वायुसेना के फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी शहादत के बाद शुरू हुआ एक विवाद लगातार गहराता जा रहा है. जिस घर में बेटे की वीरगाथा सुनाई जानी चाहिए थी, वहां अब मुआवजे, रिश्तों और अधिकारों को लेकर सवालों का शोर सुनाई दे रहा है.
असम के जोरहाट में हुए दर्दनाक विमान हादसे में शहीद हुए जहानाबाद के लाल फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई थी. उस समय पूरा बिहार उनके साहस और बलिदान को सलाम कर रहा था. लेकिन अब शहीद के परिवार और प्रशासन के बीच ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने कई नए सवालों को जन्म दे दिया है. मामले की शुरुआत उस वक्त हुई जब बिहार सरकार की ओर से दी जाने वाली आर्थिक सहायता राशि शहीद की कथित पत्नी श्रेया राय को सौंपे जाने की जानकारी सामने आई. इसके बाद शहीद के पिता अमरेंद्र शर्मा ने खुलकर प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठा दिए.
हमें उसकी शादी तक की जानकारी नहीं थी
बनवरिया गांव में रहने वाले अमरेंद्र शर्मा की आवाज में दर्द भी है और नाराजगी भी. उनका कहना है कि बेटे के जीवन से जुड़े इतने बड़े फैसले की जानकारी उन्हें कभी नहीं दी गई. पिता का दावा है कि परिवार को हमेशा यही बताया गया था कि शुभम की शादी तय हो चुकी है और आगामी नवंबर में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह होना है. घर में तैयारियों को लेकर भी चर्चाएं होती थीं. ऐसे में अचानक कोर्ट मैरिज की बात सामने आने से पूरा परिवार हैरान है.
अमरेंद्र शर्मा कहते हैं कि यदि वास्तव में कोर्ट मैरिज हुई थी तो इसकी जानकारी न उन्हें दी गई, न उनकी पत्नी को और न ही परिवार के अन्य सदस्यों को. उनका कहना है कि बेटे की शादी का सपना उन्होंने पारंपरिक तरीके से देखा था और परिवार भी उसी दिशा में तैयारी कर रहा था.
प्रशासन का दावा- दस्तावेजों में श्रेया राय ही पत्नी
दूसरी तरफ प्रशासन का रुख बिल्कुल अलग है. जहानाबाद के अनुमंडल पदाधिकारी राजीव रंजन सिन्हा का स्पष्ट कहना है कि उपलब्ध सरकारी और विभागीय अभिलेखों में श्रेया राय को शुभम कुमार की विधिक पत्नी के रूप में दर्ज किया गया है. ऐसे में नियमों के अनुसार जो भी आर्थिक सहायता या सरकारी लाभ बनते हैं, वे उन्हीं को दिए जा रहे हैं. प्रशासन का तर्क है कि सरकारी प्रक्रिया भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर चलती है. यदि रिकॉर्ड में पत्नी का नाम दर्ज है तो सहायता राशि उसी के खाते में जाएगी. यहीं से विवाद और गहरा गया.
21 लाख के चेक ने बढ़ाई तकरार
विवाद का सबसे बड़ा केंद्र 21 लाख रुपये की आर्थिक सहायता राशि बनी हुई है. शहीद के पिता का आरोप है कि यह राशि श्रेया राय को सौंप दी गई, जबकि परिवार को इसकी जानकारी तक नहीं दी गई. उनका कहना है कि उन्हें न किसी कार्यक्रम की सूचना दी गई और न ही यह बताया गया कि भुगतान किस स्थान पर और किन परिस्थितियों में किया जा रहा है. परिवार का आरोप है कि शहीद के माता-पिता होने के बावजूद उन्हें पूरी प्रक्रिया से अलग रखा गया. यही कारण है कि अब वे पूरी कार्रवाई की पारदर्शी जांच की मांग कर रहे हैं.
‘अगर बहू थीं तो अंतिम संस्कार के बाद घर क्यों नहीं आईं?’
पिता की ओर से उठाया गया यह सवाल गांव और आसपास के इलाकों में चर्चा का विषय बना हुआ है. अमरेंद्र शर्मा का कहना है कि यदि श्रेया राय वास्तव में उनके बेटे की पत्नी थीं, तो शहादत के बाद परिवार के साथ कुछ समय बिताना चाहिए था. उनका दावा है कि परिवार को उस रिश्ते की सामाजिक और पारिवारिक पुष्टि कभी महसूस नहीं हुई. परिवार का दावा है कि उन्हें बाद में जानकारी मिली कि कथित तौर पर अहमदाबाद में कोर्ट मैरिज हुई थी. पिता का आरोप है कि यह विवाह परिवार से छिपाकर किया गया. उनका कहना है कि उन्हें इसकी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई थी. हालांकि अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी दस्तावेज का विवरण सामने नहीं आया है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि विवाह कब हुआ, किन परिस्थितियों में हुआ और उसकी जानकारी किन लोगों को थी. यही वजह है कि पिता पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं.
गांव में भी चर्चा का विषय बना मामला
बनवरिया गांव में शहीद शुभम कुमार का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है. गांव वालों को गर्व है कि उनके गांव का बेटा भारतीय वायुसेना में अधिकारी था और देश की सेवा करते हुए शहीद हुआ. लेकिन अब गांव की चौपालों पर चर्चा शहादत से ज्यादा मुआवजे और रिश्तों के विवाद की होने लगी है. कई लोगों का कहना है कि यदि विवाह हुआ था तो परिवार को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी. वहीं कुछ लोग यह भी कहते हैं कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में पत्नी का नाम दर्ज है तो प्रशासन उसी आधार पर निर्णय लेने के लिए बाध्य है. इन दो विचारों के बीच पूरा मामला उलझा हुआ दिखाई देता है.
सैयद मुशर्रफ इमाम