पेपर लीक के आरोपी गिरफ्तार तो होते हैं, लेकिन सजा क्यों नहीं मिलती? NEET से लेकर UPTET तक सिस्टम पर सवाल

देश में NEET, UPTET, REET और अन्य भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक मामलों में सैकड़ों गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन दोषसिद्धि बेहद कम रही. क्यों भारत में परीक्षा माफिया कानून और जांच एजेंसियों के बावजूद सजा से बच जाते हैं. जानिए पूरी कहानी.

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पेपर लीक की वजह से लाखों बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाता है (फोटो-ITG) पेपर लीक की वजह से लाखों बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाता है (फोटो-ITG)

मुनीष पांडे

  • नई दिल्ली,
  • 06 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:16 AM IST

देश में NEET-UG 2024 पेपर लीक विवाद के बाद करोड़ों छात्रों और अभिभावकों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ है कि क्या छात्रों को कभी न्याय मिलेगा और क्या भविष्य में ऐसी घटनाएं रुक पाएंगी? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में पेपर लीक मामलों का रिकॉर्ड बेहद निराशाजनक रहा है. पिछले 23 वर्षों में सामने आए 50 से अधिक बड़े पेपर लीक मामलों में केवल दो मामलों में ही आरोपियों को सजा मिल सकी. अधिकांश मामलों में आरोपी गिरफ्तार तो हुए, लेकिन अदालतों में मुकदमे वर्षों तक चलते रहे और दोषसिद्धि नहीं हो सकी.

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5 मई 2024 की सुबह झारखंड के हजारीबाग स्थित एक स्कूल के कंट्रोल रूम में कथित तौर पर सीलबंद ट्रंकों को विशेष उपकरणों की मदद से खोला गया. आरोप है कि वहां से NEET-UG परीक्षा के प्रश्नपत्रों की तस्वीरें ली गईं और उनके हल तैयार कर अभ्यर्थियों तक पहुंचाए गए. उसी दिन देशभर में 23 लाख से अधिक छात्र परीक्षा में शामिल हुए थे बाद में आरोप सामने आए कि परीक्षा के दौरान बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को अवैध तरीके से प्रश्नपत्र और उत्तर उपलब्ध कराए गए थे. इस खुलासे ने देश की सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.

मामले के सामने आने के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने व्यापक जांच शुरू की. जांच के दौरान कई चार्जशीट दाखिल की गईं और लगभग 45 आरोपियों के नाम सामने आए. एजेंसियों ने 144 कथित लाभार्थियों की पहचान भी की. जांच में कई गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें रॉकी उर्फ राकेश रंजन जैसे कथित सरगना और बाद में पकड़े गए कथित मास्टरमाइंड संजीव कुमार सिंह उर्फ संजीव मुखिया भी शामिल थे. संजीव मुखिया पर तीन लाख रुपये का इनाम घोषित था और वह परीक्षा के लगभग एक वर्ष बाद तक फरार रहा था. इसके बावजूद 2026 के मध्य तक इस मामले में किसी भी आरोपी को अदालत से दोषी घोषित नहीं किया जा सका है.

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NEET-UG 2024 मामले में जांच एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर सबूत जुटाने का दावा किया है, लेकिन मुकदमे की प्रक्रिया अब भी जारी है. अधिकांश आरोपी या तो न्यायिक हिरासत में हैं या जमानत पर बाहर हैं. जांच में जिन लोगों की भूमिका सामने आई, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई चल रही है, लेकिन अब तक किसी को अंतिम रूप से दोषी नहीं ठहराया गया. आलोचकों का कहना है कि जिस नेटवर्क ने कथित रूप से पेपर लीक को संभव बनाया, उसके शीर्ष स्तर तक जांच अभी भी पूरी तरह नहीं पहुंच पाई है.

भारत में पेपर लीक की समस्या कोई नई नहीं है. संसदीय चर्चाओं और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 20 15 से 2023 के बीच आठ राज्यों में सरकारी भर्ती परीक्षाओं के 50 से अधिक पेपर लीक मामले सामने आए. इन घटनाओं से करीब 1.4 करोड़ अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित हुआ. यदि NEET, UGC-NET और बिहार शिक्षक भर्ती जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो यह संख्या और अधिक बढ़ जाती है. बार-बार होने वाले पेपर लीक ने भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.

