इससे अच्छा होता कि कॉपियां मैनूअल तरीके से ही चेक होती... CBSE 12वीं बोर्ड परीक्षा में शामिल हुए लाखों छात्रों के बीच दुविधा की स्थिति नजर आ रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि एक ओर जहां आगे की पढ़ाई के लिए एडमिशन की चिंता तूल पकड़ रही है. वहीं, दूसरी ओर बोर्ड की ओर से नंबरों, पोर्टल क्रैश और OSM को लेकर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. 13 मई यानी जिस दिन से रिजल्ट जारी हुआ है तब से छात्रों और उनके अभिभावकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. इस लेकर बोर्ड भी विवादों में है. छात्रों को ऑनलाइन स्क्रीन मार्किंग (OSM) में गड़बड़ी और उम्मीद से बेहद कम अंक मिलने जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ा.
रही-सही कसर उत्तर पुस्तिकाओं में लापरवाही, बार-बार क्रैश होते पोर्टल और री-इवैल्युएशन के लिए स्कैन की गई कॉपियों के मिलने में हो रही देरी ने पूरी कर दी है. चेकिंग में हुई इन गड़बड़ियों के बीच अब छात्रों के कॉलेज एडमिशन और उनके भविष्य पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा हो गया है लेकिन कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा है. ऐसे में अब मांग उठने लगी है कि कॉलेजों में उनके एडमिशन के लिए सीबीएसई को उन्हें कुछ रियायती अंक यानी ग्रेस मार्क्स देने चाहिए.
लग रहा सब कुछ बिखर रहा...
छात्रों और अभिभावकों के लिए ऐसा लग रहा है कि मानो उनका हर कुछ एक साथ बिखर रहा है. एक तरफ विश्वविद्यालयों में एडमिशन की अंतिम तारीखें तेजी से नजदीक आ रही हैं और दूसरी तरफ हजारों छात्र दिन-रात पोर्टल को बार-बार रिफ्रेश करने, अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की कॉपियां मांगने और सिस्टम से यह सवाल करने में लगे हैं. इसे लेकर छात्र कह रहे हैं कि इस पूरे मामले में सबसे दुखद बात यह है कि उन्हें उस गलती की भारी भावनात्मक कीमत चुकानी पड़ रही है, जो उन्होंने कभी की ही नहीं.
हर बीतते दिन के साथ इन बच्चों की निराशा बढ़ती जा रही है क्योंकि वे मानसिक रूप से पूरी तरह थक चुके हैं. इस समय सोशल मीडिया पर गूंज रहे छात्रों के सवालों का जवाब उन्हें मिल नहीं रहा है. आखिर सिस्टम की इस नाकामी के कारण छात्रों को और कितना तनाव सहना पड़ेगा? अब जब बोर्ड पर से भरोसा लगातार कम हो रहा है और दबाव बढ़ता जा रहा है. इस बीच उम्मीद की किरण बनकर जो जवाब सामने आ रहा है- वह है रियायती अंक (ग्रेस मार्क्स). ऐसा इसलिए है क्योंकि जब पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया पर ही भरोसा डगमगाने लगे, तो छात्रों के भविष्य को बचाने के लिए ऐसे असाधारण और बड़े उपायों पर विचार करना जरूरी हो जाता है.
क्यों हो रही है ग्रेस मार्क्स पर चर्चा?
ग्रेस मार्क्स की मांग अब केवल सोशल मीडिया अभियानों तक ही सीमित नहीं है बल्कि छात्रों के बीच ये चर्चा तेजी से आगे बढ़ रही है कि बोर्ड उन्हें 10 से 15 नंबर की छूट देने पर विचार कर सकता है जिन्हें 75 प्रतिशत से कम नंबर मिले हैं. इसके पीछे का तर्क बेहद सिंपल है. कई छात्रों की कड़ी मेहनत और दिन-रात की तैयारी केवल कुछ नंबरों के फैसले से अपने सपनों के विश्वविद्यालयों में एडमिशन लेने से चूक रहे हैं. जो छात्र कट-ऑफ लिस्ट के बिल्कुल करीब खड़े हैं, उनके लिए 5 से 10 नंबर का यह मामूली सा अंतर भी जिंदगी का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया है.
क्या था OSM का उद्देश्य?
CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम का उद्देश्य मूल्यांकन प्रोसेस को आधुनिक बनाना था. लेकिन छात्रों का कहना है कि इससे भ्रम और अनिश्चितता का माहौल पैदा हो गया है. धुंधली स्कैन की गई कॉपियों, उत्तर पुस्तिकाओं पहुंचने में देरी, पोर्टल क्रैश होने और उत्तर पुस्तिकाओं को संभालने में आ रही दिक्कतों को लेकर शिकायतें आने लगीं. उत्तर पुस्तिकाओं में मिली गलतियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद विवाद और बढ़ गया. ये विवाद अभी खत्म हुआ नहीं था कि एक छात्र को किसी और की कॉपी मिलने से ये मामला और गंभीर हो गया. इसके साथ ही डिजिटल मूल्यांकन में खामियों और कथित पहुंच संबंधी खामियों को लेकर चिंताओं ने आशंकाओं को और बढ़ा दिया, हालांकि सीबीएसई ने सुरक्षा उल्लंघन के दावों को खारिज कर दिया और साफ किया कि पोर्टल में केवल परीक्षा डेटा था और यह वास्तविक मूल्यांकन मंच नहीं था.
15 दिन से चल रहे इस पूरे मामले के बीच मॉडर्न पब्लिक स्कूल, शालीमार बाग की प्रिंसिपल डॉ. अलका कपूर कहती हैं कि ऑन-स्क्रीन मार्किंग के इस मुद्दे पर छात्रों और अभिभावकों की ओर से उठाई जा रही चिंताओं को सहानुभूति और पूरी पारदर्शिता के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए. सीबीएसई के लिए इस समय सबसे सही कदम यही होगा कि वह स्थिति की जिम्मेदारी ले और छात्रों के साथ खुलकर बातचीत करें. उन्होंने आगे कहा कि इतने बड़े पैमाने पर होने वाली परीक्षाओं में तकनीकी चुनौतियां आना स्वाभाविक है लेकिन इस नाजुक मोड़ पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शैक्षणिक संस्थान छात्रों के हितों की रक्षा करने और उनका विश्वास बनाए रखने के लिए कितनी तेजी से काम करते हैं.
इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यह पूरा विवाद हमें याद दिलाता है कि परीक्षाओं के इस पूरे तामझाम में छात्रों की मानसिक स्थिति, उनकी भलाई और एक निष्पक्ष मूल्यांकन प्रणाली को प्राथमिकता देना कितना जरूरी है. परीक्षा से जुड़े हर व्यक्ति और छात्र को इस पूरी प्रक्रिया में स्पष्टता का पूरा अधिकार है और इस संवेदनशील मुद्दे का समाधान केवल पारदर्शिता,सहानुभूति और आपस में बातचीत के जरिए ही निकाला जा सकता है.
आजतक एजुकेशन डेस्क