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आत्मनिर्भर भारत के दावे के बीच कपास की खेती संकट में, किसानों के लिए 'सफेद सोने' के उत्पादन में हैं ये तीन विलन

भारत में कपास की खेती, जो लंबे समय से 'सफेद सोना' कही जाती रही है, अब आर्थिक संकट में है. पिछले दो सालों में कपास की खेती का क्षेत्र 14.8 लाख हेक्टेयर कम हुआ और उत्पादन में 42.35 लाख गांठ की गिरावट आई है. विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि आयात शुल्क में कटौती से घरेलू किसानों की प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी.

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बढ़ते आयात और गिरती उत्पादकता से कपास के खेती पर भारी संकट (File: Kisan Tak)
बढ़ते आयात और गिरती उत्पादकता से कपास के खेती पर भारी संकट (File: Kisan Tak)

किसानों की आय दोगुना करने का मोदी सरकार का वादा अभी भी अधूरा है. देशभर के किसानों के आय में वृद्धि तो हुई है, लेकिन कई राज्यों में असमानता ज्यादा है. जैसे पंजाब और हरियाणा के किसानों की आय बिहार और ओडिशा के किसानों से कई ज्यादा है. किसानों की आय सरकारी नीतियों की नासमझी, वैज्ञानिकों की लापरवाही और उनकी मजबूरी पर सबसे ज्यादा आश्रित करती है.

भारत में किसानों के लिए 'सफेद सोना' कह जाने वाले कपास (कॉटन) की खेती लंबे समय से चलती आ रही है. लेकिन किसानों के लिए अब इसकी खेती करना ज्यादा मुनाफेदार नहीं रहा गया. भारत में कपास की खेती इस समय अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है. मंडियों में दाम तेजी से गिर रहे हैं और इसमें आग डालने का काम केंद्र सरकार के एक फैसले ने किया है. 

केंद्र की मोदी सरकार ने कपास पर इंपोर्ट ड्यूटी जीरो कर दी है. हालांकि, यह 19 अगस्त 2025 से 30 सितंबर तक के लिए ही है. ट्रंप के टैरिफ से निपटने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है. ताकि टेक्सटाइल इंडस्ट्री (कपड़ा उद्योग) को होने वाले नुकसान से बचाया जा सके.

लगातार गिरता उत्पादन और बढ़ता आयात

आंकड़े बताते हैं कि बीते दो सालों में कपास की खेती का रकबा 14.8 लाख हेक्टेयर घट गया है. उत्पादन भी 42.35 लाख गांठ कम हुआ है. भारत का कॉटन उत्पादन 2017-18 में 370 लाख गांठ था जो कि पीछले वित्त वर्ष महज 294.25 लाख गांठ रहा. वहीं, अक्टूबर 2024 से जून 2025 के बीच आयात 29 लाख गांठ तक पहुंच गया है, जो पिछले छह सालों में सबसे ज्यादा है. एक गांठ में करीब 170 किलो कॉटन होता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति आने वाले समय में उपभोक्ताओं के लिए भी खतरा बनेगी, क्योंकि कपास आयात पर बढ़ती निर्भरता से कपड़ों के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं.

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cotton stats yearly

तीन बड़े कारण: प्राइस, पॉलिसी और पेस्ट

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कॉटन उत्पादक है और वैश्विक उत्पादन में 24 फीसदी हिस्सा रखता है. इसके बावजूद किसान निराश हैं. इसकी तीन बड़ी वजहें हैं—कम दाम, गलत नीतियां और गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm). साल 2021 में कॉटन का दाम 12,000 रुपये प्रति क्विंटल था, जो अब घटकर 6,500–7,000 रुपये रह गया है. किसानों को ज्यादातर समय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तक नहीं मिल पाता.

वैज्ञानिकों के दावों के बावजूद गुलाबी सुंडी ने बीटी कॉटन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है, जिससे पैदावार घट रही है और कीटनाशकों पर खर्च बढ़ रहा है. हालात को और खराब कर रही है सरकार की हालिया नीति, जिसमें 11 फीसदी आयात शुल्क को अस्थायी रूप से हटाकर कॉटन आयात को आसान बना दिया गया है.

गिरती उत्पादकता और खतरे की घंटी

भारत में कॉटन की उत्पादकता 2017–18 में 500 किलो प्रति हेक्टेयर से घटकर 2023–24 में 441 किलो रह गई है, जबकि वैश्विक औसत 769 किलो है. अमेरिका और चीन जैसे देश क्रमशः 921 और 1950 किलो प्रति हेक्टेयर उत्पादन कर रहे हैं. यहां तक कि पाकिस्तान भी भारत से आगे निकल चुका है.

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आत्मनिर्भरता से दूर होता भारत

विशेषज्ञों का कहना है कि शून्य आयात शुल्क लागू करना कपास किसानों के लिए ताबूत में अंतिम कील साबित होगा. सरकार आत्मनिर्भर भारत की बात करती है, लेकिन नीतियां ऐसी बना रही है जिससे कृषि और उत्पादन दोनों पर संकट गहराता जा रहा है. यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो देश को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी—न केवल किसानों की आय कम होगी, बल्कि उपभोक्ताओं की जेब पर भी बड़ा बोझ बढ़ेगा.

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