नीचे नदी, ऊपर बांस की बल्लियां... रोज इसी रास्ते से गुजरते हैं बच्चे और बुजुर्ग, बिहार के गांव की कहानी

सोचिए, हर सुबह घर से निकलते वक्त आपको यह तय करना पड़े कि स्कूल, अस्पताल या बाजार पहुंचने से पहले एक 'इम्तिहान' देना होगा. इम्तिहान बैलेंस का. नीचे नदी होगी, ऊपर बांस की बल्लियां, जिन पर चलना है. एक चूक और बड़ा हादसा. बिहार में कटिहार जिले के एक गांव के हजारों लोगों के लिए यह हर दिन की हकीकत है.

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रोज जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं बच्चे. (Photo: Screengrab) रोज जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं बच्चे. (Photo: Screengrab)

बिपुल राहुल

  • कटिहार,
  • 11 जून 2026,
  • अपडेटेड 1:28 PM IST

नीचे बहती नदी. ऊपर बांस की कुछ बल्लियां. न रेलिंग, न सुरक्षा, न कोई दूसरा सहारा. एक बच्चा हाथ में किताब लिए खड़ा है. सामने स्कूल है, लेकिन वहां पहुंचने से पहले उसे इस पुल पर अपना बैलेंस साबित करना होगा. जरा सा पैर फिसला, तो सीधे नदी में गिरने का खतरा. यह किसी फिल्म का सस्पेंस सीन नहीं, बल्कि बिहार के कटिहार की रोजमर्रा की जिंदगी है, जहां हजारों लोग आज भी बांस के सहारे अपना सफर तय करते हैं.

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कटिहार में एक नदी है. नदी पर एक पुल भी है, लेकिन यह पुल सीमेंट, लोहे और कंक्रीट का नहीं, बांस का है. ऐसा बांस का पुल, जिस पर चलते हुए जरा सा बैलेंस बिगड़ा तो सीधे नीचे पानी में गिरने का खतरा. ये कहानी किसी दूर-दराज के जंगल या पहाड़ की नहीं, बल्कि बिहार के कटिहार जिले की है. साल 2026 चल रहा है, देश चांद और अंतरिक्ष की बात कर रहा है, लेकिन कटिहार के कुछ गांवों के लोगों की जिंदगी अब भी बांस के सहारे टिकी हुई है.

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मनसाही प्रखंड के कुरेठा पंचायत स्थित पंचवर्गा गांव और आसपास के हजारों लोगों के लिए कमला नदी की यह धारा रोज की चुनौती है. स्कूल जाना हो, बाजार जाना हो, अस्पताल जाना हो या सरकारी दफ्तर... हर रास्ता इसी नदी से होकर गुजरता है.

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नदी पार करने के लिए जो पुल बना है, उसकी चौड़ाई इतनी कम है कि एक समय में सिर्फ एक दिशा से ही लोग आ-जा सकते हैं. सामने से कोई आ गया तो इंतजार करना पड़ेगा. बच्चे हाथ में किताब लेकर खड़े रहते हैं, फिर मौका देखकर धीरे-धीरे बांस पर पैर रखते हैं और बंधे हुए बांस को पकड़कर नदी पार करते हैं.

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यहां के लोगों के लिए यह कोई रोमांचक एडवेंचर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की मजबूरी है. ग्रामीण बताते हैं कि अगर इस रास्ते से न जाएं तो करीब 15 किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ता है. इसलिए चाहे बुजुर्ग हों, महिलाएं हों, छात्र हों या मरीज, सभी इसी खतरनाक पुल का इस्तेमाल करते हैं.

यह पुल सरकारी नहीं है. इसे गांव के लोगों ने खुद बनाया है. जब टूटता है तो सरकार नहीं, गांव वाले इसे दोबारा खड़ा करते हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक, साल में कई बार यह पुल टूट जाता है. फिर चंदा इकट्ठा होता है, बांस आता है और एक बार फिर गांव अपनी 'लाइफलाइन' तैयार कर लेता है.

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गांव के शाहबुद्दीन कहते हैं कि वर्षों से पुल की मांग की जा रही है. जनप्रतिनिधियों से लेकर अधिकारियों तक गुहार लगाई गई, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला. उनका कहना है कि अगर यहां पक्का पुल बन जाए तो अस्पताल, बाजार और प्रखंड मुख्यालय तक पहुंचना बेहद आसान हो जाएगा. 

शाहबुद्दीन ने कहा कि यह इलाका गोबरा घाट लहसा गांव और कुरेठा पंचायत और फुलहारा पंचायत के अंतर्गत आता है. यहां दो हजार से ज्यादा की आबादी अफेक्टेड है. यहां करीब 500 घर हैं. 

आलमगीर बताते हैं कि रात में अगर कोई बीमार पड़ जाए तो परेशानी और बढ़ जाती है. कई बार नाव का इंतजार करना पड़ता है. उनका दावा है कि इलाके के लोग करीब 20 साल से पुल की मांग कर रहे हैं, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला.

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हालांकि इस बार मामला सुर्खियों में आने के बाद जिला प्रशासन हरकत में आया है. कटिहार के डीएम आशुतोष द्विवेदी ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि कमला नदी में तत्काल निःशुल्क सरकारी नाव चलाई जाए. उनका कहना है कि जब तक स्थायी व्यवस्था नहीं होती, तब तक लोगों को जान जोखिम में डालकर बांस के पुल से गुजरने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए.

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डीएम ने यह भी कहा है कि जरूरत के अनुसार पुल निर्माण के लिए संबंधित विभाग को प्रस्ताव भेजा जाएगा और विभागीय निर्णय के बाद आगे की कार्रवाई होगी.

लेकिन यहां सवाल सिर्फ एक नाव का नहीं है. सवाल यह है कि जिस इलाके के लोग सालों से बांस के सहारे नदी पार कर रहे हैं, वहां विकास आखिर कब पहुंचेगा? क्या मुफ्त नाव ही समाधान है, या फिर उन हजारों लोगों को उस पक्के पुल का इंतजार अभी और करना होगा, जिसकी मांग वे दशकों से कर रहे हैं? फिलहाल कटिहार के इन गांवों में जिंदगी उसी तरह चल रही है. बच्चे स्कूल जा रहे हैं, किसान खेतों तक पहुंच रहे हैं और लोग रोज नदी पार कर रहे हैं. फर्क बस इतना है कि उनकी 'लाइफलाइन' आज भी बांस की बनी हुई है.

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