बढ़ता आंदोलन, इस्लामिक क्रांति और जनता में उबाल... जानें 47 साल पुरानी अमेरिका-ईरान की दुश्मनी का पूरा किस्सा

ईरान में सरकार विरोधी आंदोलन जारी है. जिसमें कई आंदोलनकारी मारे भी जा चुके हैं. लेकिन आंदोलन की ये आग थम नहीं रही है. क्या ईरान में इस्लामिक क्रांति की पृष्ठभूमि? कैसा था शाह पहेलवी का शासन? पढ़ें आयातुल्लाह खुमैनी का उदय और अमेरिका-ईरान की 47 साल पुरानी दुश्मनी की पूरी कहानी.

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अमेरिका की नजर ईरान के प्राकृतिक संसाधनों पर रही है (फोटो-ITG) अमेरिका की नजर ईरान के प्राकृतिक संसाधनों पर रही है (फोटो-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 13 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:40 AM IST

Iran vs USA Conflict: पिछले 16 दिनों से ईरान सुलग रहा है. ईरान की खस्ता माली हालत और महंगाई से शुरू हुआ ईरानी अवाम का गुस्सा हर गुजरते दिन के साथ बढ़ता जा रहा है. सीधे ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह रूहुल्ला खामेनेई को निशाने पर लेने की वजह से 100 से ज्यादा ईरानी शहरों की सड़कों पर अब सीधे ईरानी सुरक्षा बल और आंदोलनकारियों के बीच टकराव शुरू हो चुका है. हालांकि दुनिया भर की मीडिया के लिए ईरान के अंदर की सही जानकारी देना मुश्किल है. लेकिन जो ईरान के अंदर से खबर आ रही है, उसके मुताबिक अब तक 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. जबकि हजारों आंदोलनकारी गिरफ्तार हो चुके हैं.

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कहा जा रहा है कि 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद पिछले 47 सालों में इससे बड़ा सरकार विरोधी प्रदर्शन नहीं हुआ. ईरान की अवाम आयातुल्लाह खामेनेई और उनकी सरकार को हटाने की मांग कर रही है. हालात तब और खराब हो गए जब ईरान के जनरल प्रॉसिक्यूटर मोहम्मद काजिम मोवाहेदी आजाद ने ईरानी अदालतों के जजों और स्टाफ से देश भर में जारी आंदोलन में शामिल लोगों पर मुकदमा चलाने में तेजी लाने का हुक्म दिया. उन्होंने कहा है कि आंदोलन के नाम पर दंगों में शामिल सभी लोगों पर एक ही इल्जाम है और उसी इल्जाम के तहत सभी पर एक ही आरोप लगाए जाएं. आरोप खुदा के खिलाफ जंग छेड़ना. जिसकी सजा मौत है.

आपदा में अवसर ढूंढते हुए ईरान के अंदरूनी मामलों में आदत के मुताबिक अमेरिका एक बार फिर से कूद पड़ा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ये धमकी दे रहे हैं कि अगर ईरानी आंदोलनकारियों पर ईरानी हुकूमत ने सख्ती की तो अंजाम बुरा होगा. ट्रंप ऐसे हालात में ईरान पर हमले तक की धमकी दे रहे हैं. ट्रंप के अलावा अमेरिकी मानवाधिकार संगठनों ने भी ईरान के हालात पर चिंता जताई है और कहा है कि ईरान में जो कुछ हो रहा है, वो असामान्य है.

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उधर, अमेरिकी धमकी के बावजूद ईरान के तेवर तीखे हैं और ईरानी नेताओं ने साफ कर दिया है कि अगर अमेरिका ने उसके अंदरूनी मामलों में दखल देने की कोशिश की, तो अंजाम खतरनाक होंगे. अभी पिछले साल ही ईरान और इजरायल के बीच हुई 12 दिन की जंग में भी अमेरिका कूद पड़ा था. इसके बाद अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर भी हमले किए थे. सवाल ये है कि आखिर अमेरिका की ईरान से ऐसी क्या दुश्मनी है. क्यों अमेरिका जब तब ईरान को धमकाता रहता है. तो इसे समझने के लिए हमें पहले ईरान को समझना होगा.

