Trump Tension: ट्रंप की टेंशन... ईरान युद्ध पड़ने लगा भारी, अमेरिका में महंगाई की मार

Iran War का बुरा असर अमेरिका पर महंगाई के रूप में दिखना शुरू हो गया है. अमेरिका में पेट्रोल-डीजल महंगा हो गया है. एक्सपर्ट भी डोनाल्ड ट्रंप की टेंशन बढ़ाने वाली चेतावनी देते हुए नजर आ रहे हैं.

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ईरान युद्ध का दिखने लगा अमेरिका में बुरा असर. (Photo: Getty Image) ईरान युद्ध का दिखने लगा अमेरिका में बुरा असर. (Photo: Getty Image)

आजतक बिजनेस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 05 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 7:38 PM IST

अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध जारी है. मिडिल ईस्ट जंग से ग्लोबल टेंशन भी हाई पर है और इसका बुरा असर दुनिया के तमाम देशों पर लगातार दिखाई दे रहा है. अब अमेरिका खुद भी इसकी चपेट में आ गया है और तेल-गैस संकट से जुझ रहा है. ईरान युद्ध के चलते महंगाई ने डोनाल्ड ट्रंप की टेंशन बढ़ा दी है. हालात ये हैं कि अमेरिका में पेट्रोल की कीमत बढ़ी (US Petrol Price Hike) है, तो ई-कॉमर्स डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स से लेकर एयरलाइंस तक ने महंगाई का तगड़ा झटका दिया है. यही नहीं पोस्टल सर्विस भी महंगी होने वाली है. 

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ईरान युद्ध के इस बुरे असर को लेकर कई एक्सपर्ट्स ने चेतावनी देते हुए कहा है कि ये ग्लोबल मार्केट है और अमेरिका इससे बच नहीं पाएगा. तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्टेशन की लागत में इजाफा होता है और इससे महंगाई की मार पड़नी तय है. 

अमेरिका में चौतरफा महंगाई की मार
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के खिलाफ युद्ध का असर अब अमेरिकियों पर भी पड़ने लगा है. Amazon ने अपनी ई-कॉमर्स डिलीवरी पर फ्यूल सरचार्ज लगाने की घोषणा की है, तो वहीं कुछ एयरलाइंस ने ईंधन की बढ़ती कीमतों की भरपाई के लिए चेक-इन बैगेज पर लगने वाली फीस को बढ़ा दिया है. 

बात अमेरिका में पेट्रोल-डीजल की कीमतों (Petrol-Diesel Price In US) की बात करें, तो शुक्रवार को अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत बढ़कर 4.09 डॉलर प्रति गैलन हो गई. ये ईरान के साथ अमेरिका का युद्ध शुरू होने से ठीक पहले की कीमत से एक डॉलर प्रति गैलन से भी अधिक है. जबकि, अगस्त 2022 के बाद पेट्रोल की कीमत का ये सबसे ऊंचा स्तर है. 

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अमेरिकन ऑटोमोबाइल एसोसिएशन (AAA) के मुताबिक, अमेरिका में डीजल की कीमत में भी बड़ा उछाल आया है. एक साल पहले यह 3.64 डॉलर प्रति गैलन थी, जो शुक्रवार को बढ़कर 5.53 डॉलर प्रति गैलन हो गई. 

ट्रांसपोर्टेशन महंगा, यहां भी तगड़ी मार की तैयारी
डीजल का इस्तेमाल खासतौर पर खेती, कंस्ट्रक्शन और ट्रांसपोर्ट के अलावा अन्य उद्योगों में भी बड़े पैमाने पर होता है. इसकी कीमत में इजाफा होने से तमाम जरूरी सामान या कहें रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें तक महंगी हो जाती है, क्योंकि इनकी ट्रांसपोर्टेशन लागत में इजाफा होता है. 

ताजा असर देखें, तो ई-कॉमर्स की दिग्गज कंपनी Amazon ने भी कहा है कि 17 अप्रैल से वह थर्ड-पार्टी सेलर्स पर 3.5% का फ्यूल सरचार्ज लगाने जा रही है. इसके अलावा US Postal Service के मुताबिक, ट्रांसपोर्ट की बढ़ती लागत से निपटने के लिए वह पैकेज और एक्सप्रेस मेल डिलीवरी पर अस्थायी तौर पर 8% फ्यूल सरचार्ज लगाने पर विचार कर रही है. Postal Service ने अपनी वेबसाइट पर जारी एक नोटिस में बताया कि अगर Postal Regulatory Commission से मंजूरी मिल जाती है, तो यह सरचार्ज 26 अप्रैल से लागू होगा और 17 जनवरी 2027 तक जारी रहेगा. 

'अमेरिका इससे बच नहीं पाएगा...'
अगर ईरान के खिलाफ युद्ध और लंबा खिंचता है, तो इससे अमेरिका में सप्लाई चेन भी बुरी तरह से बाधित हो सकती है. न्यूयॉर्क की एनालिस्ट रचेल जिएंबा (जियो-पॉलिटिकल जोखिमों की सलाहकार) ने द वॉशिंगटन पोस्ट से खास बातचीत में कहा है कि 'मुझे नहीं लगता कि अमेरिका इससे बच सकता है, ये वैश्विक बाजार है. एक हफ्ता पहले तक भी एस्पर्ट चिंतित थे, जबकि अब वे और भी ज्यादा चिंतित हो गए हैं.'

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CBS से बातचीत में फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ शिकागो (Federal Reserve Bank of Chicago) के चेयरमैन ऑस्टन गूल्सबी (Austan Goolsbee) का कहना है कि, 'अगर ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ने लगती है, तो इसका असर दूसरी कीमतों पर भी पड़ेगा. इसलिए मुझे लगता है कि यह असर तुरंत नहीं, तो आने वाले दिनों में दिखना शुरू हो जाएगा, आप देखेंगे कि उपभोक्ताओं पर इसका बोझ पड़ने लगेगा और उन्हें कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी (Sticker Shock) का सामना करना पड़ेगा.' 

उन्होंने कहा कि अमेरिका के लोग पहले से ही जरूरी चीजों की उपलब्धता और जीवन-यापन की लागत को लेकर काफी चिंतित हैं और अब उनकी ये चिंता और भी बढ़ती हुई नजर आने वाली है. 

एशिया से यूरोप तक पहले ही हड़कंप
US-Iran War के बीच होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) बंद होने के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था (Global Economy) को पहले ही करोड़ों बैरल तेल का नुकसान हो चुका है. वॉशिंगटन पोस्ट ने JPMorgan के कमोडिटी एक्सपर्ट्स के हवाले से रिपोर्ट में कहा है कि एशिया को सबसे पहले खाड़ी देशों से तेल की खेप न मिलने का नुकसान उठाना पड़ा और वहां की सरकारों को राशनिंग सिस्टम समेत अन्य एनर्जी सेविंग उपाय लागू करने पड़े. अप्रैल के मध्य तक यूरोप में तेल की कमी गंभीर होने की संभावना है.

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