कोरोना की वैक्सीन और रिसर्च से जुड़े वो सवाल, जिनके जवाब खोज रही दुनिया

इस स्टडी को CEPI की ओर से फंड किया जाता है जो महामारी से निपटने की तैयारियों से जुड़े नए प्रयोगों के लिए वैश्विक सहयोग है. इसे भारत सरकार का भी समर्थन मिला हुआ है. कोरोना वायरस जैसी घातक महामारी को लेकर हमने उनसे वो सभी सवाल पूछे जिनका जवाब आज दुनिया का हर शख्स जानना चाहता है.

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सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर

गीता मोहन

  • नई दिल्ली,
  • 11 अप्रैल 2020,
  • अपडेटेड 8:46 PM IST

  • कोरोना महामारी पर प्रोफेसेर वासन ने दी अहम जानकारी
  • कोरोना के संक्रमण को रोकने में भारत की भूमिका अहम

इस वक्त सारी दुनिया कोरोना वायरस महामारी से जंग लड़ रही है. हर किसी को इंतज़ार है उस शक्तिशाली वैक्सीन का जो इस जानलेवा वायरस से रक्षा के लिए मजबूत कवच के तौर पर काम कर सके.

इंडिया टुडे ने इस संबंध में भारत में जन्मे और ऑस्ट्रेलिया की साइंस एजेंसी CSIRO में पैथोजन्स टीम को लीड करने वाले प्रोफेसर एस एस वासन से खास बातचीत की. प्रो वासन इस वक्त दुनिया की पहली मल्टी वैक्सीन एनिमल एफिकेसी स्टडी पर काम कर रहे हैं.

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इस स्टडी को CEPI की ओर से फंड किया जाता है जो महामारी से निपटने की तैयारियों से जुड़े नए प्रयोगों के लिए वैश्विक सहयोग है. इसे भारत सरकार का भी समर्थन मिला हुआ है. कोरोना वायरस जैसी घातक महामारी को लेकर हमने उनसे वो सभी सवाल पूछे जिनके जवाब आज दुनिया का हर शख्स जानना चाहता है.

सवाल: कोरोनो वायरस के विभिन्न स्ट्रेन्स का इस्तेमाल वैक्सीन के मूल्यांकन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है?

प्रो वासन: हमने ‘Transboundary and Emerging Diseases journal’ में अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें हमने इस वायरस के पहले 181 जीनोम सीक्वेंस को देखा. ये जानने के लिए कि ये कैसे RNA वायरस से अलग कलस्टर्स में तब्दील हो रहा है. मैं नहीं समझता कि हम जो स्ट्रेन्स इस्तेमाल कर रहे हैं, उनमें इन वैक्सीन के एनिमल म़ॉडल वैलिडेशन के लिए कोई समस्या है. लेकिन हां हम बारीकी से स्थिति पर नजर रख रहे हैं. करीब 4,000 उपलब्ध सीक्वेंस को हम देख रहे हैं.'

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सवाल: ऐसी रिपोर्ट है कि पहले क्रॉस स्पीसिज ट्रांसमिशन में न्यूयॉर्क में ब्रॉन्क्स चिड़ियाघर में एक बाघ को कोरोना वायरस पॉजिटिव पाया गया?

प्रो वासन: एक प्रोटीन होता है-'ACE2'. ये कोरोना वायरस के लिए सेल्स में एंट्री पाइंट की तरह काम करता है. अगर आप इस प्रोटीन पर पांच रेसिड्यूस को देखे तो पाएंगे कि फेरेट्स और बाघों में कई उपयुक्त अमीनोएसिड्स राइट लोकेशन में होते हैं. क्योंकि फेरेट्स पर बाघों के मुकाबले काम करना आसान होता है, इसलिए उन्हें चुना.

सवाल: क्या आप कोरोना वायरस के वैक्सीन का जल्द ही क्लीनिकल ट्रायल शुरू करने वाले हैं? साथ ही क्या वैज्ञानिक वैक्सीन की जांच के लिए स्वस्थ लोगों में कोरोना वायरस को इंजेक्ट करेंगे?

प्रो वासन: CSIRO कोई मानव क्लीनिकल ट्रायल नहीं करता. वो विभिन्न वैक्सीन के डेवेलपर्स की ओर से किया जाता है. 115 से ज्यादा वैक्सीन कैंडीडेट इस वक्त विकसित कर रहे हैं. CEPI ने 8 कैंडीडेट को फंड किया है. पहला मॉडर्ना है, दूसरा इनोवियो और तीसरा ऑक्सफोर्ड. हम इनोवियो और ऑक्सफोर्ड कैंडीडेट्स के लिए एनिमल मॉडल का मूल्यांकन कर रहे हैं.