पर्शियन एम्पायर.. जिसे ईरान कहा जाता है. 25 सौ साल तक इस देश पर कई राजाओं ने हुकूमत की. जिन्हें शाहों के नाम से जाना गया. 1950 में ईरान की जनता ने मोहम्मद मुसादिक के रूप में एक धर्मनिरपेक्ष राजनेता को प्रधानमंत्री चुना. सत्ता में आते ही मुसादिक ने ईरान के तेल का फायदा सीधे अपने लोगों तक पहुंचाने के लिए ब्रिटिश और यूएस पेट्रोल होल्डिंग का राष्ट्रीयकरण कर दिया. ये वो वक्त था जब दुनिया द्वितीय विश्वयुद्ध से उभर चुकी थी. और अमेरिका को यकीन हो चला था कि उसके अंदर सुपर पावर बनने की पूरी सलाहियत भी है और मौका भी. लिहाजा, 1953 में उसने ब्रिटेन के साथ मिलकर एक साजिश के तहत मुसादिक का तख्तापलट कर दिया. और एक लोकतांत्रिक देश को राजशाही में तब्दील कर मोहम्मद रजा पहेलवी को ईरान का नया शाह बना दिया.

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22 साल का शाह उस वक्त मशहूर था, अपनी अय्याशियों और फिजूलखर्चियों के लिए. कहते हैं आलम ये था कि उसकी पत्नी पानी नहीं दूध में नहाया करती थी. जबकि शाह का लंच रोजाना पेरिस से मंगवाया जाता था. इस बात की परवाह किए बगैर कि उसके अपने मुल्क में लोग भूखे मर रहे थे. पहेलवी राजवंश पर फिर से खतरा ना मंडराए और सत्ता पहेलवी राजवंश के ही पास रहे इसलिए पहेलवी राजवंश के आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहेलवी ने अपनी एक बेरहम आंतरिक पुलिस सवाक की स्थापना की. जिसका एक ही काम था राजवंश के खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज को बड़ा बनने से पहले ही कुचल देना.

वहीं दूसरी तरफ दुनिया में ग्लोबलाइजेशन के दौर पर बाजारतंत्र हावी होने लगा था. मगर इसके लिए जरूरी था ईरान का पश्चिमी रंग में रंगना और शाह ने अगला कदम यही उठाया. ईरान के बाजार को दुनिया के लिए खोल दिया. जिसका नतीजा ये हुआ कि तेहरान फैशन का हब बन गया. कहते हैं उस दौर में फैशन पेरिस से पहले तेहरान में आने लगा था. अय्याशी का कोई ऐसा सामान नहीं था जो ईरान की राजधानी में मुहैया ना हो. 90 फीसदी शिया मुस्लिम और करीब 9 फीसदी सुन्नी मुस्लिमों को शाह पहेलवी का ये खुला रूप बिल्कुल भी नहीं भा रहा था. उनके मुताबिक अमेरिका के दबाव में शाह पहेलवी ने ना सिर्फ मुल्क को अमेरिका के सामने गिरवी कर दिया है बल्कि ईरान की तमीज और तहजीब का भी बेड़ा गर्क कर दिया.

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करीब 10 सालों तक ईरान को पश्चिमी रंग में बदलते हुए अपनी आंखों से देखने के बाद लोग शाह पहेलवी के खिलाफ सड़कों पर उतर आए और इन लोगों की अगुवाई इस्लामिक लीडर आयतुल्लाह रूहुल्ला खुमैनी कर रहे थे. शाह की सुरक्षा एजेंसियों ने फौरन आयातुल्लाह खुमैनी को गिरफ्तार कर लिया. और उन्हें 18 महीनों तक जेल में यातनाएं दी गईं. 1964 में जेल से आजादी के लिए उनके सामने दो शर्तें रखी गईं या तो वो शाह से माफी मांगे या देश छोड़ दें. आयातुल्लाह खुमैनी ने दूसरा रास्ता चुना और उन्हें देश से निकाल दिया गया. उस दिन के बाद से वो 14 साल ईरान से दूर रहे. पहले इराक, फिर तुर्की और फिर फ्रांस.. और इन सालों में खुमैनी वहीं से मोहम्मद रजा पहेलवी को सत्ता से बेदखल करने का खाका खींचते रहे.

साल 1971 में ईरानी शहर पर्सेपोलिस में शाह ने अपने दोस्त मुल्कों की शान में एक शानदार पार्टी रखी. इसमें यूगोस्लाविया, मोनाको, अमेरिका और सोवियत संघ से आए उनके सियासी दोस्तों ने शिरकत की. जिसमें ईरान में उठते विरोध के स्वर को कुचलने की रणनीति पर चर्चा की गई. शाह की इस पार्टी को निर्वासन झेल रहे ईरानी नेता आयातुल्लाह खुमैनी ने शैतानों का जश्न कहा. ये वो दौर था जब ईरानी जनता में शाह के खिलाफ गुस्सा और आयातुल्लाह खुमैनी में उम्मीद नजर आ रही थी.