राजस्थान पेपर लीक मामलों का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा. वर्ष 2011 से 2022 के बीच राज्य में 26 पेपर लीक की घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें से 14 घटनाएं केवल अंतिम चार वर्षों में हुईं. इसका मतलब है कि औसतन हर साल तीन से अधिक बार परीक्षा प्रणाली में सेंध लगी. गुजरात में 2015 के बाद 14 मामले सामने आए, जबकि उत्तर प्रदेश में 2017 से 2022 के बीच छह बड़े पेपर लीक दर्ज किए गए. उत्तराखंड में 2019 के बाद चार प्रमुख घटनाएं सामने आईं. यह आंकड़े बताते हैं कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है.

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राजस्थान विधानसभा को जनवरी 2024 में दी गई जानकारी के अनुसार, 2014 के बाद दर्ज 33 मामलों में 615 लोगों को गिरफ्तार किया गया. 32 मामलों में चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी थी. हालांकि सरकार ने यह अलग से नहीं बताया कि इनमें से कितने मामलों में अदालत ने आरोपियों को दोषी ठहराया. यही स्थिति देश के कई अन्य राज्यों में भी देखने को मिलती है, जहां जांच और गिरफ्तारियां तो होती हैं, लेकिन अंतिम सजा तक पहुंचना बेहद मुश्किल साबित होता है.

NEET-UG 2024 मामले की शुरुआती जांच करने वाली बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने पाया कि आरोपियों का नेटवर्क बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान तक फैला हुआ था. जांच एजेंसियों के अनुसार यह कोई स्थानीय गिरोह नहीं था, बल्कि कई राज्यों में सक्रिय संगठित अपराध का नेटवर्क था. अधिकारियों का दावा है कि इस नेटवर्क के कुछ सदस्य दो दशकों से अधिक समय से परीक्षा धोखाधड़ी के कारोबार में सक्रिय रहे हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि पेपर लीक अब केवल परीक्षा केंद्रों तक सीमित अपराध नहीं रहा, बल्कि एक बड़े संगठित उद्योग का रूप ले चुका है.

भारत की जांच और न्याय प्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल उन आरोपियों को लेकर उठता है जो एक मामले में गिरफ्तार होते हैं, जमानत पर बाहर आते हैं और फिर दूसरे मामले में पकड़े जाते हैं. संजीव कुमार सिंह उर्फ संजीव मुखिया इसका बड़ा उदाहरण माना जाता है. अप्रैल 2025 में गिरफ्तारी के समय उसके खिलाफ 12 आपराधिक मामले दर्ज बताए गए थे, जिनमें पांच सीधे पेपर लीक से जुड़े थे. उसका नाम NEET-UG 2024, बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा, बिहार पुलिस कांस्टेबल भर्ती और अन्य कई बड़े पेपर लीक मामलों में सामने आया.

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जांच एजेंसियों के अनुसार संजीव मुखिया का बेटा डॉ. शिव कुमार, जो पटना मेडिकल कॉलेज से MBBS कर चुका है, कथित तौर पर NEET साजिश का हिस्सा था. जांचकर्ताओं का दावा है कि परीक्षा धोखाधड़ी इस नेटवर्क के लिए एक संगठित कारोबार बन चुकी थी. यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह दर्शाता है कि पेपर लीक केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं बल्कि कई स्तरों पर संचालित आर्थिक गतिविधि का रूप ले चुका है.

जांच एजेंसियों ने विकास मिश्रा को भी कई मामलों में कथित किंगपिन बताया. उसका नाम 2021 के UPTET पेपर लीक, 2023 के मध्य प्रदेश राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन नर्सिंग परीक्षा घोटाले और 2024 के उत्तर प्रदेश समीक्षा अधिकारी परीक्षा लीक मामले में सामने आया. इसी तरह रंजीत अत्री का नाम 2012 के AIPMT और 2015 के AIIMS-PG पेपर लीक मामलों से जुड़ा बताया गया. बाद में NEET-UG 2024 जांच में भी उसके कथित संबंध सामने आए. लगभग एक दशक तक एक ही नामों का अलग-अलग मामलों में उभरना जांच और न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है.

