गुरुग्राम में लग्जरी फ्लैट, BMW कार... फिर भी 'गरीब', डॉक्टर ने बताया क्या है 'आधुनिक गरीबी'

सोशल मीडिया पर एक डॉक्टर का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने आज के कॉर्पोरेट युवाओं की मानसिक स्थिति का एक कड़वा सच बयां किया है. वीडियो में गुरुग्राम के एक ऐसे युवक का जिक्र है जिसके पास 40 लाख की सैलरी और BMW कार तो है, लेकिन मन की शांति और जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है.

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40 लाख सालाना कमाने वाला भी कैसे गरीब? (Photo-Pexels) 40 लाख सालाना कमाने वाला भी कैसे गरीब? (Photo-Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 05 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:46 PM IST

आज के दौर में अमीर और गरीब की परिभाषा बदल गई है. अक्सर हम सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों को देखते हैं जिनका पैकैज लाखों में हैं लेकिन खुद को गरीब बताते हैं. ऐसा ही एक मामला गुरुग्राम के एक शख्स का है जिसका सालाना पैकैज 40 लाख है, लेकिन वो खुद को गरीब महसूस करता है.  

सफलता और अमीरी की परिभाषा क्या है, आमतौर पर लोग कहेंगे एक शानदार पैकेज, लग्जरी कार और एक आलीशान घर. लेकिन गुड़गांव के एक शख्स की कहानी इस सोच पर सवालिया निशान लगाती है. वह व्यक्ति सालाना 40 लाख रुपये कमाता है, उसके पास BMW कार है और वह एक 2BHK फ्लैट में रहता है, लेकिन इसके बावजूद वह खुद को "गरीब" महसूस करता है. सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक डॉक्टर ने ये किस्सा शेयर किया है. 

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डॉ. सनी गर्ग ने इंस्टाग्राम पर बताया कि कैसे बदलती और बेहतर होती लाइफस्टाइल लोगों की सोच और मानसिक शांति को प्रभावित कर रही है. डॉ. गर्ग के अनुसार, इस व्यक्ति के पास पैसों की कोई कमी नहीं है. आर्थिक आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए, तो वह देश के सबसे ज़्यादा कमाने वाले लोगों की लिस्ट में शामिल है, लेकिन इसके बावजूद वह एक अजीब से मानसिक तनाव और हीनभावना से जूझ रहा है. उसे हर वक्त यह डर सताता है कि वह जिंदगी की इस दौड़ में दूसरों से पीछे छूट रहा है.

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क्या है गरीबी की परिभाषा?

डॉ. सनी गर्ग अपना वीडियो शेयर करते हुए बताते हैं उनके क्लीनिक में 34 साल का युवक आया वो शानदार सैलरी, BMW कार और एक बेहतरीन घर होने के बावजूद बेहद मायूस था और उसने डॉक्टर से कहा कि वह खुद को बहुत गरीब महसूस करता है, जिसके कारण उसे रात में नींद भी नहीं आती. दरअसल, वह युवक एक ऐसे सामाजिक दबाव में जी रहा था जहां उसे लगता था कि उसके आसपास के लोग उससे कहीं बेहतर कर रहे हैं और वह खुद जिंदगी की रेस में पीछे छूट गया है. डॉ. गर्ग के अनुसार, यह समस्या आज के शहरी प्रोफेशनल्स में बेहद आम हो चुकी है, जिसका असली कारण पैसे की कमी नहीं बल्कि दूसरों से लगातार की जाने वाली तुलना है. वह युवक पहले अपनी सफलता को अपने गृहनगर के लोगों के नजरिए से देखता था, लेकिन अब वह सोशल मीडिया और प्रोफेशनल प्लेटफॉर्म्स पर दिखने वाले युवा स्टार्टअप फाउंडर्स से खुद की तुलना करने लगा है. 

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