ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव दुबई के रियल एस्टेट मार्केट की चमक को थोड़ा फीका कर सकता है. मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता की वजह से भारतीय निवेशक, जो दुबई के सबसे बड़े खरीदारों में से एक हैं, अब थोड़े संभलकर कदम उठा सकते हैं.
फिलहाल बाजार में कोई घबराहट तो नहीं है, लेकिन एक 'वेट एंड वॉच' वाली स्थिति बनी हुई है. ज्यादातर निवेशक और खरीदार अभी बड़े सौदों पर मुहर लगाने से बच रहे हैं और इस इंतजार में हैं कि हालात थोड़े और साफ हों.
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क्या गिरेंगे प्रॉपर्टी के दाम?
दिक्कत तब और बढ़ सकती है जब हम सप्लाई के आंकड़ों को देखते हैं. इस साल दुबई के बाजार में करीब 1.20 लाख नए घर बनकर तैयार होने वाले हैं, जो कि वहां की सामान्य सालाना सप्लाई (करीब 60-65 हजार) से लगभग दोगुनी है. अगर युद्ध जैसे हालात के डर से मांग कम हुई और सौदों की रफ्तार सुस्त पड़ी, तो बाजार में घरों की इतनी बड़ी तादाद कीमतों को नीचे गिरा सकती है. जानकारों की मानें तो अगर अगले 3 से 6 महीनों तक यही सुस्ती रही, तो दुबई की प्रॉपर्टी के दामों में गिरावट साफ तौर पर नजर आने लगेगी.
हालांकि, विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि अगर अनिश्चितता बनी रहती है, तो इसका असर अगली कुछ तिमाहियों में साफ दिखाई देने लगेगा. अगर सतर्क रुख के चलते सौदों की संख्या में कमी आती है, तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, खासकर 'स्पेक्ट्यूलेटिव' या 'ऑफ-प्लान'सेगमेंट में.
जानकारों का कहना है कि,भले ही संघर्ष कम हो जाए, फिर भी खरीदारी के उत्साह में कुछ कमी देखी जा सकती है. अनिवासी भारतीय (NRI) और विदेशी निवेशक इस बात पर अपनी निवेश रणनीति पर दोबारा विचार कर सकते हैं कि अंतरराष्ट्रीय गठबंधन कैसे बनते हैं और यह तनाव कितने समय तक खिंचता है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे माहौल में खरीदार सौदों की शर्तों पर फिर से मोलभाव करने की कोशिश करेंगे. विशेष रूप से रीसेल सेगमें टमें भारी छूट देखने को मिल सकती है.
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