5-7 साल सिर्फ UPSC की कोचिंग और परीक्षाओं की तैयारी में झोंक देने पर गहरी चिंता जताई थी. उन्होंने कहा था कि युवाओं को इस 'परीक्षा केंद्रित' मानसिकता से बाहर निकलकर आंत्रप्रेन्योरशिप और ग्राउंड-लेवल स्किल्स पर ध्यान देना चाहिए.
आजतक एजुकेशन डेस्क