पेपर लीक रोकने के लिए राजस्थान ने अप्रैल 2022 में अपना सख्त कानून बनाया, जिसमें 10 साल तक की सजा और 10 करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया. लेकिन कानून लागू होने के कुछ ही महीनों बाद REET सेकेंड ग्रेड शिक्षक भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के आरोप सामने आ गए. इससे यह बहस तेज हो गई कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की भी आवश्यकता है.

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बढ़ते जनाक्रोश के बीच संसद ने फरवरी 2024 में पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट पारित किया. जून 2024 में इसे लागू भी कर दिया गया. इस कानून के तहत अनुचित साधनों का उपयोग करने वालों के लिए तीन से पांच वर्ष तक की सजा और संगठित परीक्षा धोखाधड़ी के मामलों में 10 वर्ष तक की कैद का प्रावधान है. इसके अलावा 10 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है. अपराधों को गैर-जमानती और संज्ञेय श्रेणी में रखा गया है तथा विशेष अदालतों के गठन का भी प्रावधान किया गया है.

कानून सख्त होने के बावजूद 2026 के मध्य तक इस नए कानून के तहत किसी बड़ी दोषसिद्धि की जानकारी सामने नहीं आई है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल कानून की नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की भी है. भारत की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं. ऐसे में पेपर लीक जैसे मामलों को अंतिम निर्णय तक पहुंचने में कई वर्ष लग जाते हैं. कई बार गवाह, तकनीकी साक्ष्य और लंबी कानूनी प्रक्रिया भी दोषसिद्धि को कठिन बना देती है.

रेलवे भर्ती बोर्ड परीक्षा पेपर लीक का 2002 का मामला इसका बड़ा उदाहरण है। अधिकारियों पर प्रश्नपत्र के बदले पैसे लेने का आरोप था. रिपोर्टों के अनुसार इस मामले में अंतिम फैसला आने में करीब 23 साल लग गए. अगर इसी गति से NEET-UG 2024 मामले की सुनवाई आगे बढ़ती है तो आरोपियों के खिलाफ अंतिम फैसला आने में कई दशक लग सकते हैं. यही कारण है कि छात्र और अभिभावक न्यायिक प्रक्रिया की गति को लेकर चिंतित हैं.

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CBI का कहना है कि NEET मामले की जांच अभी पूरी तरह बंद नहीं हुई है और आगे पूरक चार्जशीट भी दाखिल की जा सकती हैं. लेकिन शिक्षा नीति से जुड़े कई विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश मामलों में जांच एजेंसियां केवल सामने दिखाई देने वाले ऑपरेटरों तक पहुंचती हैं. असली आर्थिक नेटवर्क, फंडिंग चैन और उन लोगों तक पहुंचना कठिन साबित होता है जो इस पूरे कारोबार को लाभदायक बनाते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक पैसे के अंतिम स्रोत और पूरे वित्तीय ढांचे का खुलासा नहीं होगा, तब तक पेपर लीक का यह कारोबार पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकेगा.

NEET-UG 2024 विवाद ने केवल एक परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाए, बल्कि भारत की पूरी परीक्षा प्रणाली, जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है. सैकड़ों गिरफ्तारियों, दर्जनों चार्जशीटों और नए कानूनों के बावजूद दोषसिद्धि का रिकॉर्ड बेहद कमजोर है. जब तक जांच तेजी से पूरी नहीं होगी, विशेष अदालतें प्रभावी ढंग से काम नहीं करेंगी और आर्थिक नेटवर्क की जड़ तक कार्रवाई नहीं पहुंचेगी, तब तक लाखों छात्रों के मन में यह डर बना रहेगा कि मेहनत से ज्यादा ताकत परीक्षा माफिया की चलती है.

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