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फ्रांस में रहने के दौरान उनके संदेशों को मुल्क में पंपलेट और ऑडियो-वीडियो मैसेज के जरिए लोगों तक पहुंचाया जा रहा था. जो काम आयातुल्लाह खुमैनी मुल्क में रहकर नहीं कर पाए. वो उन्होंने मुल्क से बाहर रहते हुए कर दिया. ईरान में हर तरफ एक ही सदा थी. आयातुल्लाह खुमैनी जिंदाबाद. शाह पहेलवी मुर्दाबाद. लेकिन ऐसा कतई नहीं था कि ईरान में जो कुछ हो रहा था उससे दुनिया ने आंख बंद कर ली थी. खासकर अमेरिका ने. शाह पहेलवी का ईरान की सत्ता पर काबिज रहना अमेरिका के लिए उतना ही जरूरी था. जितना कि उसके लिए सुपर पावर बने रहना. वो इसलिए क्योंकि सुपर पावर बने रहने की असली पावर उसे ईरान और फारस की खाड़ी से मिल रही थी.

पश्चिमी एशिया में ईरान एक बड़ा और बेहद अहम देश है. ना सिर्फ इसकी सरहद अगल-बगल के करीब आधा दर्जन देशों के साथ लगती है. बल्कि महासागरों और खाड़ियों के मामले में भी ये किसी भी देश से बेहतर स्थिति में है. उत्तर में तुर्कमेनिस्तान, कैस्पियन सागर, अजरबैजान. पश्चिम में तुर्की, इराक और पूर्व में पाकिस्तान और अफगानिस्तान. दक्षिण में फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी. दोनों खाड़ियों को जोड़ता है एक वॉटर चैनल जिसका नाम है स्ट्रेट ऑफ हार्मुज. इस स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को गौर से देख लीजिए क्योंकि यही वो जगह है जो मौजूदा हालत में अमेरिका और ईरान की जंग का मैदान बना हुआ है.

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असल में भौगोलिक रूप से ईरान की अहमियत इसलिए ज़्यादा है क्योंकि व्यापार की नज़रिए से और प्राकृतिक संसाधनों के मामले में दुनिया में इससे बेहतर जगह कोई नहीं है. तेल और गैस की खोज ने तो इस मुल्क को सोने की खान बना दिया. और इसीलिए अकेले अमेरिका नहीं बल्कि इससे पहले ब्रिटेन और सोवियत यूनियन यहां अपने प्रभाव के लिए जद्दोजहद करते रहे हैं. अब इस इलाके को फिर गौर से देखा जाए तो फारस और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाले समुद्र की चौड़ाई महज़ 55 किमी है. इसलिए इस इलाके में ईरान से पंगा लेने का मतलब है तेल पर निर्भर मुल्कों के लिए खुदकुशी के बराबर है. क्योंकि दुनिया का 20 फीसदी तेल इसी रास्ते से गुज़रता है.

जब तक शाह पहेलवी मुल्क पर काबिज़ रहे तब तक ईरान ना सिर्फ अमेरिका के लिए बाज़ार था बल्कि ज़्यादातर तेल और गैस संसाधनों पर उसका कब्ज़ा भी रहा. इस दौरान अमेरिका ने ईरान का जमकर इस्तेमाल किया और अपनी इसी दोस्ती के बल पर कई बड़े कूटनीतिक फैसले किए. जिसने उसे सुपर पावर से भी पावरफुल बना दिया.

1 फ़रवरी 1979, चार्ल्स द गाल एयरपोर्ट पेरिस, फ्रांस
बोइंग 747 ने तेहरान के लिए टेक ऑफ़ किया. पेरिस से उड़ा ये विशेष विमान था. क्योंकि तेहरान में लैंड करते ही ये ईरान के इतिहास को बदलने जा रहा था. बोइंग पर सवार थे आयातुल्लाह रूहुल्लाह ख़ुमैनी. ईरान के शाह के खिलाफ दो दशकों से छिड़ी विद्रोह की क्रांति के महानायक. 14 सालों तक पहले निर्वासन में रहने के बाद ख़ुमैनी अपने वतन लौट रहे थे. जहां करोड़ों लोगों का हुजूम उनके खैरमक़दम के लिए पागल हुआ जा रहा था.

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शाह की नीतियों से तंग आ चुके ईरान के लाखों आम लोगों ने साल 1978 में आखिरी रण छेड़ दिया था. क्योंकि ईरानी संसाधनों से कमाई तो बेतहाशा हो रही थी मगर वो गरीबों तक ना पहुंचकर शाह पहेलवी और अमेरिका का खज़ाना भर रहा था. नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया. अखबार में वही छपता जो शाह चाहता था. कुल मिलाकर ईरान में इमरजेंसी जैसे हालात थे. जिससे तंग आकर अक्टूबर 1977 में छात्रों ने ईरान की सड़कों पर प्रदर्शन शुरू कर दिया. शाह की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी सवाक ने लोगों पर यलगार बोल दिया और सैकड़ों लोग मारे गए. मगर इस आंदोलन को जितना दबाया गया ये उतना ही बढ़ता गया. इस दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और उनकी सेना शाह के सपोर्ट में खड़ी रही.