अगर आप देखें तो आप वैक्सीन को चेक करने के लिए लिए स्वस्थ लोगों को कोरोनो वायरस से संक्रमित नहीं कर रहे हैं. इस स्थिति में फेज 1 में क्लीनिकल ट्रायल सुरक्षा को देखा जाता है. आदर्श तौर पर आपको फेज 1 शुरू करने से पहले प्रीक्लिनिकल रिसर्च पूरी करनी होती है. इसलिए हम यहां ट्रायल कर रहे हैं. हम ऐसा करने वाले अकेले नहीं हैं. और भी कई लैब्स में अन्य एनीमल मॉडल को देखा जा रहा होगा. ये डेटा पैकेज बहुत अहम है जो फेज 2 की मंजूरी के लिए आगे जाएगा.

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सवाल: क्या आप दुनिया के दूसरे वैज्ञानिकों के भी संपर्क में हैं जो ऐसे ही वैक्सीन विकसित करने के प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं.

प्रो वासन: किसी भी वैक्सीन का विकास आधुनिक दुनिया में किसी एक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं होता. ये सामूहिकता का विषय है. ऐसे समझ सकते हैं कि हम CEPI के स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ता हैं जो जानवर पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हैं. हम उन डेवेलपर्स से दूर हैं जो वैक्सीन कैंडीडेट्स को ऑप्टीमाइज कर रहे हैं. लेकिन हम CSIRO निर्माण के जरिए क्वींसलैंड यूनिर्वसिटी की वैक्सीन को स्केल अप कर रहे हैं. जिन दोनों वैक्सीन, इनोवियो और ऑक्सफोर्ड को मैं जांच रहा हूं, मैं ये भी देख रहा हूं क्या एक सिंगल डोज ही काफी होगी या बूस्टर डोज की भी जरूरत होगी.

सवाल: ऐसी रिपोर्ट्स भी आ रही हैं कि जिन्हें टीबी के लिए वैक्सीन दिया जाता है उन्हें कोरोना वायरस से संक्रमित होने का खतरा कम होता है. क्या इसका कोई वैज्ञानिक आधार है?

प्रो वासन: BCG वैक्सीन को अन्य माइक्रो बैक्टीरिया से बचाव के लिए जाना जाता है जैसे कि कुष्ठ रोग और श्वसन रोग. मैं ओर ‘मर्डोक चिल्ड्रन्स रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के मेरे साथी इस पहलू को देख रहे हैं. मैं जानने का इच्छुक हूं कि स्टडी से क्या सामने आता है?

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सवाल: हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन ड्रग काफी सुर्खियों में हैं? क्या कोरोना मरीजों को ये ड्रग ठीक कर सकती है?

प्रो वासन: जब मैं पब्लिक हेल्थ ऑफ इंग्लैंड में था तो मैंने पाया कि क्लोरोक्वीन से इन विट्रो (जीव के बाहर कृत्रिम वातावरण में) इबोला वायरस के रिप्लीकेशन को रोकने में मदद मिलती है. लेकिन जीव के शरीर के अंदर गिनी पिग्स में ये देखा गया तो ड्रग ऐसा करने में नाकाम रही. ये कोई नया विचार नहीं है. बड़ी महामारी को सुलझाने या पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी के वक्त क्लोरोक्वीन या हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल वैज्ञानिकों की ओर से उठाया जाने वाला सही कदम है.

सवाल: आप लॉकडाउन को लेकर भारत सरकार के फैसले पर क्या कहना चाहेंगे. क्या ये सही कदम रहा?

प्रो वासन: सोशल डिस्टेंसिंग और लॉकडाउन के जरिए संक्रमण की गति को रोकना वो रणनीति है जिसे ऑस्ट्रेलिया, भारत और कई अन्य देश अपना रहे हैं. भारत सरकार की WHO और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से प्रशंसा की जा रही है कि इस संकट को सुलझाने की दिशा में निर्णायक नेतृत्व दिखाया गया. ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि भारत बहुत बड़ी आबादी वाला देश है. हर नागरिक की जिम्मेदारी बनती है कि वो इसमें अपनी भूमिका निभाए.

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