भारत की समुद्री परमाणु क्षमता को लेकर एक दुर्लभ तस्वीर सामने आई है. इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज (IISS) ने सैटेलाइट इमेजरी जारी की है, जिसमें भारतीय नौसेना की सभी चार अरिहंत क्लास न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां (SSBN) एक साथ विशाखापट्टनम बंदरगाह पर नजर आ रही हैं. यह तस्वीर भारत के बढ़ते समुद्री न्यूक्लियर डिटरेंस को स्पष्ट दिखाती है।
इन तस्वीरों में INS अरिहंत (S2), INS अरिघात (S3), INS अरिदमन (S4) और चौथी पनडुब्बी S4* (जिसका नाम INS अरिसूदन होने वाला है) एक साथ डॉक की गई दिख रही हैं. ये सभी 6000 से 7000 टन वजनी पनडुब्बियां K-15 सागरिका और K-4 बैलिस्टिक मिसाइलें ले जाने में सक्षम हैं.
यह पहली बार है जब सभी चारों SSBN एक साथ पियरसाइड (बंदरगाह पर खड़ी) दिखाई दी हैं. हालांकि इससे यह भी संकेत मिलता है कि अभी भारत निरंतर समुद्री गश्त (Continuous At-Sea Deterrent) के पूर्ण चक्र को लागू नहीं कर पाया है, लेकिन बेड़े का विस्तार तेजी से हो रहा है.
दूसरी बार हमला करने की क्षमता
SSBN पनडुब्बियां भारत की न्यूक्लियर ट्रायड का सबसे महत्वपूर्ण और सुरक्षित हिस्सा मानी जाती हैं. ये पनडुब्बियां दुश्मन के लिए ढूंढना बेहद मुश्किल होती हैं. इनमें लगी बैलिस्टिक मिसाइलें हजारों किलोमीटर दूर तक दुश्मन को निशाना बना सकती हैं.
INS अरिहंत 2018 में अपनी पहली गश्त पूरी कर चुका है. अब जैसे-जैसे नई पनडुब्बियां सेवा में आ रही हैं, भारत की दूसरी बार हमला करने (Second Strike) की विश्वसनीयता बढ़ रही है. जब चारों पनडुब्बियां पूरी तरह ऑपरेशनल हो जाएंगी, तो कम से कम एक पनडुब्बी हमेशा समुद्र में गश्त पर रहेगी.
मिसाइल और डिजाइन में अंतर
पहली दो पनडुब्बियों (अरिहंत और अरिघात) में 4 लॉन्च ट्यूब हैं, जबकि अरिदमन और S4* में 8 लॉन्च ट्यूब हैं. इनमें K-4 मिसाइल (3500 किमी रेंज) का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो पहले की K-15 (700 किमी) से कहीं बेहतर है. इससे पनडुब्बियां समुद्र के किसी भी हिस्से से दुश्मन को लक्ष्य कर सकती हैं.
नया अड्डा INS वर्षा
विशाखापट्टनम का मुख्य बंदरगाह अब बहुत व्यस्त हो गया है. सुरक्षा और गोपनीयता बढ़ाने के लिए भारत 50 किमी दक्षिण में INS वर्षा नामक नया अत्याधुनिक अंडरग्राउंड पनडुब्बी बेस बना रहा है. सैटेलाइट इमेजरी में यहां दो बड़ी सुरंगें दिख रही हैं, जो पानी के अंदर जाती हैं. यह सुविधा पनडुब्बियों को दुश्मन की नजर और हमले से बचाने में मदद करेगी.
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अभी पूर्ण CASD क्षमता हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. चारों पनडुब्बियों का एक साथ बंदरगाह पर होना रखरखाव, प्रशिक्षण और मिसाइल गतिविधियों को दर्शाता है. आने वाले समय में गश्तों की संख्या बढ़ेगीॉ.
भारत का SSBN कार्यक्रम 1970 के दशक से चल रहा है. 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद इसे तेजी दी गई. अब S5 क्लास की अगली पीढ़ी की पनडुब्बियां भी बन रही हैं. 2047 तक नौसेना का लक्ष्य पूरी तरह स्वदेशी और मजबूत समुद्री डिटरेंस बनाना है.
ऋचीक मिश्रा