भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट बाजार में किराए में बढ़ोतरी और लीजिंग में आती सुस्ती के बीच एक बड़ा अंतर देखा जा रहा है, जो डिमांड और सप्लाई के बदलते समीकरणों को दर्शाता है. Knight Frank के अनुसार, बेंगलुरु और दिल्ली-NCR में ऑफिस का औसत मासिक किराया पहली बार ₹100 प्रति वर्ग फुट के आंकड़े को पार कर गया है. इसके साथ ही ये शहर अब मुंबई की श्रेणी में शामिल हो गए हैं, जहां किराया पहले से ही इस स्तर से काफी ऊपर बना हुआ है.
मुंबई में ऑफिस का किराया सालाना आधार पर 6% बढ़कर ₹125 प्रति वर्ग फुट हो गया है, जबकि दिल्ली-NCR में 15% की भारी उछाल देखी गई, जिससे किराया ₹105 प्रति वर्ग फुट पर पहुंच गया. बेंगलुरु में भी 7% की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यहां किराया ₹100.6 प्रति वर्ग फुट हो गया है. पुणे, हैदराबाद और चेन्नई जैसे अन्य शहरों में भी 5% से 8% के बीच किराए में लगातार बढ़ोतरी देखी गई.
किराए में यह चौतरफा बढ़ोतरी 2022 से चले आ रहे उस दौर को दर्शाती है, जहां कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. इसका मुख्य कारण बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाले ऑफिस स्पेस की सीमित सप्लाई है.
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सप्लाई से ज्यादा डिमांड
किराया बढ़ने की सबसे बड़ी वजह डिमांड और सप्लाई के बीच का गहरा अंतर है. नाइट फ्रैंक के आंकड़ों के अनुसार, साल 2026 की पहली तिमाही (Q1) में ऑफिस स्पेस की लीजिंग रिकॉर्ड 29.9 मिलियन वर्ग फुट तक पहुंच गई, जो पिछले साल के मुकाबले 6% ज्यादा है. इसके उलट, बाजार में नए ऑफिस स्पेस की सप्लाई केवल 14 मिलियन वर्ग फुट रही जो कि इस तिमाही में इस्तेमाल किए गए स्पेस के आधे से भी कम है.
डिमांड और सप्लाई के इस असंतुलन के कारण खाली पड़े ऑफिस स्पेस में भी कमी आई है. साल 2021 में जहां 17.2% ऑफिस खाली थे, वहीं 2026 की शुरुआत तक यह आंकड़ा गिरकर 13.9% रह गया है. दूसरी ओर, डेवलपर्स कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के मुकाबले आवासीय प्रोजेक्ट्स को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं, क्योंकि घर जल्दी बिक जाते हैं और उनमें कम पूंजी लगानी पड़ती है. इसकी वजह से ऑफिस स्पेस की सप्लाई और भी सीमित हो गई है, खासकर प्रीमियम इलाकों में.
हालांकि, इसी के साथ एक विपरीत रुझान भी उभर रहा है. कुशमैन एंड वेकफील्ड (Cushman & Wakefield) के आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली-NCR और मुंबई जैसे बड़े बाजारों में लीजिंग की गतिविधि काफी धीमी हुई है.
साल 2026 की पहली तिमाही (Q1) में इन दोनों शहरों में नेट लीजिंग सालाना आधार पर 51% घटकर 3.28 मिलियन वर्ग फुट रह गई है. दिल्ली-NCR में इसमें 61% की भारी गिरावट देखी गई, जबकि मुंबई में 38% की कमी दर्ज की गई. अगर देश के आठ प्रमुख शहरों की बात करें, तो नेट लीजिंग कुल मिलाकर 24% गिरकर 11.51 मिलियन वर्ग फुट पर आ गई है.
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किराये में बढ़ोत्तरी
दिलचस्प बात यह है कि लीजिंग के आंकड़े कमजोर होने के बावजूद किराये में बढ़ोतरी जारी है. दिल्ली-NCR में किराये में तिमाही आधार पर 2–5% और सालाना आधार पर 6–9% की वृद्धि हुई है. इसमें गुरुग्राम के सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रिक्ट (CBD) में सबसे ज्यादा 15% तक का उछाल देखा गया है. मुंबई में भी किराये में 1.5% की क्रमिक वृद्धि दर्ज की गई है. अंधेरी-कुर्ला रोड और ठाणे-बेलापुर रोड जैसे प्रमुख इलाकों में किराया ₹171 प्रति वर्ग फुट तक पहुंच गया है. यह ट्रेंड दर्शाता है कि ग्रेड-ए ऑफिस स्पेस की कमी और GCCs, BFSI (बैंकिंग व फाइनेंस) और टेक कंपनियों की ओर से बनी हुई मांग के कारण मकान मालिकों का कीमतों पर अब भी पूरा नियंत्रण है. जैसा कि रिपोर्ट में कहा गया है, "क्वालिटी ऑफिस स्पेस की निरंतर मांग आने वाली तिमाहियों में ग्रेड-ए किराये पर और दबाव डालेगी.
साथ ही, लीजिंग वॉल्यूम और किराये में बढ़ोत्तरी के बीच का यह विरोधाभास एक अधिक सूक्ष्म बाजार की ओर इशारा करता है, जहां मांग तो मजबूत बनी हुई है, लेकिन सप्लाई की कमी इसे नया आकार दे रही है. आगे चलकर, ट्रांजेक्शन वॉल्यूम को स्थिर रखने के लिए नए ऑफिस स्पेस की सप्लाई में सुधार होना बेहद महत्वपूर्ण होगा. तब तक, किराये में बढ़ोत्तरी का दौर जारी रहने की संभावना है, जो भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट चक्र की मजबूती को और पुख्ता करता है.
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