16 जनवरी 1979
करीब एक साल चली इस क्रांति में शाह पहेलवी को अब समझ आ गया कि ईरान से उनके जाने का वक्त आ गया है और शाहपुर बख़्तियार को प्रधानमंत्री बनाकर शाह पहेलवी इलाज के बहाने अमेरिका चला गया.

1 फ़रवरी 1979, मेहराबाद एयरपोर्ट तेहरान, ईरान
तेहरान शहर के ऊपर बीस मिनटों तक चक्कर लगाने के बाद आखिरकार विमान ने रन-वे पर लैंड किया. चंद लम्हे में बोइंग 747 के पायलट के हाथों का सहारा लिए हुए नज़र आए आयातुल्लाह ख़ुमैनी. लोगों की इस अथाह भीड़ ने उनका ऐतिहासिक स्वागत किया और इस तरह ईरान को शाह के शासन से मुक्ति तो मिल गई. मगर नई हुकूमत ने बनने से पहले ही अमेरिका से दुश्मनी मोल ले ली. अमेरिका तमाम तरीकों से ईरान की नई सरकार पर दबाव बनाने लगा.

शाह को वापस ईरान ना भेजने को लेकर लोगों का गुस्सा अमेरिका पर था ही. वहीं उसके फैसलों ने ईरान के लोगों में और गुस्सा भर दिया. नतीजतन छात्रों के एक गुट ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास के 52 अमेरिकी लोगों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा. ये उस शाह पहेलवी के खिलाफ ईरान में मुकदमा चलाने की मांग कर रहे थे जिसे अमेरिका ने शरण दे रखी थी. हालांकि बाद में अल्जीरिया की मध्यस्थता के बाद उन्हें छोड़ दिया गया. मगर इसका बदला अमेरिका ने इराक के ज़रिए ईरान पर हमला करवा कर लिया. और ये जंग आठ लंबे सालों तक चली.

ईरानी क्रांति से शुरू हुई अमेरिका और ईरान की दुश्मनी अभी तक जारी है. पिछले 47 सालों से अमेरिका ने ईरान को झुकाने के लिए उस पर तमाम तरह की आर्थिक पाबंदियां लगा रखी हैं. जिसकी वजह से तेल और गैस का अकूत भंडार होने के बावजूद भी ईरान की अर्थव्यवस्था काल के गर्त में गिरती चली जा रही है. बावजूद इसके ईरान ने अमेरिका के सामने झुकने से इंकार कर दिया. हालांकि साल 2015 में बराक ओबामा और हसन रोहानी के बीच पी-5 प्लस वन समझौता हुआ था, जिसमें सिक्योरिटी काउंसिल के स्थायी सदस्य यानी पी-5 देश जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन के अलावा जर्मनी शामिल थे.

जिसके तहत ये समझौता हुआ कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करेगा और उसके बदले में ये तमाम देश उससे आर्थिक प्रतिबंध हटा लेंगे. लेकिन अमेरिका में सरकार बदलते ही नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से खुद को अलग कर लिया. और तब से ही अमेरिका सऊदी अरब-इज़राइल जैसे देशों के दबाव में ईरान पर हमले के बहाने ढूंढ रहा है. इसकी दो वजह हैं. पहली तो ये कि अमेरिका ईरान के तेल और गैस के खनिजों पर अपना कंट्रोल चाहता है और दूसरी वजह ये है कि सऊदी अरब और इज़राइल जैसे देश चाहते हैं कि ईरान अरब क्षेत्र में मज़बूत ना हो पाए. क्योंकि वो उनके लिए खतरा बन सकता है.

पिछले 47 सालों में ऐसे कई मौके आए जब लगा कि ईरान अमेरिका के सामने घुटने टेक देगा. वरना अमेरिका ईरान पर हमला कर देगा लेकिन ना तो ईरान ने अब तक अमेरिका के सामने घुटने टेके और ना ही अमेरिका ईरान पर न्यूक्लियर प्लांट्स को छोड़कर सीधे-सीधे हमला कर पाया. पर क्या मौजूदा आंदोलन की आड़ में ईरान में तख्ता पलट के लिए इस बार अमेरिका ईरान पर सीधे हमला करेगा.

आजतक ब्यूरो

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